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स्लम-डॉग मिलियनेयर – एक समीक्षा

मुंबई के स्लम-जीवन पर केन्द्रित स्लमडॉग मिलियनेयर देखकर हॉल से निकलने के बाद अनुभूतियाँ मिश्रित थीं। फिल्म में मुंबई के झोपटपट्टी जीवन की जो छवि दिखाई गई है, उसे देख कर काफी बेचैनी लगी। अमरीकी सिनेदर्शकों से भरे हॉल में ऐसा लगा जैसे हमें पश्चिम वालों के सामने नंगा किया जा रहा है। फिल्म के पहले हिस्से में ऐसा लगा यह क्या देखने आ गए — फिल्म छोड़ कर जाने का भी विचार आया। साथ में यह भी सोचा कि जो दिखाया जा रहा है, अतिशयोक्ति के साथ ही सही, है तो सच्चाई ही। ऐसा लगा कि सलाम बॉम्बे फिर दिखाई जा रही है। अन्तर यह था कि सलाम बॉम्बे में गन्दगी दिखाने वाली हमारी अपनी मीरा नायर थीं, और यह फिल्म अंग्रेज़ निर्देशक डैनी बॉयल ने बनाई है।

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मिक्स्ड-डबल्ज़ और लास्ट-नेम

मिक्स्ड डबल्ज़ का तो मैं ने नाम भी नहीं सुना था, पर डीवीडी के आवरण पर कोंकणा सेनशर्मा का नाम देख कर उठा लाया। पेज थ्री और मिस्टर ऐण्ड मिसेज़ अइयर देखने के बाद कोंकणा की एक और फिल्म देखने को मिली। कोंकणा ने नाराज़ नहीं किया।

बॉलीवुड में आजकल अलग ढ़र्रे की कई फिल्में बन रही हैं, और मिक्स्ड डबल्ज़ उन में से एक है। इस फिल्म की थीम वयस्क है, इसलिए बच्चों के साथ न देखें — हालाँकि दृष्य सारे शाकाहारी हैं। होता यूँ है कि सुनील और मालती (कोंकणा) एक आम दंपत्ति की तरह हैं, शादी के 8-10 साल हो गए हैं, एक बच्चा है, दोनों कमाऊ हैं, सब कुछ सही चल रहा है, पर उन के यौन जीवन में कोई रस नहीं है। सुनील जी इतने बोर हो गए हैं कि उन की कामुकता को जंग लग गई है, और बेचारी मालती सखियों से नुस्खे पूछती रह जाती है। इतने में कहानी मोड़ लेती है जब सुनील का एक अमरीका रिटर्न्ड दोस्त कहता है कि दो दंपतियों में अदला-बदली (वाइफ-स्वैपिंग) से रिश्ते में नयापन आ जाता है। बस सुनील जी मचल उठते हैं और ज़िद पकड़ लेते हैं कि यही इलाज है उन की बोरियत का — एक तरफ ऐसे दंपत्ति की खोज शुरू हो जाती है, जिस के साथ अदला-बदली हो सके और दूसरी ओर मालती को मनाने का काम। उस से आगे क्या होता है, यह फिल्म में ही देखें।

कोंकणा की बात चल रही है तो मैं उन को आजकल के बेहतरीन कलाकारों में मानता हूँ। साधारण दिखने वाली इस अभिनेत्री ने बहुत कम समय में अपने लिए बॉलीवुड में एक खास जगह बना ली है। सुना है कि अपना काम बहुत व्यावसायिक ढंग से करती हैं; कल खबर पढ़ी कि शूटिंग पर समय पर पहुँचने के लिए लोकल ट्रेन से गईं। क्या यह पब्लिसिटी स्टंट था? 

बाइ दी वे, कोंकणा का नाम कोंकणा सेनशर्मा है, या कोंकणा सेन शर्मा? क्या सेनगुप्ता या दासगुप्ता की तरह सेनशर्मा भी एक लास्ट-नेम है? या यह “कौल बासु” की तरह “सेन शर्मा” डबल लास्ट-नेम है? कोंकणा सेन अपर्णा सेन की पुत्री हैं, इस कारण सेन हुईं, फिर शर्मा कैसे जुड़ा? लास्ट-नेम की हिन्दी क्या है? पारिवारिक नाम? अन्तिम नाम? गोत्र? जाति? यानी कास्ट? पंजाब से बाहर भी, कलकत्ता जैसे शहर में, यदि किसी से हिन्दी में लास्ट-नेम पूछना हो तो कैसे पूछें? आप की कास्ट क्या है, सर? क्या उस का मतलब यही हुआ कि आप उन की जाति जानना चाहते हैं ताकि यह पता चले कि आप उन्हें छू सकते हैं या नहीं? वरना आप किसी से लास्ट-नेम क्यों पूछने लगे? वैसे लास्ट-नेम की हिन्दी क्या है?

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परिणीता

परिणीता को रिलीज़ हुए कुछ महीने हो गए हैं, पर मुझे अभी देखने का मौका मिला। देख कर इतनी अच्छी लगी कि यहाँ लिखने का मन हुआ। न तो मैंने शरतचन्द्र का मूल उपन्यास पढ़ा है, और न ही मीनाकुमारी वाली पुरानी “परिणीता” देखी है (देखी भी होगी तो याद नहीं)। इस कारण उत्सुकता के साथ और बिना किसी पूर्वाग्रह के मैंने यह फिल्म देखी।

छोटी बच्ची लोलिता के माता पिता एक कार दुर्घटना में मर गए होते हैं, और वह अपने मामा के घर रहने जाती है। वहाँ उसकी दोस्ती पड़ौस के बच्चे शेखर के साथ हो जाती है। बड़े हो कर यह बच्चे विद्या बालन और सैफ अली खान बन जाते हैं। दोनों का प्यार कैसे अनजाने में पनपता है, इसे बड़े ही मर्मस्पर्शी ढ़ंग से दिखाया गया है। फिल्म के आरंभ में शेखर का विवाह गायत्री तांत्या (दिया मिर्ज़ा) के साथ हो रहा होता है, और फिर सारी फिल्म फ्लैश बैक में चलती है। लोलिता की ज़िन्दगी में गिरीश (संजय दत्त) आता है जो कहानी को नया मोड़ देता है।

विद्या बालन की यह पहली फिल्म है और उसने बहुत ही अधिक प्रभावित किया। घर में हम लोग बात करने लगे कि चेहरा इतना पहचाना क्यों लग रहा है। इंटरनेट पर खोज करने पर पता लगा कि उसने कुछ विज्ञापन किए हैं – सर्फ-ऍक्सेल, वग़ैरा वग़ैरा। कुछ तसल्ली हुई, पर चेहरा उस से ज़्यादा पहचाना लग रहा था। और खोज की तो पता चला कि “हम पाँच” सीरियल जो हम नियमित रूप से देखते थे, उस में राधिका (बहरी वाली बहन) का रोल विद्या ने ही किया था।

सैफ अली खान का अभिनय हर फिल्म के साथ निखर रहा है। संजय दत्त सामान्य हैं। दिया मिर्ज़ा का थोड़ा सा रोल है। रेखा का भी एक गाना है। संगीत ठीक ठाक है। कुल मिला कर विद्या बालन और सैफ अली खान का अभिनय और विधू विनोद चोपड़ा प्रदीप सरकार (corrected 10-Oct-2016) का निर्देशन फिल्म को देखने लायक बनाता है। ज़रूर देखें।

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ये वर्ल्ड है ना वर्ल्ड..

ये वर्ल्ड है ना वर्ल्ड, इस में दो तरह के लोग रहते हैं, एक वह जिन्होंने बंटी और बबली नहीं देखी, और दूसरे वह जिन्होंने देखी है। आज हम “दूसरे” लोगों में शामिल हुए। कई दिनों से पड़ौस की देसी वीडियो दुकान के चक्कर लग रहे थे, अब जा कर मिली है। फिल्म के गाने तो पहले ही सुन सुन कर याद हो गये थे। गुलज़ार के गीत असाधारण हैं। “ये ज़मीं पानियों में डुबकियाँ ले रही है, देखना उठ के पैरों पे चलने लगे ना कहीं…”। फिल्म का एक प्रोमो गीत, जो एक अँग्रेज़ी रैप गाने की शक्ल में है और अमिताभ बच्चन पर फिल्माया गया है, भी अच्छा है। यह फिल्म में तो नहीं है, पर यहाँ पर देखा-सुना जा सकता है।

समीक्षा तो नहीं लिखूँगा, क्योंकि पहले ही बहुत सारी लिखी गई हैं, पर यह कहूँगा हल्के फुल्के मनोरंजन के लिए ज़रूर देखो।

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कृष्ण और कृष्ण

आज हम भी “ब्लैक” देख कर आए, और सोचा पहले आशीष जी को धन्यवाद दें — फिल्म को सुझाने के लिए, और इस सुझाव के लिए कि फिल्म को सिनेमा हॉल में ही देखें। हमारा भी यही सुझाव है कि फिल्म को बिलकुल मिस न किया जाए। नाम को देख कर तो लग रहा था कि एक और मुंबई के अंडरवर्ल्ड से संबन्धित फिल्म है, जिस में काला बाज़ारी वग़ैरा का ज़िक्र होगा, पर फिल्म का विषय इस से कोसों, मीलों दूर है। यह फिल्म भारत में इस साल के फिल्म पुरस्कारों पर तो क्लीन स्वीप मारेगी ही, बाहर भी सराहे जाने की उम्मीद की जा सकती है। अमिताभ बच्चन का अभिनय शायद ही किसी फिल्म में इस से बेहतर हुआ हो, और यही बात रानी मुखर्जी के लिए भी कही जा सकती है। हमारा मन तो उस छोटी सी लड़की के अभिनय ने ही मोह लिया, जिस ने रानी मुखर्जी के बचपन की भूमिका निभाई है। फिल्म का चित्रांकण अत्यधिक सराहनीय है। वास्तविक जीवन को दर्शाती इस फिल्म में कुछ दृश्य ज़रूरत से ज़्यादा नाटकीय लगते हैं, पर कुल मिला कर बहुत ही कलात्मक फिल्म है।

अंग्रेज़ी राज के ज़माने का भारत है और स्थान है शिमला, पर फिल्म में दिखाई इमारतों, शिक्षा संस्थानों को देख कर लगता नहीं कि फिल्म भारत में फिल्माई गई है। आधे नहीं तो एक चौथाई संवाद अंग्रेज़ी में हैं। यहाँ के सिनेमा में सभी हिन्दी संवाद अंग्रेज़ी में सबटाइट्ल के साथ थे। पर क्या भारत में रिलीज़ होने वाले प्रिंट में अंग्रेज़ी संवादों के सबटाइट्ल हिन्दी में हैं? मुझे तो नहीं लगता ऐसा किया गया होगा। क्या यह माना जाता है कि भारत का हर सिने-दर्शक इतनी अंग्रेज़ी समझता ही है? इसे भारतीय सिने दर्शक की तारीफ समझा जाए या उसकी ज़रूरतों की अवहेलना?

अंग्रेज़ी राज का भारत ही है “किसना” में भी। इसी वीकेंड पर घर में “किसना” की डीवीडी देखने की कोशिश की गई पर एक बार फिर आशीष जी की सलाह सच साबित हुई। एक बैठक में आधा घँटा देखी, दूसरी बार एक और घँटा, उस के बाद नहीं झेली गई। उसे देखने का रिस्क न ही लिया जाए तो बेहतर है। फिर मत कहना बताया नहीं।

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पेज थ्री

आज “पेज थ्री” देखी। फिल्म देखने के लिए बैठ रहा था तो ज़्यादा उम्मीदें नहीं थीं, सोचा शायद कुछ देर बाद उठ जाऊँगा और परिवार के बाकी लोग देख लेंगे, जैसा घर में आई अक्सर फिल्मों के साथ होता है। शुरू में कुछ धीमी भी लगी पर जैसे जैसे फिल्म आगे बढ़ती गई, उसका आकर्षण बढ़ता गया, और अब मैं यही कहना चाहूँगा, कि फिल्म को देखे बिना छोड़िए मत।

Konkana Sensharmaफिल्म की थीम लीक से हट कर है, एक तरह से आर्ट फिल्म की श्रेणी में ही आती है। पर फिर भी बाक्स ऑफिस पर अच्छी चल रही है, यह जान कर सुखद आश्चर्य ही हुआ। कोंकणा सेनशर्मा की एक पत्रकार की मुख्य भूमिका बहुत ही शक्तिशाली है। गर्ल-नेक्सट-डोर वाले व्यक्तितव की इस अभिनेत्री की यह पहली फिल्म देखी है मैंने, पर अब पता चला पहले ही “मिस्टर एण्ड मिसेज़ अइयर” में धाक छोड़ चुकी है, और कई पुरस्कार भी पा चुकी है। अब तो वह फिल्म भी देखनी पड़ेगी। देब भाई कौन सी चक्की का पिसा खाते हो आप बंगाली लोग जो इतना टेलेंट पाए हो।

बस एक बात का ख्याल रखें। यहाँ देसी डीवीडी लेते समय हम रेटिंग पर इतना ध्यान नहीं देते, और कई बार देखते देखते पता चलता है कि अगर यह अँग्रेज़ी फिल्म होती तो “आर” रेटिड होती। थोड़ा थोड़ा ही सही, इस फिल्म ने बॉलीवुड़ की कुछ शालीनता सीमाओं को कई जगह पार किया है, हालाँकि भौंडा लगे बिना। समलैंगिक यौन, द “ग” वर्ड़, हॉलीवुड़ स्टाइल चुम्बन, यहाँ तक कि बच्चों को भी वासना का शिकार होते हुए दिखाया गया है। मैं यह नहीं कहूँगा कि बच्चों को इस फिल्म से वंचित किया जाए, पर पहली बार खुद देखें, फिर निश्चय करें।

चलते चलते अतुल को बधाई, उन के शहर की ईगल्ज़ ७-० से आगे हैं। भई मैं तो हाफ टाइम का इन्तज़ार कर रहा हूँ, पर क्या फायदा इस बार जेनेट जैकसन तो है नहीं। सॉरी अतुल भाई, इस बार महा कटोरी (सुपर बोउल) कोई और ले गया।