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चुटकुला-गूँज + सुभाषित-सहस्र

विवाह के विषय में कुछ सुभाषित (पुरुषों की नज़र से)


मैं ने सुना है कि प्रेम रसायनशास्त्र की तरह है। शायद यही वजह है मेरी पत्नी मुझे विषैले पदार्थ के समान समझती है।   

डेविड बिसोनेट


कोई व्यक्ति यदि आप की पत्नी को चुरा लेता है, तो उस से बदला लेने का सब से बेहतर तरीका है कि उसे ही रखने दो।   

साचा गिल्ट्री


विवाह के बाद पति पत्नी एक ही सिक्के के दो पहलू बन जाते हैं — वे एक दूसरे का मुँह नहीं देख सकते हैं पर सदा साथ रहते हैं।   


विवाह आप के लिए हर तरह से लाभकारी है — यदि अच्छी पत्नी मिली तो सुखी रहेंगे, बुरी मिली तो फिलासफर बनेंगे।   

– सुकरात


सफल विवाह में कुछ लेना होता है, कुछ देना। पति का देना और पत्नी का लेना।   


नारी हमें महान कार्य करने की प्रेरणा देती है, और उन्हें अंजाम देने से रोकती है।   

– ड्यूमास


जीवन का सब से दुष्कर प्रश्न, जिस का मुझे उत्तर नहीं मिल पाया है….. “आखिर नारी चाहती क्या है?”   

– फ्रायड


हमारा वार्तालाप हुआ — मैंने कुछ शब्द कहे, और उस ने कुछ पृष्ठ कहे।   


“कुछ लोग मुझ से हमारे सफल दांपत्य जीवन का राज़ पूछते हैं। हम हर सप्ताह में दो बार रेस्तराँ जाने का समय निकालते हैं — कैंडल-लाइट डिनर, कुछ संगीत, कुछ नाच। वह हर मंगल जाती है, मैं हर शुक्र।”   

– हेनरी यंगमैन


“मैं आतंकवाद से नहीं ड़रता। मैं दो साल तक शादीशुदा रहा हूँ।”   

– सैम किनिसन


“बीवियों के बारे में मेरी हमेशा किस्मत ख़राब रही है। पहली मुझे छोड़ कर चली गई, और दूसरी नहीं गई।”   

– पैट्रिक मरे


यह सही है कि सब लोग आज़ाद और बराबर जन्म लेते हैं, पर कुछ लोग शादी कर लेते हैं!   


विवाह एक ऐसी विधि है जिस के द्वारा आप यह मालूम करते हैं कि आप की पत्नी को किस तरह का व्यक्ति दरकार था।   


विवाह को आनन्दमय रखने के दो राज़   

1. जब आप गलत हों तो गलती मान लें
2. जब आप सही हों तो चुप रहें

– नैश


मेरी पत्नी को बस दो शिकायतें हैं — पहनने को कुछ नहीं है, और कपड़ों के लिए अलमारियाँ काफी नहीं हैं।   


मैं शादी से पहले क्या करता था? …. जो जी में आता था।   

– हेनरी यंगमैन


मेरी पत्नी और मैं बीस साल तक बहुत खुश रहे। फिर हमारी मुलाकात हुई।   

– रॉडनी डेंजरफील्ड


एक अच्छी पत्नी हमेशा अपनी ग़लती के लिए अपने पति को माफ कर देती है।   

– मिल्टन बर्ल


शादी एक अकेला ऐसा युद्ध है जिस में आप अपने शत्रु के साथ सोते हैं।   

– अनाम


“मैं ने अपनी पत्नी से कई वर्षों से बात नहीं की। मैं बीच में नहीं टोकना चाहता था।”   

– रॉडनी डेंजरफील्ड


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एक नास्तिक हिन्दू

(Update: यह लेख 14 अप्रैल 2006 को अनुगूंज शृंखला के अन्तर्गत लिखा गया था। इस शृंखला में सभी चिट्ठाकार एक ही विषय पर लेख लिखते थे। इस लेख में दी गई कई कड़ियाँ अब काम नहीं कर रही हैं।)

बहुत ही टेढ़ा विषय दिया है संजय ने – मेरे जीवन में धर्म का महत्व। जितना इस विषय पर विवाद होने का डर रहता है, उतना शायद ही किसी और विषय पर रहता हो। अभी तक इसीलिए इस तरह के विषय हिन्दी चिट्ठाजगत में नहीं उठाए जा रहे थे। पर यह प्रसन्नता की ही बात है कि अब हिन्दी चिट्ठाजगत भी वयस्क हो रहा है, और हर तरह के मुद्दे उठाए जा रहे हैं और ज़िम्मेदारी के साथ उन पर बात होती है।

Akshargram Anugunjतो फिर शुरू करता हूँ धर्म के विषय में अपने विचारों से। क्या धर्म और ईश्वर में आस्था का परस्पर कोई सम्बन्ध है? मैं नहीं मानता। कम से कम हिन्दू धर्म के सम्बन्ध में तो मैं नहीं मानता। मैं पूर्ण रूप से नास्तिक हूँ। पूर्ण रूप से, मतलब इस में किसी तरह की रियायत की गुंजाइश नहीं है। फिर भी स्वयं को हिन्दू कहने से मैं गुरेज़ नहीं करता। इस विरोधाभास को मैं आगे समझाने का प्रयत्न करूँगा।

हाँ, तो मैं यह नहीं मानता कि ईश्वर जैसी कोई चीज़ है। मैं यह भी नहीं मानता कि सभी धर्म अच्छी चीज़ें सिखाते हैं, या यह कि ये सब “ईश्वर-रूपी सत्य” को पाने के अलग अलग रास्ते हैं। मैं यह भी नहीं मानता कि ज़िन्दगी में सही आचरण के लिए धर्म की आवश्यकता है। यह भी नहीं कि मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना। हो सकता है कि यह बातें कहने के लिए मुझे तनखाइया करार दिया जाए, और मेरा हुक्का पानी बन्द किया जाए, पर जब शुऐब ने पर्दा उठा ही दिया है, और रवि कामदार ने भी अपना काम कर दिया है, और जब संजय ने क्लॉज़ेट से बाहर निकलने का न्यौता दे ही दिया है तो फिर चुप रहने से क्या लाभ? इसलिए अपनी विचारधारा के इस पहलू को थोड़ा और विस्तार देने की कोशिश करूँगा।

ईश्वर क्यों नहीं है, यह साबित करने की ज़रूरत नहीं है। यह साबित करने की ज़रूरत है कि ईश्वर क्यों है। और ऐसा कोई सबूत अभी तक मुझे नहीं दिखा है। और शायद किसी ने कोशिश भी नहीं की है साबित करने की। आस्तिक लोग यह कहते हैं कि यह तो अपनी आस्था की बात है — इसे प्रमाणित करने की आवश्कता नहीं है। ठीक है, फिर सब की अलग अलग आस्था है, पर सत्य तो एक ही होता है न? यदि यह मान लिया जाए कि इन सब में से ही एक सत्य है, तो बाकी सब तो झूठे हुए न? फिर ये सब “ईश्वर-रूपी सत्य” को पाने के अलग अलग रास्ते कैसे हुए? एक ही तथ्य का यदि सत्य रूप बताना हो तो उस का एक ही तरीका होता है, पर उसी तथ्य का यदि असत्य रूप बताना हो तो उस के सैंकड़ों तरीके हो सकते हैं। यदि मैं आप से पूछता हूँ कि यह जो वाक्य आप पढ़ रहे हैं उस के फाँट का रंग कैसा है। पहले सच बताइए, फिर झूठ। सच बताएँगे तो सब का उत्तर होगा काला, पर झूठ बोलेंगे तो सब का जवाब अलग अलग होगा — लाल, पीला, हरा, नारंगी, इत्यादि। इसी तरह तथाकथित ईश्वर के बारे में हज़ारों धारणाओं के होने का अर्थ है कि वे सब असत्य हैं। हो सकता है कि मेरा सोचना भी ग़लत हो, पर वह भी इन हज़ारों झूठों में से एक झूठ होगा। सच क्या है, यह तो किसी को भी पता नहीं। यदि यह भी मान लिया जाए कि किसी तरह की कोई वाह्य महाशक्ति है, तब भी यह तो दावे के साथ कहा जा सकता है कि यह (भूत या वर्तमान के) किसी मानव को नहीं मालूम कि वह “महाशक्ति” क्या चाहती है, या कैसे काम करती है। क्या वह वाह्य महाशक्ति हम से अपनी पूजा करवाना चाहती है? क्या वह अच्छा काम करने वाले को इनाम देती है? क्या वह बुरा काम करने वाले को सज़ा देती है? क्या वह मदीना, हरिद्वार, ननकाना साहिब या वैटिकन जाने वाले को किसी तरह का इन्सेन्टिव देती है? इन और ऐसे हज़ारों और सवालों का जवाब है, “नहीं!” और सबूत हम सब अपनी रोज़मर्रा की ज़िन्दगी में देखते हैं। और अगर हमें पक्का नहीं मालूम कि भगवान क्या है और क्या चाहता है, तो हम क्यों अपनी ऊर्जा एक असत्य या कदाचित् सत्य की तलाश में व्यर्थ करते हैं?

आप कहेंगे, ठीक है भगवान है या नहीं है, यदि इस से मन में शान्ति मिलती है तो बुरा क्या है? मैं आप से सहमत हूँ। यदि आस्था उसी स्तर पर रहे — व्यक्तिगत स्तर पर शान्ति प्राप्त करने का यन्त्र, स्वार्थपूर्ण ही सही — तो ठीक है। पर इस आस्था के विभिन्न रूपों ने दुनिया में फायदा कम और नुक्सान ज़्यादा किया है। नास्तिकता का कोई नुक्सान ध्यान में नहीं आ रहा, पर आस्तिकता के मैं हज़ारों नुक्सान गिना सकता हूँ। कुछ पर नज़र डाली जाए

  • संसार में जितने फसादात चल रहे हैं, आज और हज़ारों सालों से, उन की जड़ यही है — खुदा, भगवान, गॉड। तीन दिन पहले ईराक में किसी सुन्नी ने एक शिया मस्जिद में ख़ुद को उड़ा दिया और साथ में ७० और लोगों के परखचे उड़ा दिए — यह अमरीका के खिलाफ लड़ाई तो नहीं थी। रोज़ ऐसे किस्से सुनने को मिलते हैं। इतिहास का कोई पन्ना और भूगोल का कोई भाग इस बीमारी से बचा नहीं है।
  • हाल में मैं ने १७वीं शताब्दी फ्राँस के भौतिक विज्ञानी पास्कल का कथन पढ़ा,

    Men never do evil so completely and cheerfully as when they do it from a religious conviction.

    और यह बात मुझे बिल्कुल सही लगी। जब आदमी बुरा काम यह सोच कर करता है कि यह धर्म का काम है, खुदा का काम है, तो वह खुशी से भी करता है, और बिना किसी अपराध बोध के भी। चाहे वह वर्ल्ड ट्रेड सेंटर में जहाज़ घुसाना हो या ग्राहम स्टेन्ज़ का कत्ल। कोई चोर-डाकू जब बैंक लूट रहा हो तो उसे कम से कम यह तो ख्याल होता है कि मैं ग़लत काम कर रहा हूँ। सीऍनऍन का कल जारी यह विडियो देखिए, जिस में संवाददाता बता रही है कि ९-११ की एक फ्लाइट में किस प्रकार आतंकवादी अल्लाह का नाम ले ले कर अपना काम पूरा कर रहे थे (Update: यह वीडियो अब उपलब्ध नहीं है, इस कारण अब इससे जुड़े लेख की कड़ी दे दी है)। और आज की रिपोर्ट पढ़िए, कि ज़कारियास मुसावी कैसे यह सब सुन कर खुश हो रहा है। न, न, यह मत कहिए कि मज़हब यह सब नहीं सिखाता। मज़हब यही सब सिखाता है, मुसावी कुरानेशरीफ़ में से उद्धरण दे कर अपना बयान दे रहा था। यदि ऐसा नहीं है तो कार्टूनिस्टों के खिलाफ़ फतवा जारी करने वाले लोग मुसावी के खिलाफ़ फतवा क्यों नहीं जारी करते? उसे पूरा यकीन है कि उसे जन्नत में जगह मिलेगी, और ७२ हूरें भी।

  • संसार में कितना धन, समय और ऊर्जा धार्मिक कामों और इमारतों पर खर्च होते हैं? यही संसाधन यदि किसी और तरीके से प्रयोग किए जाते तो संसार में कितना सकारात्मक परिवर्तन आता, इस का हिसाब लगाना कठिन है।
  • धार्मिक पुस्तक यदि एक ग़लत बात सिखाए तो मेरे हिसाब से वह बेकार है, पर यहाँ तो धार्मिक पुस्तकें इतनी उल्टी सीधी बातें सिखाती हैं कि समझ में नहीं आता हज़ारों साल तक करोड़ों लोग कैसे बेवक़ूफ़ बने रहते हैं। अब आप ही बताइए, हम मर्यादा पुरुषोत्तम राम की तरह धोबी के कहने पर पत्नी को त्यागें, या उन के पिता की तरह तीन पत्नियाँ रखें। सत्यमूर्ति युधिष्ठिर की तरह पत्नी समेत सब कुछ जुए में हारें, या भगवान शंकर की तरह अपने बेटे का ही सिर काट दें। ईसा का सन्देश फैलाने के लिए क्रुसेड करें, या मुहम्मद का पैग़ाम पहुँचाने के लिए जिहाद।
  • मैं कितने ही लोगों को जानता हूँ जिन्होंने ईश्वरोपासना को अपने जीवन का उद्देश्य मानकर उन कार्यों, उन लोगों की उपेक्षा की, जिन की उन के ऊपर ज़िम्मेवारी थी। यदि कोई भगवान बुद्ध की तरह बीवी बच्चों को सोता छोड़ कर निर्वाण की खोज में निकल पड़े तो उसे आप क्या कहेंगे? मैं तो उसे ग़ैर-ज़िम्मेदार और खुदगर्ज़ कहूँगा, खासकर यदि वह गौतम की तरह धनी राजकुमार न हो। कितने ही लोग हैं जो गृहस्थ में तो रहते हैं, पर धर्म के ढ़ोंग में इतने विलीन रहते हैं, कि आसपास के मानवों की भावनाओं की अनदेखी करते हैं।
  • धर्म का वास्ता दे कर कई लोग ऐसे निश्चय नहीं ले पाते जो अन्यथा नैतिक या व्यावहारिक रूप से सही हों। कुछ लोगों को रक्तदान से परहेज़ होता है, और कुछ लोगों को नसबन्दी से। उदाहरण के तौर पर मैंने अपने ड्राइविंग लाइसेंस पर लिखवा रखा है कि मेरे मरने पर मेरे शरीर का कोई भी भाग या पूरा शरीर किसी को दान दिया जाए या विज्ञान के लिए प्रयोग हो। यह कोई बड़ा काम नहीं है, क्योंकि जो चीज़ मेरे काम की नहीं है, मुझे क्या फ़र्क पड़ता है उस के साथ क्या हो — वरना मूल रूप से तो मैं भी स्वार्थ का ही पुजारी हूँ। परन्तु यदि मैं धार्मिक प्रवृत्ति का होता तो यह सोचता कि मेरा शरीर जलाया ही जाए और अस्थियाँ गंगा के प्रदूषण के लिए प्रयोग की जाएँ।
  • धर्म के कारण विज्ञान की बहुत अनदेखी होती है। बेचारे गैलिलियो को कितनी यातनाएँ सहनी पड़ीं, यह कहने के लिए कि पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करती है। डार्विन को तो अभी भी मज़हबियों की गालियाँ पड़ती हैं।
  • धर्म के कारण लोग देश द्रोह के लिए भी उतारू हो जाते हैं। अब कितना कहूँ, बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जाएगी।

खैर, इस लिस्ट का तो कोई अन्त नहीं है। धर्म को मानने वाले कहते हैं कि यदि धर्म न हो तो लोगों को जीवन की राह कैसे मिलेगी, सत्य-असत्य, सुकर्म-कुकर्म का अन्तर कैसे समझ में आएगा? यदि यह तर्क मान्य होता तो संसार के सारे नास्तिक झूठे, कुकर्मी, और अपराधी होते। बल्कि है इस का उलट। लगभग सब उल्टे-सीधे काम करने वाले ईश्वर में आस्था रखते हैं। नास्तिक विचारधारा एक सोच-समझ कर चुनी हुई विचारधारा होती है; एक नास्तिक को न तो यह डर होता है कि बुरा काम करने पर भगवान सज़ा देगा, न यह सांत्वना कि प्रसाद चढ़ाने पर माफ कर देगा। हो गया बराबर। फिर कैसे चलाएँ काम? वैसे ही जैसे भले लोग हमेशा चलाते रहे हैं — देश-काल के कानून से और समाज के नियमों से, जो समय और स्थान के हिसाब से बने होते हैं, और बदलते रहते हैं।

फिर यह दूसरे पैरे में स्वयं को हिन्दू कहने की क्या बात लिखी है? बताता हूँ। अगर उस के बाद आप मुझे पाखंडी कहें तो भी कोई बात नहीं। देखो भई, मैं नहीं मानता कि हिन्दुत्व एक मज़हब की परिभाषा पर खरा उतरता है। सब धर्मों की तरह हिन्दुत्व में भी बुराइयाँ तो हैं, पर हमें जो अच्छा लगता है, उसे अपनाएँ, जो बुरा लगता है, उसे ठुकराएँ। कोई ज़रूरी नहीं है कि मैं राम को मर्यादा पुरुषोत्तम मानूँ। मैं करोड़ों देवी देवताओं की पूजा करूँ, एक ईश्वर को मानूँ, या एक को भी न मानूँ, मुझे कोई यह नहीं कह सकता कि तुम हिन्दू नहीं रहे। न मुझे नास्तिक होते हुए भी शुऐब की तरह यह लिखने की ज़रूरत है कि मैं मुसलमान क्यों नहीं। मैं यह मानता हूँ कि धर्म मानव ने शुरू किए अपने अपने समय और स्थान के उपलब्ध ज्ञान के अनुसार। जब उसी धर्म को हज़ारों साल बाद, हज़ारों मील दूर रह रहे लोगों पर बिना बदले लागू करने की कोशिश हो, तब गड़बड़ होती है — वही मज़हब हो जाता है। मैं अपने परिवार की खुशी के लिए पूजा-पाठ में भी भाग ले लेता हूँ, और होली-दीवाली में जो आनन्द मिलता है, उसे तो भोगता ही हूँ — पर किसी भी तरह के अन्धविश्वास से दूर रहता हूँ। भारत में हिन्दू कहीं से भी आए हों, पर हिन्दुत्व पनपा तो भारत में ही है। मुझे लगता है कि हमारे त्यौहार भी कुछ सामाजिक, आर्थिक, व्यावहारिक कारणों से बने, और धीरे धीरे देवी देवताओं के साथ जोड़े गए। इन का हमारी ऋतुओं, फसलों की कटाई-बुवाई, व्यापारिक लेखे जोखे के साथ गहरा नाता है। फिर, इस में समय, स्थान के अनुरूप परिवर्तन होते रहे हैं। बंगाल में जो त्यौहार और रस्मोरिवाज हैं वे राजस्थान में नहीं, और कश्मीर में जो हैं, वे केरल में नहीं। आज से सौ साल पहले जो रस्मोरिवाज थे, वे आज नहीं हैं। हिन्दुत्व का यही अव्यवस्थित ग़ैरमज़हबीपन मुझे भाता है। ऐसा नहीं है कि हम में बुराइयाँ नहीं हैं, पर हम ने न बदलने की भी नहीं ठानी है।

कैसा लगा आप को एक नास्तिक हिन्दू से मिल कर? लिखिए आप की गालियों के लिए ही तो टिप्पणियों का डिब्बा रखा है।

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अनुगूँज 17: क्या भारतीय मुद्रा बदल जानी चाहिए?

Akshargram Anugunjभारतीय मुद्रा बदलने का रजनीश का सुझाव विचारणीय तो है, पर मेरे विचार में इस का उत्तर है — नहीं। अर्थशास्त्र पर अपनी पकड़ वैसे बहुत कमज़ोर है, इसलिए डिस्क्लेमर पहले सुना दूँ — इस विषय पर व्यक्‍त किए गए मेरे विचार पूर्ण रूप से व्यक्‍तिगत और अव्यवसायिक हैं, और पढ़ने वाला किसी भी नतीजे पर पहुँचने के लिए अपनी सोच खुद सोचे।

मुद्रा बदलने का विचार शायद रजनीश को “रोटी कपड़ा और मकान” के “हाय महंगाई…” गाने की यह लाइन सुन कर आया होगा

पहले मुट्ठी में पैसे दे कर थैला भर शक्कर आती थी,
अब थैले में पैसे जाते हैं, मुट्ठी में शक्कर आती है।

एक और डायलाग याद आता है एक पाकिस्तानी हास्य ड्रामा से। भारत में केबल-टीवी के सैलाब से पहले एक छोटा सा दौर आया था जब वीडियो लाइब्रेरियों का चलन हो गया था — अस्सी के दशक के उत्तरार्ध में। उन दिनों पाकिस्तान की स्टेज कॉमेडियों के विडियो बड़े मशहूर हो गए थे। “बकरा किस्तों पे” जैसे इन नाटकों में हास्य तो बड़ा भौंडा होता था, पर हंसी खूब आती थी। एक ड्रामा में उमर शरीफ़ कुछ ऐसे कहता है, “अमरीकी डालर ४० (पाकिस्तानी) रुपये का है, इस का मतलब एक अमरीकी अपने मुल्क से ४० गुना ज़्यादा मुहब्बत करता है।”

खैर मज़ाक को परे रख कर, मुझे नही लगता कि मुद्रा बदलने की बात वाजिब है। पहली बात तो यह कि केवल अमरीकी डालर या यूरो से तुलना करना सही नहीं है। आज की तारीख में एक अमरीकी डॉलर ११४ जापानी येन के बराबर है, यानी येन भारतीय रुपए से भी सस्ता है। इस का मतलब यह तो नहीं कि येन एक कमज़ोर मुद्रा है और इसे बदल देना चाहिए। यही हाल यूरोप की समान मुद्रा बनने से पहले इटली के लीरा और अन्य कुछ यूरोपीय मुद्राओं का था।

जो मुद्रास्फीति होती है, उस के हिसाब से मुद्रा स्वयं को निर्धारित करती ही है। हमारे बचपन में १,२ और ५ पैसे के सिक्के नज़र आते थे, पर अब चवन्नी अठन्नी के इलावा सारे सिक्के ग़ायब हैं। इसी तरह छोटी कीमत की मुद्रा ग़ायब होती जाती है, और शायद जल्द ही रुपये से छोटी मुद्रा मिलेगी ही नहीं। ऐसे में रुपये को १०० से भाग कर के पैसे के बराबर कर देना, और १०० रुपये को १ रुपया बना देना नाम के लिए तो रुपये को कीमती बनाएगा, पर लोगों की क्रय शक्‍ति (या अशक्‍ति) पर कोई असर नहीं होगा। कीमतें कम होंगी तो तनख्वाहें भी कम हो जाएँगी, और जो महा-कन्फ्यूजन होगा वह अलग। अभी कुछ तो दबाव है कि आज यदि डॉलर ४४ रुपये का है तो कल ४२ का हो जाए, फिर तो वह भी खत्म हो जाएगा। और फिर महंगाई और मुद्रास्फीति तो बढ़ती रहेगी, कितनी बार पुनर्मूल्यांकन करते रहेंगे।

हाँ, मुद्रा की कीमत कम होने से कुछ तो दिक्कत होती ही है। कुछ वर्ष पहले मैं हंगरी गया था, तो बुदापेश्त में एयरपोर्ट से होटल का भाड़ा ५००० फोरिंट के करीब दिया था, जो उस समय २०-२५ डॉलर के करीब था। हफ़्ता भर वहाँ था, तो जेब नोटों से भरी रखनी पड़ती थी। पर यहाँ अमरीका में वही हाल रेज़गारी के साथ होता है। यदि कुछ भी नकदी से खरीदें तो वापसी में बहुत सी रेज़गारी मिलती है, क्योंकि एक-एक सेंट का हिसाब होता है। जेब उस से भारी हो जाती है। गैस (पैट्रोल) का दाम तो यहाँ सेंट के दहाई हिस्से में गिना जाता है, यानी आज की कीमत है २ डॉलर १९.९ सेंट प्रति गैलन। शुक्र है कि टोटल को नज़दीक के सेंट में राउंड ऑफ कर दिया जाता है।

भविष्य की मुद्रा तो शायद प्लास्टिक और इंटरनेट ही रहेगी। यानी जहाँ तक हो सके क्रेडिट कार्ड, डेबिट कार्ड से काम चलाओ, इंटरनेट से सारे भुगतान करो। नोटों और रेज़गारी का झंझट ही नहीं। यहाँ तो हमारे साथ वही होता है। नकदी की ज़रूरत बहुत ही कम पड़ती है। पर भारत में ऐसी स्थिति कब आएगी? कुछ लोगों के लिए तो वहाँ यह स्थिति आ चुकी है, पर सब तक कब पहुँचेगी? शायद यह फिर कभी अनुगूँज का विषय बनेगा।

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अनुगूंज १६: (अति) आदर्शवादी संस्कार सही या गलत?

स्वामी जी बढ़िया रहे। इस विषय पर उन की प्रविष्टि पहले आई, और अनुगूँज बाद में घोषित हुई। यह तो वही हुआ कि जो आप ने पहले ही पढ़ा है उसी पर आप को डिग्री दी जाएगी। फिर खानापूर्ति के लिए एक और प्रविष्टि लिख दी, जिस पर अनूप भाई ने कंजूसी का आरोप सही लगाया है। स्वामी जी, आप से थोड़े लम्बे व्याख्यान की अपेक्षा थी।

Akshargram Anugunjजब भी किसी अनुगूँज की घोषणा होती है, मैं सोचने लग जाता हूँ और चाहता हूँ कि प्रविष्टि लिखूँ। पर जब तक ख्यालों को तरतीब दे पाता हूँ, अन्तिम तिथि आ भी जाती है और निकल भी जाती है। विषय दिल के करीब हो तो दुख होता है, जैसा कि पंकज का विषय था, “हम फिल्में क्यों देखते हैं”। खैर इस बार अपना पढ़ाई का सेमेस्टर १४ दिसम्बर को समाप्त हुआ, १५ को दफ्तर के काम से पिट्सबर्ग गया था, और आज आखिरी तारीख निकलने से पहले उम्मीद है कि जैसे तैसे प्रविष्टि लिख ही दूँगा।

चलिए मुद्दे पर आया जाए। तो, प्रश्न था

… आज के अभिभावकों और युवाओं से, की वो कौन से आदर्श, संस्कार और शिक्षाएं हैं जो आज के परिपेक्ष्य में अव्यव्हारिक और पुरातन लगते हैं – जिनकी वजह से आपको परिपक्वता पा लेने के बाद में सामाजिक जीवन में कठिनाईयां आईं – जिन्हें आपको छोडना या बदलना पडा. वो कौन सी शिक्षाएं हैं जिन्होंने आपको सफ़ल होंने में सहायता की? अपने अनुभवों के आधार पर आप आने वाली पीढी को कौन सी शिक्षा कुछ अलग दोगे या अलग प्रकार से सिखाओगे, और क्यों?

दरअसल इस पर जितना सोचता हूँ उतना कन्फ्यूजिया जाता हूँ। आदर्श, संस्कार और शिक्षाएँ तो बचपन में बहुत मिले, उन में से बहुत सारे आत्मसात् किए और बहुत से अस्वीकार किए। यह प्रक्रिया परिपक्वता पा लेने के बाद अचानक नहीं हुई, पर एक निरन्तर परिवर्तन के रूप में बचपन से ही होती रही – बिना किसी सचेत प्रयास के। बचपन की शिक्षाओं, घटनाओं के आधार पर जो व्यक्‍तित्व बन निकला वह किसी भी सूरत में परिपूर्ण नहीं था, और उस से कठिनाइयाँ भी आईं, पर आदमी अपने मूल व्यक्‍तित्व को कितना बदल सकता है?

घर में धार्मिक माहौल था, सैकड़ों तरह के रस्मो रिवाज, दर्जनों अवधारणाएँ और पूर्वाग्रह। पर बचपन से ही जो अच्छा नहीं लगा, उस को मैं अस्वीकृत करता आया। कुछ बन्धन अपने लिए तोड़े कुछ से घरवालों को भी मुक्‍त किया। घर में मुसलमान मज़दूर आदि आते थे तो उन के लिए अलग प्याला कील पर लटका होता था। वे चाय पीते तो कील से अपना प्याला उठा कर। उन के बर्तन में चाय ड़ालते समय मजाल है कि केतली या पतीला उन के बर्तन से छू जाए। मैं मज़ाक उड़ाता था, “क्या चाय की धार में से अपवित्रता का संचार नहीं होता?” मेरे अपने मुस्लिम दोस्त बने, घर में आए, तो यह रस्म खत्म हो गई। हम जान बूझ कर एक दूसरे का जूठा खाते थे, और वह भी औरों को दिखा दिखा कर – दोनों तरफ़ के लोगों को। जब मेरे यज्ञोपवीत (जनेऊ) की रस्म हुई तो मेरा दोस्त महबूब प्रसाद-वितरण कर रहा था।

औरों को बदलने का फिर भी न ठेका लिया, न ज़्यादा सफलता मिली। खुद में जो रह गया, जो व्यक्तित्व में विकृतियाँ रह गईं उन के लिए स्वयं को दोषी मानता हूँ। अभिभावकों की सीख को दोषी नहीं ठहराता। मेरे विचार में हर आदमी ज़िन्दगी में अपना रास्ता खुद चुनता है, और अपने निर्णयों और उन के निष्कर्षों के लिए खुद ज़िम्मेवार होता है।

ज़िन्दगी को चलाने के लिए जितने नियम चाहिएँ, उन के लिए मेरे विचार में न तो धर्मग्रन्थों की आवश्यकता है, न संस्कारों की। किसी को तकलीफ मत पहुँचाओ, बेईमानी मत करो, स्वच्छ रहो, इन सब निष्कर्षों तक पहुँचने के लिए कितना दिमाग़ चाहिए? इस के लिए न तो भगवद्गीता चाहिए, न बाइबल, न कुरानेशरीफ, न माँ बाप की शिक्षा; अपनी अन्तरात्मा, देशकाल की व्यवस्था और कानून ही काफी है। हाँ, भोजन आरंभ करने से पहले मन्त्र कौन सा पढ़ना है, यज्ञ में कीमती चीज़ों की आहुति देते समय क्या बुदबुदाना है, इस के लिए धर्मग्रन्थ चाहिएँ। खाने से पहले जानवर को हलाल कैसे करना है, इस के लिए धर्मग्रन्थ चाहिएँ। बिना सोचे समझे इस सब पचड़ों में पड़ेंगे तो वही होगा जो आज दुनिया भर में हो रहा है।

यही सोच समझ कर मैं यह भी कोशिश करता हूँ कि अपने बच्चों को भी किसी पूर्वनिर्धारित विचारधारा में नहीं बान्धूँ। हाँ, मैं क्या सोचता हूँ, यह उन को बताता हूँ।

आजकल लाल्टू जी के लेख, और उन पर मनोज जी की टिप्पणियाँ पढ़ता हूँ तो उन में देशभक्‍ति और राष्ट्रवाद के प्रति तिरस्कार की झलक देखता हूँ। बचपन से कई लोग इस विचारधारा के भी मिले। पर स्वयं में यह “गुण” नहीं ला पाया। चाहे अमरीका में रह कर भारत से भक्ति हो, चाहे कश्मीर का नाम सुनते ही कान खड़े हो जाने की प्रवृति हो, चाहे नास्तिक होने पर भी हिन्दुत्व पर गर्व की बात हो, चाहे यह सब ढ़ोंग लगता हो, पर इस सब से स्वयं को अलग नहीं कर पाया। बचपन में किसी के कहे जाने पर कि “देशभक्‍ति एक फालतू विचारधारा है”, जो आश्चर्य और दुख होता था, वही आज भी होता है। कोई “ईमेल-राष्ट्रवाद” नाम की बीमारी का भी ज़िक्र किया जाता है, जैसे कि “ईमेल-वामपन्थ” नहीं होता।

मैं यह मानता हूँ कि हर व्यक्ति की धार्मिक विचारधारा और उसका धर्म उसका व्यक्तिगत मामला होना चाहिए, और जहाँ देश की बात आए, कानून की बात आए, धर्म को पूरी तरह से अलग रखा जाना चाहिए। आम ज़िन्दगी में भी ऐसे चिह्नों को टाला जाना चाहिए जो व्यक्ति के धर्म का ऐलान करते हों, चाहे वह लम्बा सा तिलक हो, मौलवी जैसी दाढ़ी हो, या सरदार जी की पगड़ी। पर फिर, आप कितने चिह्नों को टालेंगे। अक्सर तो नाम से ही धर्म का पता लग जाता है — तो क्या हम सब नाम बदल लें? मैं ने कहा न, मैं कन्फ्यूज़्ड हूँ।

मैं यह भी मानता हूँ कि कई बार परंपरापूर्ण व्यवस्था में परंपराओं को तोड़ने में जितनी हिम्मत लगती है, उतनी ही हिम्मत लगती है एक “आधुनिक” व्यवस्था में परंपरा को बरकरार रखने में। इसलिए मैं उन लोगों की हिम्मत को भी दाद देता हूँ जो मुश्किल होने के बावजूद इन सब चिह्नों को पालते हैं। यहाँ अपनी कक्षा के लिए विश्वविद्यालय जाता हूँ, तो अक्सर एक विद्यार्थी दिखता है, जो रोज़ लम्बा, लाल तिलक लगाए कक्षा में जाता है। अमरीका में यह करने के लिए हिम्मत चाहिए। मेरा सिख दोस्त है, जो मुझे मालूम है कि बाल काटे तो बहुत ज़्यादा तरक्की कर सकता है, पर वह न सिर्फ रोज़ पगड़ी पहने काम पर जाता है, लोगों की टेढ़ी नज़रों का जवाब देता है सिख धर्म के बारे में छपे एक सूचना पत्र से, ताकि लोग जो सिखों को जेहादियों जैसा समझते हैं, उन का भ्रम दूर हो।

और मैं हूँ कि जब भी अपनी पत्‍नी के साथ बाज़ार जाता हूँ तो कोशिश करता हूँ कि वह सलवार कमीज़ न पहने, पश्चिमी कपड़े पहने, या साड़ी। कहता हूँ, “क्यों बेकार लोगों की दुर्भावना का शिकार बनो, वैसे भी ९-११ के बाद लोगों की नज़रें बदल गई हैं।”

यदि यह सब पढ़ कर आप को लग रहा है कि यह बन्दा उलझा हुआ है, और परस्पर विरोधी बातें कह रहा है, तो आप अकेले नहीं हैं। मैं भी आप के साथ हूँ। मुझे कुछ नहीं चाहिए, चाहिए तो बस अनुगूँज के इलेक्शन में आप का कीमती वोट ;-)।

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हिन्दी जाल जगत – आगे क्या?

यह चर्चा आरंभ करने के लिए आलोक का धन्यवाद।

Akshargram Anugunjसब से पहली बात यह समझने की है कि इंटरनेट हमारे समाज का ही आईना है। हमारे समाज का एक अधूरा आईना, जिस में हम केवल समाज के पढ़े-लिखे, “आधुनिक”, मध्यम-आय (और ऊपर) और मध्यम-आयु (और नीचे) वर्ग का प्रतिबिम्ब देख सकते हैं। समाज के इस वर्ग में हिन्दी का क्या स्थान है? जब इस वर्ग का आम व्यक्ति रोज़मर्रा की ज़िन्दगी में हिन्दी की बजाय अंग्रेज़ी को प्राथमिकता देता है, तो हम यह कैसे उम्मीद कर सकते हैं कि इंटरनेट-नुमा आईने में हमें कुछ और दिखेगा। जब यह वर्ग समाचार के लिए अंग्रेज़ी समाचार पत्रों पर निर्भर रहता है, तो यह कैसे होगा कि गंभीर इंटरनेट खोज के लिए हिन्दी जालपृष्ठों पर निर्भर रहे? हाँ, ज़रूरत यह है कि इस वर्ग का विकास कर के कंप्यूटर और इंटरनेट को उन लोगों तक पहुँचाया जाए जो अंग्रेज़ी की जगह हिन्दी को प्राथमिकता देते हैं।

मेरा मानना है कि इंटरनेट पर हिन्दी का स्थान न सिर्फ समाज में हिन्दी के स्थान का प्रतिबिम्ब है, बल्कि कुछ मामलों में तो इंटरनेट समाज में हिन्दी के प्रयोग में बढ़ोतरी कर रहा है। और आगे भी और बढ़ोतरी होगी, या यूँ कहें कि हाल में हिन्दी में हो रही अवनति पर कुछ लगाम लग रही है। हम में से कितने लोग अपने व्यक्तिगत, ड़ाक से जाने वाले पत्र हिन्दी में लिखते थे? हम में से कितने लोग नियमित रूप से हिन्दी समाचार पत्र पढ़ते थे?

एक बार आलोक द्वारा उठाए गए प्रश्नों पर नज़र ड़ाली जाए

(1) क्या यह स्थिति वाञ्छनीय है? यदि हाँ, तो क्यों? यदि नहीं तो क्यों नहीं?

स्थिति वांछनीय तो नहीं है, पर दयनीय भी नहीं है। आशा की किरण मौजूद है और उजली भी है। पिछले पाँच वर्षों में इंटरनेट पर हुई प्रगति को देखिए। उस से पहले इंटरनेट पर हिन्दी नहीं के बराबर थी। जितनी दर्जन भर साइटें थीं सब की अपनी अपनी मुद्रलिपियाँ थीं। मुद्रलिपि को बनाने और लोगों के कंप्यूटरों तक पहुँचाने में जाल-निर्माताओं को बहुत मेहनत करनी पड़ती थी। आम पाठक फॉण्ट डाउनलोड करने में आलस करता था, तो डाइनमिक फॉण्ट तकनीकों पर मेहनत की जा रही थी। यूनिकोड ने वह सब बदल दिया, और तब से इंटरनेट पर हिन्दी दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की कर रही है। डीमोज़ निर्देशिका के अनुसार छः-सात सौ हिन्दी जालघर हैं, पर इस संख्या को पत्थर की लकीर नहीं माना जा सकता। कितनी ही साइटें होंगी जो इस तरह की निर्देशिकाओं तक नहीं पहुँच पाई होंगी।

(2) इतना तो निश्चित है कि जाल पर हिन्दी बढ़ेगी। पर क्या बढ़ने की रफ़्तार वही रहेगी जो अभी है? या रफ़्तार कम होगी? या रफ़्तार बढ़ेगी?

मेरे विचार में जाल पर हिन्दी के विस्तार की गति बढ़ेगी। फिर भी अँग्रेज़ी के करीब पहुँचना या उस का स्थान लेना न तो हिन्दी के बस की बात है, न किसी और भाषा के। अंग्रेज़ी (या रोमन लिपि) कंप्यूटर की भाषा बन चुकी है, और इस तथ्य को बदल पाना काफी मुश्किल है। कहने वाले कहते हैं कि संस्कृत कंप्यूटर के लिए सब से उपयुक्‍त भाषा है। शायद यह सही भी हो, पर संस्कृत की भूमि भारत में कितने लोग संस्कृत बोलते हैं? शायद उंगलियाँ ही काफी होंगी ऐसे लोगों को गिनने के लिए।

(3) क्या हिन्दी जाल जगत को सर्वाङ्गीण विकास की आवश्यकता है? क्या विकास की दिशा का नियन्त्रण किया जाना चाहिए या इसे अपने आप फलने फूलने या ढलने देना चाहिए? साथ ही, वैयक्तिक रूप से क्या हम इस विकास पर कोई असर डाल सकते हैं?

हिन्दी जाल जगत को सर्वांगीण विकास की आवश्यकता है। यह ज़रूरी है कि हिन्दी के और चिट्ठे बनें। चिट्ठों में अधिक लिखा जाए। अधिक जालस्थल बनें — केवल मुँहदिखाई के लिए नहीं बल्कि कार्यशील जालस्थल — वेब दुकानें, कंपनियों की वेबसाइटें, रेल आरक्षण, हवाई आरक्षण की साइटें, आदि। हिन्दी में चलने वाले अधिक प्रोग्राम बनें। अधिक ईमेलें हिन्दी में लिखी जाएँ। यूज़नेट पर हिन्दी यूज़ हो।

विकास की दिशा का नियन्त्रण किया तो जाए पर कैसे? और कौन करे? मेरे विचार में इसे अपने आप फलने फूलने और ढलने देना चाहिए। किसी एक व्यक्‍ति या संस्था के विचार में जो सही दिशा होगी, वह हो सकता है, दूसरे व्यक्‍ति या संस्था के विचार में नहीं हो। विकास के लिए सभी काम करें, वैयक्तिक स्तर पर काम करें, संस्थाओं के स्तर पर काम करें, ताकि चहुँमुखी विकास हो।

चिट्ठाकारी अभी तक का सर्वोत्तम माध्यम
पिछले साल भर से ब्लॉग लिखने पढ़ने के बाद मैं इस निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ कि ब्लॉग अभी तक अन्तर्जाल पर हिन्दी अभिव्यक्ति का सर्वोत्तम माध्यम है। चिट्ठाकारी से इंटरनेट पर हिन्दी जानने वालों की मलाई सतह पर आ गई है। जो चिट्ठा लिखता है, पढ़ता है, वह गंभीरता से हिन्दी में रुचि रखता है। इन में से कई लोग ऐसे हैं जिन का लेखन चिट्ठाकारी से ही पनपा है, पहले सही मंच के अभाव मे लिखते नहीं थे, लिखते भी थे तो छापते नहीं थे। ब्लॉग ने लोगों को लिखने के लिए उकसाया है, और लिखे हुए पर लेखक का अपना स्वामित्व होने के कारण उस में और निखार आया है। मेरे विचार में चिट्ठाकारी अपने चरम पर कतई नहीं पहुँची है। यह सौ चिट्ठे तो शुरुआत है। हर रोज़ नए चिट्ठाकार जुड़ रहे हैं, और जैसे जैसे और लोग जानेंगे, और लोग जुड़ेंगे।

अभिव्यक्ति के अन्य माध्यम – व्यक्‍तिगत जालस्थल, ड़ाक-समूह (मेलिंग लिस्टें) और यूज़नेट
चिट्ठाकारी से पहले से यही सब माध्यम थे इंटरनेट पर हिन्दी अभिव्यक्ति के — पर सब में चिट्ठाकारी के मुकाबले कुछ न कुछ खामियाँ हैं। सामान्य व्यक्तिगत जालस्थलों में यह कमी रही है कि संवाद एकतरफा रहता है, और कुछ समय के बाद दुकान या तो बन्द हो जाती है या ढ़ीली पड़ जाती है। यूज़नेट सब का है और इसलिए किसी का नहीं। यूज़नेट के कुछ ही मंच ऐसे हैं जहाँ गंभीरतापूर्वक विचार विमर्श होता है, और समस्याएँ सुलझाई जाती हैं। अधिकतर तो वहाँ गाली गलौज़ ही होती है। यदि आप को पाकिस्तान को गाली देनी है तो soc.culture.pakistan पर जाइए, और यदि भारत को गाली देनी है तो soc.culture.india पर। दुनिया भर के मवाली इन मंचों पर आते हैं, क्योंकि कोई रोकने वाला नहीं है। alt.languages.hindi पर कोई सीडी बेच रहा है तो कोई कैनडा में पढ़ाई के विज्ञापन दे रहा है। कोई गाली गलौज़ लिखता है तो उसे हटाने वाला कोई नहीं है।

संक्षेप में, गंभीर इंटरनेट प्रयोक्ता के लिए शायद यूज़नेट सर्वोत्तम स्थान नहीं है। कुछ दिन पहले आलोक जी ने दहेज के विषय पर बहस छेड़नी चाही यूज़नेट पर – बहुत ही रोचक और विचारोत्तेजक मुद्दे उठाए थे। न्यौता दिया अपने चिट्ठे पर, ताकि चिट्ठा पाठक भी आएँ, यूज़नेट वाले तो थे ही। हुआ यह कि इतना रोचक विषय होने पर भी यूज़नेट पर मेरे सिवा कोई नहीं गया (यह प्रविष्टि लिखे जाने तक), और चिट्ठे पर प्रतिक्रियाएँ इसलिए नहीं हो पाईं कि वहाँ टिप्पणियाँ बन्द थीं। आलोक भाई, प्रविष्टि पर टिप्पणियों की अनुमति दीजिए, फिर देखिए कैसे होती है ज़ोरदार चर्चा।

यूज़नेट से कुछ बेहतर हैं विभिन्न व्यक्तियों के द्वारा चलाए जा रहे चर्चा समूह, जहाँ कुछ नियन्त्रण रहता है, और मवाली एकदम बाहर कर दिए जाते हैं।

अब प्रश्न यह है कि इंटरनेट पर हिन्दी को और बढ़ावा देने के लिए क्या किया जा सकता है?

पिछले दो-एक वर्षों में जाल पर हिन्दी के प्रयोग में बढ़ोतरी हुई है यूनिकोड़ के चलते। और जैसे जैसे यूनिकोड का प्रयोग बढ़ेगा, जाल पर हिन्दी का प्रयोग बढ़ेगा। इस का समाधान करने के लिए कम से कम यह कदम उठाए जाने ज़रूरी हैं –

साइबर कैफेओं का हिन्दीकरण
भारत में अधिकांश लोग इंटरनेट के लिए साइबर कैफेओं पर निर्भर हैं, और मैं ने सुना है कि अधिकांश साइबर कैफेओं पर हिन्दी पढ़ने लिखने की सुविधा नहीं है। इन के कंप्यूटर विन्डोज़-९८ पर चलते हैं, और ये कुछ भी डाउनलोड करने की इजाज़त नहीं देते। वैसे ही आम कंप्यूटर प्रयोक्ता फॉण्ट डाउनलोड में रुचि नहीं लेता। हमें एक अभियान चलाना चाहिए ताकि सभी साइबर कैफेओं का हिन्दीकरण हो। हम एक स्टिकर जैसा बनाएँ – “मेरा कंप्यूटर हिन्दी जानता है” जैसा। हर शहर में संपर्क और तकनीकी सहायता के लिए हमारे स्वयंसेवक हों, जो साइबर कैफेओं के हिन्दीकरण (फॉण्ट डाउनलोड,आदि) में सहायता करें। साथ ही जो बड़ी बड़ी साइबरकैफे चलाने वाली कंपनिया हैं, उन्हें हम मिल कर लिखें।

वर्तमान हिन्दी साइटों का यूनिकोडीकरण
यह समझना थोड़ा कठिन है कि अभिव्यक्ति हिन्दी, हिन्दुस्तान, अमर उजाला, दैनिक जागरण, नव भारत, नई दुनिया, जैसे प्रमुख जालस्थल यूनिकोड का प्रयोग क्यों नहीं करते। इन की मुद्रलिपियाँ पढ़ने में भद्दी लगती हैं, ये खोज इंजनों द्वारा खोजे नहीं जाते, और इन्हें पढ़ने के लिए अपने कंप्यूटर पर नए फॉण्ट डालने पड़ते हैं जो निहायत ही ग़ैर ज़रूरी है (या उन की डाइनमिक फॉण्ट स्क्रिपटें चलानी पड़ती हैं)। क्या इन लोगों को यूनिकोड के फायदों का पता नहीं है, या कोई और कारण है कि ये लोग अपनी अपनी गई गुज़री मुद्रलिपियों से लिपटे हुए हैं? इन को मिल कर लिखा जाना चाहिए और समझाया जाना चाहिए के ये अपनी साइटों को यूनिकोड में परिवर्तित करें।

उम्मीद है कि इस सारी चर्चा से कुछ महत्वपूर्ण मुद्दे उभरेंगे, और अन्त में कुछ कदम उठाए जाएँगे जिन से हमारी प्यारी भाषा का इंटरनेट पर विकास हो।

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एक पाती, पाती के नाम (10वीं अनुगूँज)

मेरी प्यारी पाती,

Akshargram Anugunj मुझे बहुत दुख है कि तुम अब इस दुनिया में नहीं रही। खैर जहाँ भी हो, सुखी रहो। इस दुनिया में फिर आने की तो उम्मीद छोड़ दो क्योंकि इस दुनिया में तुम्हारा स्थान ईमेल ने ले लिया है। सालों हो गए तुम्हें गुज़रे हुए। वास्तव में तुम्हारी याद तो बहुत आती है। तुम्हारे रहते ही तुम्हारी पूछ बहुत कम हो गई थी, जैसा हर किसी के साथ बुढ़ापे में होता है। लोग खबर एक दूसरे तक पहुँचाने के लिए पहले ही टेलीफोन का इस्तेमाल करने लग गए थे।

पाती लिखने के लिए कहा गया, तो मन में आया कि वास्तव में पाती ही लिखता हूँ। वही पुरानी “फूलों के रंग से, दिल की कलम से, तुझको लिखी रोज़ पाती” वाली पाती। सोचा वास्तव में चिट्ठी लिख कर उसे स्कैन करूँगा, पर देखते देखते समय निकल गया, और आसान यही लगा कि चिट्ठी तो हो नहीं पाएगी इसलिए चिट्ठा ही सही, जिस का काम भले अलग हो, नाम तो तुम से मिलता है। दिल की कलम तो तैयार थी, पर फूलों के रंग, और कोरा कागज़ ढूँढते ढूँढते समय निकल गया।

याद है जब आशिकों के बजट में कागज़, कलम और डाक-टिकट का खर्च हुआ करते थे? भूल जाओ वे दिन, अब मजनू मियाँ की जान निकल जाती है टेलीफोन का बिल भरते भरते। तुम्हारे ज़माने में जब तुम्हें आने में देर हो जाती थी तो तुम्हारे इन्तज़ार में लोग कहते थे

या खुदा क्यों उन का खत आना बन्द हुआ,
क्या मुहब्बत बन्द हुई या डाकखाना बन्द हुआ।

और अब मुझे लगता है तुम्हारे साथ साथ डाकखाने के भी दिन पूरे हो चुके हैं। याद है, तुम्हारी छोटी बहन “तार” जो छोटी होने के कारण फुर्ती से एक जगह से दूसरी जगह पहुँच जाया करती थी? आगे समाचार यह है कि तुम्हारे जाते ही उसका भी देहान्त हो गया। याद है, तारघर में कितनी लम्बी कतारें होती थीं तार भेजने के लिए? अब तारघर में तो समझो ताला ही लग गया है।

हम जैसे लोग जिन को चिट्ठी पत्री का शौक होता था, चिट्ठी का जवाब मिलने से पहले ही चिट्ठी तैयार रखते थे

कासिद के आते आते खत इक और लिख रखूँ
मैं जानता हूँ वो जो लिखेंगे जवाब मे।

पर जो भी हो, जो बात तुम में थी, वह ईमेल में नहीं। इस ईमेल के ज़रिए तुम्हें यही बताना चाहता हूँ कि तुम्हारी जगह कोई नहीं ले सकता। कहाँ वह काग़ज़ की खुशबू, वह सलाम करने लायक लिखावट की ज़ेरो-ज़बर। भला किसी को सुना है ईमेल को चूमते हुए? फिल्म में खत हाथ में ले कर गाना गाना हो तो पहले ईमेल को प्रिंट करना पड़ेगा।

अच्छा एक बार फिर अलविदा, तुम न सही, तुम्हारी याद तो हमेशा रहेगी।

तुम्हारा
क. ख. ग.

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आशा ही जीवन है – नवीं अनुगूँज

Akshargram Anugunj
मैं एक इनक्युअरेब्ल ऑपटिमिस्ट हूँ, यानी लाइलाज आशावादी। मैं इस बात में सौ प्रतिशत विश्वास करता हूँ कि आशा ही जीवन है। ज़िन्दगी में कुछ भी गुज़र जाए, मैं हमेशा यही मानता हूँ कि शायद इस से बुरा भी हो सकता था, और जो मेरे साथ हो रहा है, हज़ारों-लाखों लोगों के साथ रोज़ इस से बुरा होता है। इसीलिए मुझे “संघर्ष से सफलता” की कहानियाँ बहुत प्रेरित करती हैं। चाहे वह अन्धी-बहरी हेलेन केलर की कहानी हो, या पैरा-ओलंपिक्स में भाग लेने वाले किसी अपंग खिलाड़ी की। आशा ही तो है जिस के बल पर लोग जीते हैं, आशा के बिना क्या जीना।

कभी भारत के बारे में, कभी बिहार के बारे में यह चुटकुला बहुत सुनाया जाता है, “जापान के किसी नास्तिक वैज्ञानिक ने यहाँ आ कर कहा – मुझे यहाँ आकर भगवान पर विश्वास हो गया है। वह इसलिए कि जब हर कोई नोच नोच कर खाने में लगा हुआ है तो देश चल कैसे रहा है? यह ज़रूर भगवान की ही करामत है।”

एइन रैंड मेरी मनपसन्द लेखिका हैं, और उन के उपन्यास फाउन्टेनहैड और ऍटलस श्रग्ड मेरे मनपसन्द उपन्यासों में से हैं। ऍटलस श्रग्ड ऐसे कुछ गिने चुने लोगों की कहानी है जो दुनिया को अपने कन्धे पर चलाते हैं, यानी जब सारी दुनिया के लोग नोच नोच कर खा रहे होते हैं तो कुछ गिने चुने लोग तब भी काम कर रहे होते हैं, ईमानदारी से, लगन से, बिना बाकी लोगों की परवा किए हुए। मेरा यह मानना है कि बिहार को, भारत को, दुनिया को, यही गिने चुने लोग चलाते हैं। यह मेरे आशावाद का हिस्सा है।

रोज़ समाचारों में कई निराशाजनक घटनाओं के साथ साथ कुछ ऐसी चीज़े भी सुनने को मिलती हैं जिन से मानवता में आशा और विश्वास की झलक मिलती है। कल ही रेडियो पर सुनी दो बातों के बारे में बताना चाहूँगा। बीसवीं शताब्दी के आरंभ में जन्मा लू गेरिग अमरीकी बेसबाल के सब से मशहूर खिलाड़ियों में से माना जाता है। १९३९ में जब वह ३६ साल की उम्र में एक रहस्यमयी बीमारी के चलते खेल से रिटायर हो रहा था, ज़िन्दगी की कोई आशा न होते हुए भी, उस ने अपने भाषण में यह कहा, “मैं स्वयं को दुनिया का सब से खुशक़िस्मत आदमी समझता हूँ। अन्त मेरा भला नहीं हो रहा, पर ज़िन्दगी मैं ने जितनी जी, भरपूर जी”। दो साल बाद लू का देहान्त हो गया। ALS की बीमारी जिस का पक्का इलाज ढूँढने में अभी भी वैज्ञानिक लगे हुए हैं, लू गेरिग डिज़ीज़ के नाम से जानी जाती है।

रेफ ऍस्क्विथ को बड़े बड़े पुरस्कारों से नवाज़ा जा चुका है, पर पिछले २४ वर्षों से वह लॉस एंजिलिस के एक सरकारी प्राइमरी स्कूल में ऐसे बच्चों को पढ़ा रहा है, जो ग़रीब परिवारों से आए हैं। उन के ऊपर इतना ध्यान दे रहा है, कि वे किसी उच्च कोटि के प्राइवेट स्कूल के बच्चों को मात दें। रेफ की पांचवीं कक्षा के बच्चे शेक्सपीयर पढ़ते हैं, संगीत सीखते हैं, नाटकों में भाग लेते हैं। तनख्वाह वही मिलती है, जो आम स्कूल अध्यापक को मिलती है। कई जगहों से अच्छी नौकरियाँ मिलने के बाद भी रेफ ऍस्क्विथ अपने स्कूल, अपने बच्चों को नहीं छोड़ता।

ऐसा नहीं कि आशावाद में खूबियाँ ही खूबियाँ हैं, या निराशावाद में बुराइयाँ ही बुराइयाँ हैं। कहा जाता है कि दोनों तरह के लोग समाज को कुछ न कुछ देते हैं — आशावादी ने हवाई जहाज़ का आविष्कार किया, तो निराशावादी ने पैराशूट का।

दो दोस्त थे, एक आशावादी और एक निराशावादी। सैर को निकलने की बात हो रही थी तो निराशावादी डर रहा था कि अभी अभी नहा के निकला हूँ कोई पक्षी बीट न कर दे। आशावादी ने कहा, इतना बड़ा आस्मान है, इतनी बड़ी ज़मीन है, तुम्हें यह क्यों लग रहा है कि बीट तुम्हारे ही ऊपर गिरेगी। निराशावादी मान गया, पर उसका ड़र सही निकला। निकलते ही एक पक्षी ने उस के सारे कपड़े गन्दे कर दिए। उस ने अपने दोस्त से कहा, “अब खोजो इस में आशा की किरण”। आशावादी बोला, “भैया, भगवान का शुक्र करो कि हाथियों के पंख नहीं होते।”

खैर यह थे आशावाद पर अपने विचार। अधिक आशावाद का यह भी नुक्सान है कि मैं हर काम देर से करता हूँ, यह सोच कर कि हो जाएगा, कोई मुसीबत नहीं आने वाली। निराशावादी शायद हर काम पहले करते होंगे, यह सोच कर कि पता नहीं कल क्या हो जाए। यह प्रविष्टि इस आशा के साथ लिख रहा हूँ कि अनुनाद जी अब भी अपने अवलोकन में शामिल कर लेंगे। अच्छा शायद यह है कि दोनों चीज़ों का सन्तुलित मिश्रण होना चाहिए। “भविष्य की योजना ऐसी बनाओ जैसे सौ साल जीना हो, काम ऐसे करो जैसे कल मरना हो।” चलते चलते यह बता दूँ कि मेरे लिए आशा के बिना बिल्कुल जीवन नहीं है, चाहे लड़े, चाहे मरें, आशा के साथ अग्नि के सात फेरे जो लिए हैं।

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सातवीं अनुगूँज – बचपन के मेरे मीत

बचपन के मीत — बड़ा ही भावुक और दिल के करीब का विषय है यह। जैसे ही विषय की घोषणा हुई, मैंने सोचा कि अपनी प्रविष्टि तो निश्चित है। पर अलाली का आलम यह है कि कोई बात तब तक नहीं होती जब तक उस की अन्तिम तिथि न आ जाए। अंकल सैम से टैक्स रिफंड के रूप में पैसे भी वापस लेने हों, तो उसकी कार्रवाई भी १५ अप्रैल से पहले नहीं होती।

खैर, मुद्दे की बात की जाए। सब की तरह बचपन के कई मीत बने, बिछड़े, और अब कभी कभार ही मिलना हो पाता है। फिर भी यादें जीवन भर साथ रहती हैं। कुछ दोस्तों के बारे में कहना चाहूँगा, पर नाम ज़रूरी नहीं हैं उन के असली प्रयोग करूँ।

एक दोस्त था मेरा सुरेश। वह मेरा दोस्त कैसे बना इस की कहानी दिलचस्प है। हम कालेज में नए नए थे और मैं किराये का कमरा लेकर श्रीनगर में रहता था। गाँव से नए नए आए थे, खास मिलना जुलना था नहीं। Akshargram Anugunj 7मेरे सामने वाली खिड़की में जो चान्द का टुकड़ा रहता था, वह हम से तो उखड़ा उखड़ा रहता था, पर बाद में पता चला कि मेरा सहपाठी सुरेश उन की गुड बुक्स में था। सुरेश पास के मोहल्ले में रहता था, पर जब उसे पता चला कि मैं कहाँ रहता हूँ तो उसका मेरे यहाँ आना जाना बढ़ गया। देखते देखते खिड़की के आर पार आँखें चार हुईं और मुहब्बत पनपी। वह कहते हैं न, प्रेम ग्रन्थ के पन्नों पर अपनी तकदीर तो ज़ीरो है, अपना वही हाल था। पर दूसरों की तकदीरें खूब बनाई हैं। सिर्फ मिलवाया ही नहीं, कितने ही दोस्तों के हम प्रेम पत्र लेखक थे। यह उन दिनों की बात है जब ईमेल और आइ-एम का ज़माना नहीं था और लिफाफा, काग़ज़, कलम, सियाही, लिखावट और तदबीर बहुत माने रखती थीं। खैर सुरेश और हमारी पड़ौसन का प्रेम प्रसंग पनपा भी और समाप्त भी हो गया पर अपनी दोस्ती कालेज के बाद भी बनी रही और पुराने दोस्तों में से यही एक है जिससे अभी भी मेरा संपर्क है।

स्कूल-कालेज के जितने भी दोस्त थे, प्रायः सभी बड़ी कम्पनियों में या सरकार में अच्छे पदों पर हैं। काफी समय के बाद किसी की ख़बर मिलती है तो दिल खुश ही होता है। पर कुछ लोगों के बारे में हमेशा अच्छी खबर नहीं मिलती। थॉमस के बारे में सुना उसकी रेल दुर्घटना में मौत हो गई। सुहैल जब कालेज में था तो हमेशा पाकिस्तान के गुण गाता था — हमारी अक्सर इन्हीं बातों पर बहस होती थी। बाद में उससे कुछ संपर्क रहा, राज्य सरकार में अच्छे पद पर था। फिर काफी सालों तक ख़बर नहीं मिली। बाद में अखबार मे पहले पन्ने पर उसका नाम पढ़ा — पता चला एक पृथकतावादी आतंकी गुट के कई सदस्यों के साथ उसे भी धर लिया गया। रुबय्या सईद के अपहरण के सन्दर्भ में उसका नाम आया था। जाने अब कहाँ है।

गाँव में, स्कूल के समय जो सब से करीबी मित्र था, उसका नाम था जावेद। दोनों के सामाजिक माहौल में कुछ असहिष्नुता होने के बावजूद हम ने कई दीवारें तोड़ीं। उस माहौल में जहाँ दूसरे धर्म के अनुयायी के घर में खाने को भी बुरी नज़र से देखा जाता था, हम ने कई लोगों को नाराज़ भी किया। बाद में हम एक दूसरे के घर के क्या मोहल्ले के सदस्य हो गए थे। १९८४ से मैं नौकरी के सिलसिले में फरीदाबाद में रहने लगा, पर कश्मीर नियमित रूप से जाता रहता था और दोस्तों से मुलाकात होती रहती थी। १९८९-९० की घटनाओं में हमारे परिवार और समुदाय को वहाँ से सब छोड़ छाड़ कर भागना पड़ा और हमारा कश्मीर जाना ही बन्द हो गया, इसलिए फिर सालों तक मुलाकात नहीं हुई।

एक बार बस किसी से पता चला कि जावेद अब श्रीनगर में रहता है और वहाँ के एक कॉलेज में जन्तु-विज्ञान पढ़ाता है। जिस मकान में रहता था उस के मकान मालिक का फोन नंबर भी मिला। एकाध बार बात करने की कोशिश की पर हो नहीं पाई। वे दिन घाटी में काफी तनाव के थे।

खैर १९९९ के ग्रीष्म में, अमेरिका आने से पहले, मैंने सोचा यदि अपनी मातृभूमि को एक बार फिर देखने का मौका मिल सकता है तो वह है अमरनाथ यात्रा के ज़रिये। यह वह समय है जब हज़ारों की संख्या में लोग जाते हैं, और खतरे की संभावना कम रहती है। तीन अन्य फरीदाबादी मित्रों के साथ कार्यक्रम बना अमरनाथ यात्रा का। यात्रा के बाद हम ने हिम्मत की श्रीनगर जाने की। डल लेक के पास एक होटल में डेरा डाला और सब से पहले फरीदाबाद फोन किया। श्रीमती जी को बताया कि श्रीनगर में हूँ तो बरस पड़ीं। ख़ैर मैंने अपने मित्रों से कहा कि मुझे अपने पुराने दोस्त से मिल कर आना है। उन्होंने पहले रोकने की कोशिश की, फिर यही कहा कि भइया पता लिख जाओ ताकि कुछ गड़बड़ हो तो तुम्हें ढूँढ सकें।

जो फोन नंबर था उस पर फोन किया तो पता चला जावेद साहब ने मकान बदल लिया है। उन्होंने नई जगह का पता भी बताया। पता था “हुर्रियत के दफ्तर के पास”। पता सुन कर ही हमारी हट गई (“आल पार्टीज़ हुर्रियत कान्फ्रेन्स” सभी पृथकतावादी गुटों का संयुक्त राजनैतिक मुखौटा है)। फिर सोचा, यहाँ इतने बड़े शहर में मुझे कौन जानता है। गाँव जाता तो कोई न कोई पहचान लेता। वैसे भी मैं उन दिनों दाढ़ी रखता था, लोकल भाषा बोलता ही था, इसलिए लोकल ही लगता था। आटो वाले को पता बताया और पहुँच गया। उसके घर पहुँचा तो मेरा दोस्त घर पर नहीं था। उस की पत्नी थी, बच्चे थे, जिनसे मैं पहली बार मिल रहा था। बोलीं पता नहीं कब आएँगे। मेरे बारे में पूछा तो मैंने कहा गाँव से आया हूँ। सही परिचय बताने से डर रहा था। वह इलाका ही मुझे डरावना लग रहा था। आटो में बैठ कर वापस होटल का रुख किया। मोहल्ले की तंग गलियों से आटो धीरे धीरे रेंग रहा था, तो सामने नज़र पड़ी जावेद चल कर आ रहा था — दस साल में बहुत ज़्यादा नहीं बदला था वह। आटो रोक कर मैं उतरा और हम देर तक गले मिले। उसी आटो में होटल गए, साथियों को अपने दोस्त से मिलाया, फिर वापस दोस्त के साथ गया। उस दिन रात भर पिछले दस साल में क्या क्या हुआ इसी की बातें होती रहीं।

वैसे कुछ भाग्य ने भी साथ दिया उस बार। उस से अगले वर्ष यात्रियों पर हमला कर के ४८ लोग मारे थे आतंकियों ने।

उसके कुछ समय बाद एक बार वह सपरिवार फरीदाबाद आया। पर अब फिर संपर्क टूट गया है। उसके बाद २००३ में जब हालात काफी बेहतर थे, मैं यहाँ से भारत गया था, तो एक बार फिर कश्मीर गया — इस बार सपरिवार, और गाँव भी हो आया, पर जावेद से नहीं मिल पाया। वह किस्सा फिर कभी।

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अनुगूंज ६ : मेरा चमत्कारी अनुभव

Akshargram Anugunj“मेरा चमत्कारी अनुभव” – मैंने अनुगूंज का यह विषय चुन कर स्वयं अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारी है। स्वयं का कोई ढ़ंग का अनुभव है नहीं, लिखूँ तो क्या लिखूँ? यही होता है जब नौसिखियों को कोई ज़िम्मेवारी का काम दिया जाता है। समस्या यह है कि जब तक मैं स्वयं न लिखूँ तब तक न तो जीतेन्द्र और आशीष को “राजा बेटा वाली शाबासी” दे सकता हूँ, न औरों को अनुगूँज के एक नए आयोजक की लाज रखने की गुहार कर सकता हूँ। इसलिए, चलिए कोशिश करता हूँ थोड़ा कुछ कहने की। पते की बात कुछ छोटी है इसलिए घुमा फिरा कर कहूँगा।

चमत्कारी अनुभव तो इसे नहीं कह सकता पर मौत को सामने देखने का एक अनुभव हुआ है, वह सुनाता हूँ। छठी कक्षा में था। वह समय कश्मीर में शान्ति का था, हालाँकि अशान्ति का बीज तो भीतर ही भीतर हमेशा से ही पनप रहा था। मुझे याद है हम लोग तख्ती लिखा करते थे और एक मुस्लिम छात्र तख्ती पर बड़ी सुन्दर लिखाई में उर्दू में लिख कर लाया था, “सारे जहाँ से अच्छा पाकिस्तान हमारा”। ख़ैर यह किस्सा उस बारे में नहीं है, बस माहौल को वर्णित कर रहा था। हमारे घर के सामने एक नदी बहती थी — गंगा, जमुना, वितस्ता जैसी बड़ी नदी नहीं, यही कोई पन्द्रह-बीस फुट चौड़ी, छोटी नदी जो पत्थरों पर कल-कल करती बहती थी। हमारे घर के आसपास उस की गहराई थी कोई डेढ़-दो फुट, पर बहाव वहुत तेज़ था। नदी हरमुख की पहाड़ियों में उत्पन्न होती थी और हमारे गाँव से गुज़र कर कोई १५ किलोमीटर बाद वुलर झील में मिलती थी, जो एशिया की सब से बड़ी मीठे पानी की झील मानी जाती है। खैर हमारी यह नदी जो “द्वद क्वल” (दूध की नदी) कहलाती थी, हमारी ज़िन्दगी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा थी। पानी एकदम पारदर्शी, साफ; उसी में हम नहाते थे, उसी का पानी पीते थे, और उसी में घर के बर्तन, कपड़े आदि धुलते थे।

रोज़ का नहाना तो उसी डेढ़-दो फुट के पानी में होता था, घड़े की सहायता से, पर जब छुट्टी होती थी, मस्ती होती थी, तो एक-आधा किलोमीटर दूर जा कर ऐसी जगह नहाना होता था जहाँ नदी की गहराई और चौड़ाई थोड़ी ज़्यादा होती थी और बहाव धीमा। वहाँ छोटा सा घाट सा बना होता था और हम तैरने और गोते खाने का शौक पूरा करते थे। ख़ैर इस वातावरण के लिए कोई विशेष तैराकी निपुणता की आवश्यकता नहीं होती थी, सो हम भी उतने ही निपुण थे, जितनी ज़रूरत थी।

हुआ यूँ कि गर्मियों की दो हफ्ते की छुट्टी में हमें मौसी के घर भेजा गया, ३० किलोमीटर दूर सोपोर में। सोपोर वुलर झील के दूसरे सिरे पर स्थित एक कस्बा है जहाँ सेब का कारोबार खूब चलता है, और पिछले १५ साल से बन्दूक का भी खूब चला है। झेलम (वितस्ता) नदी दक्षिण कश्मीर से उत्पन्न हो कर वुलर झील में आ मिलती है और फिर निकल कर सोपोर, बारामुल्ला होते हुए पाकिस्तान जाती है। ख़ैर हमारी मौसी का घर वितस्ता के एकदम किनारे था। वहाँ मेरे मौसेरे भाई बहन सभी तैराक थे, और न सिर्फ वितस्ता में तैरते थे, बल्कि उस आधा किलोमीटर चौड़ी नदी के आर पार कई चक्कर लगाते थे। मैं भी रोज़ उन के साथ जाता, पर अपनी औकात में रहता। घाट की कौन सी सीढ़ी तक मैं जा सकता था, यह मैंने रट रखा था। पानी गर्दन तक आता था, और वहीं तक मैं “तैरता” था।

Jhelumउस दिन मुझे याद नहीं बाकी लोग कहाँ गए थे, पर मैं अकेला तैरने गया। अगले दिन वापस घर जाना था, इसलिए बड़ी नदी में नहाने का इस मौसम का आखिरी मज़ा लेना चाहता था। बारिश हुई थी, पानी का स्तर भी अधिक था और बहाव भी। मैं अपनी अकलमन्दी में अपनी रटी हुई सीढ़ी तक ही गया। और मिनट भर में पानी मुझे और नीचे धकेल रहा था। मैं अपनी पतली सी सींकिया काया को रोक नहीं पाया और बह निकला। मैं बहता चला गया, मदद के लिए चिल्ला भी नहीं पाया, केवल हाथ पाँव चला रहा था कि किसी तरह से डूबूँ नहीं। ऐसा ही पता नहीं कितनी देर तक चलता रहा, मुझे मौत सामने दिख रही थी और बचाए जाने की कोई उम्मीद नहीं दिख रही थी। तीन दशक बीत गए हैं, पर वह दृश्य अभी भी मेरी आँखों के सामने है। चारों तरफ उफनती नदी का शोर था, और बारिश से मटमैले हुए पानी के सिवा कुछ भी नज़र नहीं आ रहा था। मेरी हिम्मत जवाब दे रही थी, बाहें थक गई थीं, और मैं हैरान था कि मैं तैर कैसे रहा हूँ। तैर तो क्या रहा था, हाथ पाँव मार रहा था। शायद मैं आधा बेहोश था, जब मुझे लगा कि मुझे किसी बला ने पकड़ लिया है। पहले लगा कि कोई बड़ी मछली है, धीरे धीरे आभास हुआ कि मैं बचाया जा रहा हूँ। किनारे पर पहुँचाया गया तो भीड़ जमा हो चुकी थी। सब ने मुझे घेर लिया। मेरी मौसी आ चुकी थीं, सिर पीट रही थीं कि भगवान ने लाज रख ली वरना मैं अपनी दीदी को क्या मुँह दिखाती।

मेरे पेट को मटके पर रख कर मुझे उल्टा लिटाया गया, ताकि अन्दर गया पानी मैं उगल दूँ। काफी पानी बाहर आया। ख़ैर जान बची लाखों पाए।

बाद में पता चला कि किनारे बैठी एक लड़की ने मुझे डूबते देख कर शोर मचाया था, और मेरे मौसा जी के भाई ने मुझे डूबने से बचाया था। मैं नदी के बीचों बीच पहुँच चुका था, और बहाव की दिशा में भी काफी नीचे चला गया था।

घर में हवन आदि हुआ। उस दिन के बाद घर पहुँच कर मैं अपनी “द्वद क्वल” तक ही सीमित रहा, और झेलम से दूर रहने की ठान ली। अब ज़रूर स्विमिंग पूल के सुरक्षित वातावरण में तैरता हूँ, पर ट्रेनिंग उसी दिन की काम आ रही है।

रही चमत्कार की बात और नमक मिर्च की बात, वह अब आने जा रही है। पर यकीन मानिए, नमक मिर्च इस में ज़रा भी नहीं है। वह लड़की जिसने मुझे बचाने के लिए शोर मचाया, अब रोज़ मुझ से झगड़ती है, कि ग्रोसरी कब जाओगे, ब्लाग पर ही बैठे रहोगे या बच्चों को भी पढ़ाओगे। हालात वहाँ से यहाँ तक कैसे पहुँचे, यह तो शायद पिछली अनुगूँज में कहना चाहिए था पर..

दिल के लुटने का सबब पूछो न सब के सामने
नाम आएगा तुम्हारा यह कहानी फिर सही।

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कश्मीर

आतंक से मुख्यधारा की राह क्या हो?

Anugunj: Third event
हाल ही के कुछ समाचार माध्यमों में खबर थी, १९९० के पूर्वार्ध में जम्मू कश्मीर छात्र स्वातंत्र्य फ्रंट के कर्ताधर्ता और आत्मसमर्पण करने वाले आतंकियों की संस्था इख़्वान‍-उल-मुस्लिमीन के सर्वोच्च कमांडर ताहिर शेख इख़्वानी ने टेरिटोरियल सेना के अफसरों की चयन परीक्षा उत्तीर्ण कर ली है। बहस उठी कि क्या यह मुनासिब है कि पूर्व आतंकवादियों को सामरिक रूप से महत्वपूर्ण पद सोंपे जाएँ? यही बना तीसरी अनुगूँज का विषय: “आतंक से मुख्यधारा की राह क्या हो?”

मेरे विचार में आतंक से मुख्यधारा की राह जो भी हो, उस की मंज़िल भारतीय सेना नहीं होनी चाहिए। पहले तो आतंक से मुख्य धारा की राह हो ही क्यों? यदि सामान्य जीवन में कोई क़त्ल करता है, तो चाहे पकड़ा जाए या आत्मसमर्पण करे, उस की राह जेल में जाके ही रुकती है। अगला पड़ाव मृत्यु दण्ड या आजीवन कारावास, नहीं तो लम्बा कारावास। मुख्य धारा की बात हो भी तो सज़ा काटने के बाद। जिन आतंकियों ने असंख्य हत्याएँ की हों उनके साथ मुख्य धारा की बात क्यों हो? क़त्ल भी ऐसे वैसे नहीं किए होते इन लोगों ने — फौजियों को मारा होता है। अब इन्हीं लोगों को फौज में शामिल करेंगे आप? परीक्षा तो कोई भी उत्तीर्ण कर ले, जाने क्या स्थितियाँ रही होंगी जब ताहिर मियाँ ने टेरिटोरियल सेना के अफसरों की चयन परीक्षा उत्तीर्ण की होगी। हो सकता है उसमें उन्हीं राजनीतिक शक्तियों का हाथ हो जो उन्हें सेना का अफ़सर बनाने पर तुले हुए हैं। यों तो मुन्ना भाई ने भी डाक्टरी की एक से बढ़ के एक परीक्षा टाप करी थी, यह तो उनसे आपरेशन करवाने वाली बात हो गई।

चलिए माना इखवान वाले सरकारी आतंकवादी हैं। इन लोगों ने काफी सहायता की है भारतीय एजेंसीज़ की। बेचारे ताहिर मियाँ पर तो जानलेवा हमले भी हुए पाकिस्तान-परस्त आतंकियों द्वारा। इख़वानुल-मुस्लिमीन का संस्थापक और पूर्व अध्यक्ष कुका परे तो राजनीति में भी कूद पड़ा था। १९९६ में विधायक का चुनाव भी जीता। पर पिछले वर्ष मार दिया गया। कई साथी भी मारे गए। पर विश्व भर में ऐसे गुटों का इतिहास देखिए। अक्सर देखा गया है कि यह लोग आस्तीन के साँप होते हैं, कभी न कभी पालने वाले को ही काट खाते हैं। जरनैल सिंह भिंडरावाले से ले कर तालिबान तक कई लोग और गुट किसी न किसी रूप में पहले “सरकारी” आतंकी रहे हैं।

अब प्रश्न यह है कि यदि इन लोगों ने सरकार की सहायता की है और उसे अगर पुरस्कृत करना ही है तो कैसे किया जाए? पैट्रोल पम्प दे दीजिए। गैस एजेन्सी दे दीजिए। राजनीति भी चल जाएगी, वैसे ही देश-द्रोहियों से भरी पड़ी है। पर फौजी अफ़्सर? नहींऽऽऽऽ !!!