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नेत्रहीनों को कंप्यूटर पढ़ कर सुना सकता है

मैं ने पिछली बार एक प्रविष्टि लिखी थी गूगल में काम करने वाले नेत्रहीन वेब-वैज्ञानिक डा. टी.वी. रामन के बारे में। तब डा. रामन ने गूगल के आधिकारिक ब्लॉग पर अपनी प्रविष्टि में यह बताया था कि वे किस प्रकार गूगल का प्रयोग किसी व्यक्तिवाचक संज्ञा के सही हिज्जे पता करने के लिए करते हैं।

गूगल ब्लॉग पर अपनी नई प्रविष्टि में डा. रामन ने एक और रोचक तकनीक के विषय में बताया है – कि OCR (Optical Character Recognition) और वाचक ब्राउज़र के मेल से कैसे नेत्रहीनों द्वारा किसी भी दस्तावेज़ को पढ़ा जा सकता है । वे कहते हैं कि “मैं बिना कागज़ की दुनिया में रहना पसन्द करता हूँ, और हर काग़ज़ के टुकड़े को स्कैन करता हूँ”। अभी तक वे व्यावसायिक रूप से उपलब्ध OCR सॉफ्टवेयर प्रयोग करते थे, पर अब उन्होंने स्वयं ही एक मुक्त तन्त्रांश वाला सॉफ्टवेयर ओसीआर-ओपस शुरू किया है। यह उन के वाचक ब्राउज़र ईमैकस्पीक से मिल कर नेत्रहीनों के लिए बढ़िया औज़ार तो बन ही गया है, पर हम जैसे लोग, जिन्हें दृष्टि प्राप्त है, भी इस का प्रयोग कर सकते हैं। ओसीआर-ओपस स्कैन हुए काग़ज़ को टेक्स्ट में बदलेगा और उस की html फाइल तैयार करेगा, और ईमैकस्पीक उसे पढ़ कर सुनाएगा।

पर हम हिन्दी वालों और अन्य भारतीय भाषाओं में काम करने वालों के लिए फिर वही प्रश्न है – हमारी भाषा में इतनी प्रगति कब होगी?

पुनश्च : यही प्रश्न मैं ने इस प्रविष्टि के अंग्रेज़ी संस्करण में पूछा था, और चूँकि उस का पिंगबैक डा. रामन की मूल प्रविष्टि पर गया, उसे उन्होंने भी पढ़ा और मेरी प्रविष्टि पर टिप्पणी के रूप में उन्होंने उत्तर भी दिया। यहाँ पढ़ें

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टी.वी.रामन – आँखें खोल देने वाला व्यक्तित्व

इंटरनेट पर, किसे मालूम है कि आप एक कुत्ता नहीं हो। या फिर यह कि आप फिर वही कुत्ता नहीं हो।

यदि आप को मेरा अनुवाद समझ में नहीं आया, तो यह रहा टी.वी. रमण रामन का मूल कथन

On the Internet, no one knows you aren’t a dog! Nor even if you are still the same dog!

जी हाँ, अमरीका के प्रतिष्ठित कॉर्नेल विश्वविद्यालय से पी.एच.डी. की उपाधि प्राप्त टी.वी.रमण रामन ने सोर्सफोर्ज पर अपने वेबपृष्ठ पर यही लिखा है। दरअसल टी.वी. रमण रामन की दिनचर्या में श्वानवंश की प्राणी हबल का अच्छा खासा योगदान है। रमण रामन नेत्रहीन हैं, और उन की उपलब्धियाँ मुझ जैसे लाखों आँखों वालों को शर्मिन्दा कर देंगीं।

हाल ही में डा. रमण रामन के बारे में तब पता चला जब गूगल ब्लॉग पर उन की यह प्रविष्टि दिखी। इस में वे गूगल के एक अनूठे इस्तमाल के बारे में बता रहे हैं – यदि आप को किसी शब्द, विशेषकर व्यक्तिवाचक संज्ञा (स्थान आदि का नाम) के हिज्जों में कन्फ्यूजन है तो उसे गूगल पर खोज कर देखें। वे आजकल गूगल में काम करते हैं, और इंटरनेट को नेत्रहीन लोगों के लिए सुलभ बनाने के कार्य में जुटे हुए हैं। उन की यह प्रविष्टि भी पढ़िए जिस में वे बताते हैं कि नेत्रहीन लोगों के लिए उन का गूगल खोज इंजन कैसे उन वेब पृष्ठों को प्राथमिकता देता है जिन पर चित्र कम हैं, और इस कारण उन्हें नेत्रहीनों द्वारा प्रयुक्त वाचक यन्त्र द्वारा सरलता से पढ़ा जा सकेगा।

डा. रमण रामन ब्लॉगिंग समुदाय के सक्रिय सदस्य हैं, और जैसा उन के ब्लॉगर प्रोफाइल से मालूम होता है, वे कई तकनीकी चिट्ठों के मालिक हैं।

Image source http://emacspeak.sourceforge.net/raman/वेब सुलभता (नेत्रहीनों के लिए) के विषय पर अपने साक्षात्कार में डा. रमण रामन अपनी सर्च इंजन तकनीक के बारे में और काफी जानकारी देते हैं। अपने बारे में पूछे जाने पर वे संक्षेप में बताते हैं – “ज़रूर, http://emacspeak.sf.net/raman”। और वहाँ जाने पर उन के काम की और जानकारी मिलती है। उन के रिज़मे से पता चलता है कि उन्होंने पुणे विश्वविद्यालय से गणित में स्नातन के बाद आइ.आइ.टी. मुंबई से कंप्यूटर विज्ञान में स्नातकोत्तर शिक्षा प्राप्त की है, और फिर कॉर्नेल से एम.एस. और पी.एच.डी.।

ज़ाहिर है, नेत्रहीनों के कंप्यूटर में मॉनीटर का कोई काम नहीं है। उन के प्रोग्राम और वेबपृष्ठ दिखते नहीं, बोलते हैं। शब्दों की प्राथमिकता है, चित्रों की नहीं। क्या निकट भविष्य में हिन्दी के लिए ऐसा काम हो सकेगा? जब टी.वी.रमण रामन की प्रविष्टियों पर इस प्रविष्टि का पिंगबैक आएगा, तो क्या वे इसे “पढ़” पाएँगे?

मेरे लिए ऐसे व्यक्ति बड़ी प्रेरणा के स्रोत होते हैं, जो कठिनाइयों के बावजूद अपने लिए जगह बनाते हैं, न कि वे जो शिकायतों में ही सारी ज़िन्दगी निकाल देते हैं। टी.वी.रमण रामन को मेरा शत् शत् नमन।

जिन लोगों को दक्षिण भारतीय नामों की पहचान हो क्या वे बता सकेंगे कि क्या सही उच्चारण रमण है, या रामन्?