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मध्य पूर्व

मध्य पूर्व के तनाज़े में पाला चुनने से पहले 7 सवाल

मूल अंग्रेज़ी लेख7 Things to Consider Before Choosing Sides in the Middle East Conflict
लेखकअली अमजद रिज़वी, अनुवादक – रमण कौल


[इसराइल-फ़लस्तीन मुद्दे पर हम सभी अपना अपना पाला चुनते हैं। इस मुद्दे पर संतुलित विचार बहुत कम मिलते हैं। अली रिज़वी, जो एक पाकिस्तानी मूल के कनैडियन लेखक-डॉक्टर-संगीतज्ञ हैं, का यह लेख इस कमी को बहुत हद तक पूरा करता है। लेखक की अनुमति से मैंने मूल लेख को यहाँ अनूदित किया है।]


आप “इसराइल समर्थक” हैं या “फ़लस्तीन समर्थक”? आज अभी दोपहर भी नहीं हुई है और मुझ पर दोनों होने के आरोप लग चुके हैं।

इस तरह के लेबल मुझे बहुत परेशान करते हैं क्योंकि वे सीधे इसराइल फ़लस्तीनी संघर्ष की हठधर्मी कबीलावादी प्रकृति की ओर इशारा करते हैं। अन्य देशों के बारे में तो इस तरह से बात नहीं की जाती। फिर इन्हीं देशों के बारे में क्यों? इसराइल और फ़लस्तीन दोनों के मुद्दे जटिल हैं, दोनों के इतिहास और संस्कृतियाँ विविधता से भरी हैं, और दोनों के मज़हबों में बहुत सी समानताएँ हैं, भले ही ग़ज़ब के विभाजन हों। इस मुद्दे पर दोनों में से एक पक्ष का समर्थन करना मुझे तर्कसंगत नहीं लगता।

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भारत विविध

377 पर 7 तर्क

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बस यही अपराध मैं हर बार करता हूँ
आदमी हूँ आदमी से प्यार करता हूँ।

1861 में अंग्रेज़ों की बनाई IPC धारा 377 के अनुसार आदमी-आदमी के प्यार को अपराध करार दिया गया था। आज डेढ़ सौ साल बाद हम इस धारा को हटाने के प्रयासों में असफल हो गए हैं। मेरे हर दोस्त का इस बारे में कुछ कहना है, और बहुत कम लोगों को सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला ग़लत लगा है। मुझसे पहले की पीढ़ी के लोगों के ऐसे विचार हों, ऐसा स्वाभाविक है, पर मेरी पीढ़ी और कुछ मुझ से अगली पीढ़ी के कुछ लोगों के भी इस मामले पर विचार कुछ पुराने हैं। स्वयं को इस शोर में अकेला तो पा रहा हूँ, पर एक खुशी है कि यह चर्चा अब बंद नहीं होने जा रही, और जितनी चर्चा होगी, उतनी लोगों को सूचना मिलेगी और उतनी लोगों की आँखें खुलेंगी। ऐसी मेरी उम्मीद है। मैं स्वयं भी पहले समलैंगिकता के विषय पर पूरी तरह निष्पक्ष नहीं था, इस कारण मैं किसी को पूरी तरह दोषी भी नहीं ठहराता। पर जैसे जैसे और जानकारी हासिल की, मेरे विचार बदले। आशा करता हूँ कि और लोग भी आँखें खुली रखेंगे, जानकारी हासिल करेंगे, और फिर निर्णय लेंगे।

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कश्मीर भारत

पिद्दा सा कश्मीर, और आज़ादी?

कुछ दिन पहले अपने अंग्रेज़ी ब्लॉग पर मैं ने कश्मीर पर एक लेख लिखा जो कई दिनों से मन में उबल रहा था, पर कश्मीर में हो रही हाल की घटनाओं के कारण उफन पड़ा। इस लेख को काफी अच्छी प्रतिक्रिया मिली — कुछ टिप्पणियाँ अच्छी, कुछ बुरी। फेसबुक और ट्विटर पर सैंकड़ों लोगों ने इसे शेयर किया। लेख का सार यह था कि कश्मीर जितना बड़ा दिखता है, उतना है नहीं। कश्मीरी मुसलमान आज़ादी ले भी लेंगे तो उनका यह “देश” नहाएगा क्या और निचोड़ेगा क्या। कुछ पाठकों ने सुझाव दिया कि इसे हिन्दी में छापूँ। इसलिए अनुवाद कर सामयिकी में भेज दिया। नीचे मूल अंग्रेज़ी लेख और सामयिकी में छपे हिन्दी अनुवाद की कड़ियाँ हैं। कृपया पढ़ें और अपनी प्रतिक्रिया अवश्य दें। अंग्रेज़ी लेख पर एक लंबे चौड़े वार्तालाप के ज़रिए कुछ और बिन्दु सामने आए हैं।