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अमरीका के मध्यावधि चुनाव

अमरीका में मध्यावधि चुनाव आगामी मंगलवार, यानी 6 नवंबर 2018 को हैं। यह चुनाव देश के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण हैं। इस ब्लॉग के पाठकों में से कई को यह उत्सुकता हो सकती है कि यह भला कौन से चुनाव हैं। किसे चुना जा रहा है? डॉनल्ड ट्रंप की सरकार पर इसका क्या असर होगा? अभी दो साल पहले ही तो चुनाव हुए थे, फिर मध्यावधि क्यों? यदि आपके मन में यह सब सवाल उबल रहे हैं तो आप सही जगह आए हैं। आइए इन सब प्रश्नों पर नज़र डालें, विशेषकर भारतीय चुनावों की तुलना में।

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हमनाम हमसफ़र

यह समाचार रोचक है। आज सुबह एमएसएनबीसी पर देखा, तो सोचा आप के साथ शेयर करूँ। इसी बहाने कई दिन बाद कुछ लिखा जाएगा। तो हुआ यूँ कि केली हिल्डेब्राँड नाम की एक युवती फेसबुक पर थी। उसने सोचा, जैसा कि हम सब सोचते हैं, कि अपने नाम पर खोज की जाए। अब यह नाम तो इतना आम नहीं है, पर पता लगा कि फेसबुक पर उसी नाम का एक और प्रयोक्ता है, पर वह पुरुष है। उसे ऐसे ही एक संदेश भेजा, कि हम हमनाम हैं तो मैं ने सोचा नमस्ते कह दूँ। बात कुछ आगे बढ़ी, और कुछ समय बाद पुरुष केली सफर पर रवाना हुए और स्त्री कैली से मिल आए। बात फिर आगे बढ़ी और अब केली और केली शादी कर रहे हैं। जी हाँ, केला और केली नहीं, केली और केली। पूरी कहानी उन्हीं की ज़बानी सुनिए –

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नस्लभेदी हत्यारा 88 वर्ष का था

James Von Brunnऐसा लगता है कि अमरीका में डेमोक्रेटिक पार्टी की लिबरल (उदारवादी) विचारधारा की सरकार बनने के बाद दक्षिणपन्थी कुछ अधिक ही सक्रिय हो गए हैं। पिछले सप्ताह एक गर्भपात कराने वाले डॉक्टर का कत्ल होने के बाद आज एक और नस्लवादी घटना हुई। वाशिंगटन डीसी के हॉलोकास्ट म्यूज़ियम, जिस में यहूदियों पर हुए अत्याचारों को दर्शाया जाता है, पर एक 88 साल के बूढ़े नव-नाज़ी ने कथित रूप से हमला किया। नियो-नाज़ी लोग हिटलर के प्रशंसक होते हैं और उसी की तरह यहूदियों और अश्वेतों से घृणा करते हैं।

यह व्यक्ति जिस का नाम जेम्स वॉन ब्रन था, 25 साल पहले भी नस्लवाद के आरोपों पर 6 वर्ष की सज़ा काट चुका था और अपनी वेबसाइट (holywesternempire.org जो कि कुछ देर पहले हटा ली गई है) पर कहता था कि उस की सज़ा के लिए काले और यहूदी जज/वकील/जूरी ज़िम्मेदार थे। ब्रन कहता था कि यहूदियों पर कोई ज़ुल्म नहीं हुआ, और ऍन फ्रैंक की डायरी मनघडन्त थी। ब्रन की वेबसाइट के विषय में यह वीडियो देखिए।

ब्रन को म्यूज़ियम के सुरक्षा कर्मचारियों ने रोका, पर फिर भी एक सुरक्षा कर्मचारी जो कि अश्वेत था, उस की गोली का शिकार हुआ और बाद में मारा गया।

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स्लम-डॉग मिलियनेयर – एक समीक्षा

मुंबई के स्लम-जीवन पर केन्द्रित स्लमडॉग मिलियनेयर देखकर हॉल से निकलने के बाद अनुभूतियाँ मिश्रित थीं। फिल्म में मुंबई के झोपटपट्टी जीवन की जो छवि दिखाई गई है, उसे देख कर काफी बेचैनी लगी। अमरीकी सिनेदर्शकों से भरे हॉल में ऐसा लगा जैसे हमें पश्चिम वालों के सामने नंगा किया जा रहा है। फिल्म के पहले हिस्से में ऐसा लगा यह क्या देखने आ गए — फिल्म छोड़ कर जाने का भी विचार आया। साथ में यह भी सोचा कि जो दिखाया जा रहा है, अतिशयोक्ति के साथ ही सही, है तो सच्चाई ही। ऐसा लगा कि सलाम बॉम्बे फिर दिखाई जा रही है। अन्तर यह था कि सलाम बॉम्बे में गन्दगी दिखाने वाली हमारी अपनी मीरा नायर थीं, और यह फिल्म अंग्रेज़ निर्देशक डैनी बॉयल ने बनाई है।

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अमरीकी चुनावी दंगल के मंगल

[बहुत समय बाद लिख रहा हूँ। पुराने साथियों तथा पाठकों से क्षमा याचना सहित।]
अगले मंगल को नॉर्थ कैरोलाइना में डेमोक्रेटिक प्राइमरी चुनाव होने वाले हैं, यानी अमरीकी चुनाव के लंबे खिंचते सेमी-फाइनल का एक और मुकाबला। मालूम नहीं इस बार भी इस बात का फैसला हो पाएगा या नहीं कि हिलरी क्लिंटन और बराक ओबामा में से कौन यह सेमीफाइनल जीतेगा, जो फाइनल चुनाव में रिपब्लिकन पार्टी के जॉन मकेन से लड़ेगा।

यदि अमरीकी चुनाव प्रक्रिया के यह शब्द – सुपर-ट्यूज़डे, आयोवा कॉकस, न्यू-हैंपशर प्राइमेरी, रिपब्लिकन, डेमोक्रेट जैसे शब्द आप को परेशान करते हैं तो आप अकेले नहीं हैं। यदि आप की समझ में यह नहीं आ रहा कि पिछले कई महीनों से हो रहा यह चुनाव समाप्त क्यों नहीं हो रहा तो आप अकेले नहीं हैं। अमरीकी चुनाव प्रणाली है ही बड़ी पेचीदा। यदि आप को संक्षेप में समझना है कि हो क्या रहा है, तो पढ़िए यह लेख। इस में मैं अमरीकी चुनाव प्रणाली के विषय में संक्षेप में बताने का प्रयास करूँगा।

द्विदलीय प्रणाली
सब से पहली बात, यहाँ कई पश्चिमी देशों की तरह द्वि-दलीय राजनीतिक प्रणाली है। अर्थात् भारत की तरह सैंकड़ों राजनीतिक दल न हो कर यहाँ केवल दो ही राजनीतिक दल हैं – रिपब्लिकन पार्टी और डेमोक्रेटिक पार्टी। तीसरा छोटा सा दल है, ग्रीन पार्टी, पर न होने के बराबर। रिपब्लिकन पार्टी मूलतः कन्ज़र्वेटिव (परंपरावादी) है, कुछ कुछ दक्षिण-पंथी (राइट ऑफ सेंटर), हमारी बीजेपी की तरह। डेमोक्रेटिक पार्टी मूलतः लिबरल (मुक्त) है, थोड़ा सा वाम विचारों वाली, लेफ्ट ऑफ सेंटर, हमारी कांग्रेस की तरह। यूं समझिए कि केवल कांग्रेस और बीजेपी में मुकाबला है, बाकी कोई दल हैं ही नहीं। यदि आप एक रजिस्टर्ड वोटर हैं तो आप स्वयं को एक रिपब्लिकन वोटर के रूप में रजिस्टर करा सकते हैं, या डेमोक्रैटिक वोटर के रूप में, या फिर आज़ाद वोटर के रूप में। तीनों मामलों में आप फाइनल चुनाव में किसी को भी वोट दे सकते हैं। पर आप किसी एक पार्टी के रजिस्टर्ड वोटर हैं या नहीं, इस से आप की प्राइमेरी चुनाव में भागीदारी पर असर पड़ सकता है।

प्राइमरी चुनाव क्या है
प्राइमरी चुनाव, जो आजकल चल रहा है, दरअसल पार्टियों का आन्तरिक चुनाव है — पर इस की महत्ता आम चुनाव से कुछ कम नहीं, क्योंकि इस में आम जनता भाग लेती है। रिपब्लिकन पार्टी का अपना प्राइमरी चुनाव होता है, डेमोक्रेटिक पार्टी का अपना। और इन आन्तरिक या प्राइमरी चुनावों के बाद चुना जाता है उस पार्टी का राष्ट्रपति पद के लिए दावेदार। फिर नवंबर के पहले मंगलवार (1 नवंबर को छोड़ कर) को मुख्य चुनाव में इन दोनों उम्मीदवारों में से एक को चुना जाता है। प्राइमरी और मुख्य चुनावों में एक और बड़ा अन्तर यह है कि प्राइमरी चुनाव हर स्टेट के लिए अलग अलग होते हैं, अलग अलग तरीके से और अलग अलग समय पर। इसी कारण प्राइमरी चुनावों की प्रक्रिया इतनी लंबी खिच जाती है। हर राज्य का अपना कानून है, और इस कारण हर राज्य की चुनावों में महत्ता भी कम-ज़्यादा होती है। शुरू शुरू में चुनाव कराने वाले राज्य छोटे होते हुए भी किसी उम्मीदवार को अकारण ही चढ़ा सकते हैं। जब तक आधे राज्य चुनाव करा लेते हैं, आम तौर पर एक स्पष्ट उम्मीदवार उभर कर आ जाता है, और ऐसा होने पर बाद के राज्यों को प्राइमरी चुनाव कराने का आवश्यकता ही नहीं पड़ती।

रिपब्लिकन पार्टी का उम्मीदवार तो महीनों पहले तै हो गया है, पर डैमोक्रैटों की रस्साकसी अभी चल रही है। उदाहरण के तौर पर पिछले हफ्ते हुए पेन्सिलवेनिया डेमोक्रेटिक प्राइमरी चुनावों के बारे में कहा जा रहा था कि वहाँ 32 साल बाद प्राइमरी चुनाव कराने की ज़रूरत पड़ी है। पिछली बार 1976 में तब यहाँ प्राइमरी चुनाव महत्वपूर्ण थे, जब जिमी कार्टर को चुना गया था। अन्यथा पेन्सिलवेनिया और बाद के राज्यों का नंबर आने से पहले ही उम्मीदवार का निर्णय हो जाता है।

हर राज्य का अलग अलग कानून है, इस कारण किसी राज्य में ओपन प्राइमरी होते हैं, तो किसी में क्लोज़ड। ओपन प्राइमरी में यह होता है कि एक पार्टी का पंजीकृत वोटर दूसरी पार्टी के चुनाव में भी भाग ले सकता है। कुछ राज्यों में आज़ाद वोटर दोनों तरफ वोट डाल सकते हैं। कुछ राज्यों में आप केवल उस पार्टी के प्राइमरी चुनाव में भाग ले सकते हैं, जिस के आप पंजीकृत वोटर हैं।

तो क्या लोग सीधे उम्मीदवार को वोट देते हैं?
हाँ भी और नहीं भी। हर वोटर अपने वोट द्वारा अपने क्षेत्र के डेलीगेट (संसद सदस्य) को अधिकृत करता है, किसी एक उम्मीदवार को चुनने के लिए। यानी, उस डेलिगेट के क्षेत्र से जिस उम्मीदवार को अधिक वोट मिलते हैं, वह डेलिगेट बाद में होने वाले एक पार्टी कन्वेन्शन में उसी उम्मीदवार को वोट देता है। इस कारण हर स्टेट के प्राइमरी के बाद यह निश्चित होता है कि किस उम्मीदवार को कितने डेलिगेट मिले हैं। कुछ राज्यों में यह चुनाव सीधे वोट डाल कर होता है, और कुछ अन्य राज्यों में वोटरों की बैठक या पंचायत बुला कर, जिसे कॉकस (caucus) कहा जाता है। इस में एक और पेचीदगी यह है कि कुछ राज्यों में विनर-टेक्स-आल (winner takes all) का नियम है, यानी उस राज्य में जो जीतेगा, राज्य के सारे डेलीगेट उसी को चुनेंगे। वोटरों पर निर्भर इन वचनबद्ध (pledged) डेलिगेटों के अतिरिक्त डैमोक्रैटिक पार्टी में सुपर-डिलिगेट्स की भी प्रथा है। ये कुछ विशिष्ट शक्ति वाले पार्टी के मुख्य सदस्य हैं, जो अपनी मर्ज़ी से वोट दे सकते हैं। रिपब्लिकन पार्टी में सुपर डेलीगेट्स का नियम नहीं है।

अभी क्या हो रहा है?
रिपब्लिकन पार्टी से जॉन मकेन ने अपने निकटतम प्रतिद्वन्द्वी माइक हक्कबी को इतना पीछे छोड़ दिया कि उन की उम्मीदवारी तय है। डेमोक्रैटिक पार्टी में दोनों उम्मीदवार एक दूसरे के इतना पास चल रहे हैं कि फैसला ही नहीं हो पा रहा। अमरीका के इतिहास में पहली बार एक महिला और एक अश्वेत व्यक्ति चुनावों के इस दौर तक पहुँचे हैं। पेन्सिलवेनिया में 32 साल बाद चुनाव हुए हैं, पर वहाँ भी फैसला नहीं हो पाया। हालाँकि हिलरी क्लिंटन ने राज्य को जीत लिया, पर कुल मिला कर बराक ओबामा से आगे नहीं निकल पाई। अब अगले सप्ताह मंगल को इंडियाना और नॉर्थ कैरोलाइना की बारी है। देखिए क्या होता है।

चुनावों की समयावली
– मुख्य चुनाव दिवस 1 नवंबर के बाद के पहले मगंल को होता है, हर साल। हाँ राष्ट्रपति चुनाव हर चार साल बाद होते हैं, और इस साल भी होने हैं। बुश के दो कार्यकाल पूरे हो जाएगें, और परंपरानुसार वे तीसरी बार चुनाव में भाग नहीं ले रहे हैं। उन के दल के उम्मीदवार जॉन मकेन हैं।
– चुनावों की सरगर्मी लगभग सवा-डेढ़ साल पहले शुरू हो जाती है, जब सभी उम्मीदवार अपनी उम्मीदवारी की घोषणा करते हैं। इस के साथ शुरू हो जाता है पैसा और समर्थन जुटाने का काम। जो जिनते अधिक मिलियन बटोरेगा, उस की सफलता और चयनीयता उसी हिसाब से आँकी जाएगी।
– जनवरी में पहला प्राइमरी होता है आयोवा में, यानी आयोवा कॉकस। आयोवा यूँ तो छोटा सा राज्य है, जिस के चुनाव का राष्ट्रीय स्तर पर अधिक महत्व नहीं है, पर यह महत्व इसलिए बढ़ जाता है कि यहाँ से पहला विजेता नामांकित होता है। शायद अपना यही महत्व बनाए रखने के लिए इस राज्य ने यह कानून पास किया है कि हमारा चुनाव सब से पहले होगा।
– कुछ दिन बाद ही होता है न्यू हैंपशर का प्राइमरी। यह और भी छोटा राज्य है, पर फिर जनवरी मे तीन चार राज्यों का चुनाव और होता है। अपना महत्व बढ़ाने के लिए दो और राज्यों – मिशिगन और फ्लोरिडा ने इस बार अपने प्राइमरी चुनाव आगे खिसका लिए। पर डेमोक्रेटिक पार्टी की केन्द्रीय कमान ने इस फैसले को नहीं माना, और हालाँकि चुनाव जनवरी में हो चुके हैं, इन दो राज्यों के डेलिगेटों को अभी भी नहीं गिना जा रहा है। इन की गिनती का क्या करना है, शायद अन्त में ही तय होगा।
– फिर फरवरी में आता है महामंगलवार (Super Tuesday) जिस दिन 24 राज्यों में एक साथ चुनाव होते हैं। आम तौर पर इस दिन उम्मीदवार का पता चल जाता है। पर इस बार डेमोक्रैटिक पार्टी में रेस काँटे की है।
– अप्रैल समाप्त होते होते 15-16 और राज्य हो जाते हैं। बाकी के 4-5 राज्य मई और जून में। जुलाई में आधिकारिक रूप से उम्मीदवारों की घोषणा हो जाती है, और फिर शुरू होती है असली रस्साकशी जो नवंबर में समाप्त होती है। मुख्य चुनावों के लिए भी वही डेलीगेटों की लड़ाई, और वही अलग राज्यों के अलग नियम — पर हाँ चुनाव एक ही दिन होते हैं। इस बार चुनावी मंगल 4 नवंबर को पड़ता है। देखते रहिए क्या होता है। पहली महिला राष्ट्रपति बनेगी, पहला अश्वेत बनेगा, या इन दोनों की आपसी रस्साकशी का फायदा जॉन मकेन को मिलेगा।

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तकनीकी विदेश विविध

टी.वी.रामन – आँखें खोल देने वाला व्यक्तित्व

इंटरनेट पर, किसे मालूम है कि आप एक कुत्ता नहीं हो। या फिर यह कि आप फिर वही कुत्ता नहीं हो।

यदि आप को मेरा अनुवाद समझ में नहीं आया, तो यह रहा टी.वी. रमण रामन का मूल कथन

On the Internet, no one knows you aren’t a dog! Nor even if you are still the same dog!

जी हाँ, अमरीका के प्रतिष्ठित कॉर्नेल विश्वविद्यालय से पी.एच.डी. की उपाधि प्राप्त टी.वी.रमण रामन ने सोर्सफोर्ज पर अपने वेबपृष्ठ पर यही लिखा है। दरअसल टी.वी. रमण रामन की दिनचर्या में श्वानवंश की प्राणी हबल का अच्छा खासा योगदान है। रमण रामन नेत्रहीन हैं, और उन की उपलब्धियाँ मुझ जैसे लाखों आँखों वालों को शर्मिन्दा कर देंगीं।

हाल ही में डा. रमण रामन के बारे में तब पता चला जब गूगल ब्लॉग पर उन की यह प्रविष्टि दिखी। इस में वे गूगल के एक अनूठे इस्तमाल के बारे में बता रहे हैं – यदि आप को किसी शब्द, विशेषकर व्यक्तिवाचक संज्ञा (स्थान आदि का नाम) के हिज्जों में कन्फ्यूजन है तो उसे गूगल पर खोज कर देखें। वे आजकल गूगल में काम करते हैं, और इंटरनेट को नेत्रहीन लोगों के लिए सुलभ बनाने के कार्य में जुटे हुए हैं। उन की यह प्रविष्टि भी पढ़िए जिस में वे बताते हैं कि नेत्रहीन लोगों के लिए उन का गूगल खोज इंजन कैसे उन वेब पृष्ठों को प्राथमिकता देता है जिन पर चित्र कम हैं, और इस कारण उन्हें नेत्रहीनों द्वारा प्रयुक्त वाचक यन्त्र द्वारा सरलता से पढ़ा जा सकेगा।

डा. रमण रामन ब्लॉगिंग समुदाय के सक्रिय सदस्य हैं, और जैसा उन के ब्लॉगर प्रोफाइल से मालूम होता है, वे कई तकनीकी चिट्ठों के मालिक हैं।

Image source http://emacspeak.sourceforge.net/raman/वेब सुलभता (नेत्रहीनों के लिए) के विषय पर अपने साक्षात्कार में डा. रमण रामन अपनी सर्च इंजन तकनीक के बारे में और काफी जानकारी देते हैं। अपने बारे में पूछे जाने पर वे संक्षेप में बताते हैं – “ज़रूर, http://emacspeak.sf.net/raman”। और वहाँ जाने पर उन के काम की और जानकारी मिलती है। उन के रिज़मे से पता चलता है कि उन्होंने पुणे विश्वविद्यालय से गणित में स्नातन के बाद आइ.आइ.टी. मुंबई से कंप्यूटर विज्ञान में स्नातकोत्तर शिक्षा प्राप्त की है, और फिर कॉर्नेल से एम.एस. और पी.एच.डी.।

ज़ाहिर है, नेत्रहीनों के कंप्यूटर में मॉनीटर का कोई काम नहीं है। उन के प्रोग्राम और वेबपृष्ठ दिखते नहीं, बोलते हैं। शब्दों की प्राथमिकता है, चित्रों की नहीं। क्या निकट भविष्य में हिन्दी के लिए ऐसा काम हो सकेगा? जब टी.वी.रमण रामन की प्रविष्टियों पर इस प्रविष्टि का पिंगबैक आएगा, तो क्या वे इसे “पढ़” पाएँगे?

मेरे लिए ऐसे व्यक्ति बड़ी प्रेरणा के स्रोत होते हैं, जो कठिनाइयों के बावजूद अपने लिए जगह बनाते हैं, न कि वे जो शिकायतों में ही सारी ज़िन्दगी निकाल देते हैं। टी.वी.रमण रामन को मेरा शत् शत् नमन।

जिन लोगों को दक्षिण भारतीय नामों की पहचान हो क्या वे बता सकेंगे कि क्या सही उच्चारण रमण है, या रामन्?

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चुनाव दिवस

विश्व की लार्जेस्ट डेमोक्रेसी में चुनाव हो रहे हों. या रिचेस्ट डेमोक्रेसी में, हम लोगों की रुचि तो बनी रहती है — वोट दे सकें या न दे सकें। कल सारे अमरीका में चुनाव हो रहे हैं, और मैं ने सोचा इस के विषय में कुछ सूचनाएँ स्वयं भी मालूम कर लूँ और आप से भी बांटूँ। आप पूछेंगे कौन से चुनाव हो रहे हैं भाई, अभी दो साल पहले ही तो चुनाव हुए थे, जब बुश जी दोबारा चुने गए थे? यहाँ के चुनावों की खासियत यह है कि हर साल चुनाव दिवस पर यहाँ चुनाव होते हैं। और चुनाव दिवस रहता है नवंबर के पहले सोमवार से अगला दिन — यानी इस बार 7 नवंबर को। यह दिन 2 नवंबर से ले कर 8 नवंबर वाले सप्ताह में आने वाले मंगलवार को पड़ता है।

यूँ तो राजनैतिक पदों के लिए चुनाव हर चार साल में होते हैं, पर हर साल किसी न किसी चुनाव की बारी आ ही जाती है — चाहे वह स्थानीय पदों के लिए हों, प्रादेशिक पदों के लिए हों, या राष्ट्रीय पदों के लिए यहाँ तक कि स्कूल बोर्ड के पदों के लिए भी । कुछ नहीं तो किसी न किसी और प्रस्ताव पर मत ड़ाले जाने होते हैं।

हाउस आफ रिप्रेज़ेन्टेटिव्ज़ (जैसे भारत में “लोक सभा” है) के लिए हर दो साल में चुनाव होते हैं, इस कारण यह चुनाव एक मध्यावधि चुनाव की तरह माना जाता है। इस से देश के नेता (राष्ट्रपति) का चुनाव तो नहीं होता, पर उस की सदन के ऊपर पकड़ पर काफी प्रभाव पड़ता है। “हाउस” के सदस्यों की संख्या 434 होती है, और उन का कार्यकाल केवल दो वर्ष होता है, जबकि राष्ट्रपति का चार वर्ष। सीनेट (“राज्य सभा”) के सदस्य छः साल तक बने रहते हैं, पर इस के 100 सदस्यों में से एक तिहाई सदस्य हर दो साल में सीधे चुनाव द्वारा चुने जाते हैं। फिर राष्ट्रपति का चुनाव हर चार साल में होता है। इस के अतिरिक्त किसी न किसी प्रदेश के चुनाव होने होते हैं, या नगरपालिका के, या स्कूल बोर्ड के। इस के अतिरिक्त कई तरह के प्रस्ताव होते हैं, जैसे फलाँ कानून बनाया जाए या नहीं, संविधान में फलाँ संशोधन किया जाए या नहीं, (उदाहरणतः) समलैंगिकों को विवाह की अनुमति दी जाए या नहीं, वाल्मार्ट को घुसने दिया जाए या नहीं, इस तरह के कई प्रस्ताव होते हैं, जिन पर नागरिक सीधे वोट डालते हैं। यानी चुनाव दिवस पर आम तौर पर नागरिकों को कई चीज़ो पर अपना मत व्यक्त करना होता है, और कई व्यक्तियों की किस्मत का फैसला करना होता है। यह प्रस्ताव स्थानीय स्तर पर हो सकता है, प्रादेशिक स्तर पर, या राष्ट्रीय स्तर पर। इस कारण यहाँ विभिन्न प्रदेशों में, विभिन्न नगरों में अलग अलग कानून लागू होते हैं।

कहना यह है कि हर तरह का चुनाव इसी दिन होता है, और इस से चुनाव आयोग का एक काम बच जाता है – चुनाव की तारीख तय करने का।

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डेलाइट सेविंग टाइम

रविवार की सुबह उठते ही हम ने अपनी घड़ियों को एक घंटा पीछे किया। यह अच्छी खासी मेहनत है — कलाई की घड़ियाँ, दीवारों की घड़ियाँ, वीसीआर, माइक्रोवेव, थर्मोस्टैट, स्टीरियो, आदि यदि सब का समय ठीक करने लगें तो दर्जन भर तो हो ही जाती हैं, इसलिए काम अभी पूरा नहीं हुआ। सौभाग्य से कंप्यूटर, टीवी, फोन, आदि अपना समय स्वयं ठीक कर लेते हैं। दरअसल शनिवार और रविवार की रात के 1:59 के एक मिनट बाद दोबारा एक बजा दिया गया था।

विश्व के बहुत से भागों में हर साल में दो बार समय को बदला जाता है — अप्रैल के अन्त में घड़ियाँ एक घंटा आगे की जाती हैं, और अक्तूबर में एक घंटा पीछे। सर्दियों का समय मानक समय होता है, और गर्मियों का समय डेलाइट सेविंग टाइम कहलाया जाता है — यानी यहाँ, पूर्वी यूएस में अब हम मानक समय (ET) पर लौट आए हैं, गर्मियों में Eastern Daylight Time (EDT) पर चले जाएँगे। । इस का कारण यह बताया जाता है कि गर्मियों में धूप अधिक देर तक रहती है, और सर्दियों में कम समय तक, इस कारण गर्मियों में घड़ियों को आगे कर कुछ धूप को “बचा” (?) लिया जाता है। यानी गर्मियों में आप अपनी सुबह और रात एक घंटा जल्दी शुरू करते हैं। यह प्रथा आम तौर पर उन देशों में अपनाई जाती है जो भूमध्यरेखा से दूर हैं, क्योंकि वहाँ मौसम बदलने से दिन-रात की लंबाई पर बहुत अधिक प्रभाव पड़ता है।

भारत में कई क्षेत्रों के स्कूलों में गर्मियों में “मॉर्निंग टाइम” कर दिया जाता है, यानी स्कूल एक-दो घंटे जल्दी खुलता है। यूँ समझिए कि बजाय स्कूलों, दफ्तरों, रेलों, हवाई जहाज़ों, आदि का समय बदलने के, घड़ियों का ही समय बदल दिया जाए।

डेलाइट सेविंग टाइम का अध्ययन करने पर कुछ बहुत ही रोचक तथ्य सामने आते हैं

1. जिन देशों ने डेलाइट सेविंग टाइम अपनाया है, वहाँ भी कई लोग इस का विरोध करते हैं। समय के साथ इस में बहुत सारे परिवर्तन हुए हैं। एक परिवर्तन यहाँ अगले साल (2007 में) किया जाना है। अगले वर्ष से ग्रीष्म-कालीन समय चार पाँच सप्ताह अधिक समय के लिए रहा करेगा — मार्च से नवंबर तक।

2. यूएस में कुछ प्रदेशों में डेलाइट सेविंग टाइम नहीं अपनाया जाता – जैसे एरिज़ोना और हवाई। तब भी एरिज़ोना के कुछ भागों – नवाहो नेशन – में इसे अपनाया जाता है। नवाहो नेशन मूल अमरीकियों (रेड इंडियन्स) का एक अर्ध-स्वायत्त क्षेत्र है, जो एरिज़ोना के अतिरिक्त दो और प्रदेशों, यूटा और न्यू मैक्सिको, में फैला है।

3. विकीपीडिया के अनुसार भारत में भी युद्ध के समय कुछ देर तक डेलाइट सेविंग टाइम का प्रयोग किया गया है, पर यह सूचना अप्रमाणिक लगती है।

4. पाकिस्तान ने भी 2002 में कोशिश कर के देख ली, पर फिर छोड़ दिया।

5. हम तो इस रविवार की सुबह एक घंटे के लिए फिर सो गए, पर यदि आप शनिवार रात को रात की ड्यूटी पर थे तो आप की शिफ्ट एक घंटा बढ़ गई होगी। कोई बात नहीं, मार्च 2007 तक इन्तज़ार कीजिए, आप की शिफ्ट एक घंटा कम हो जाएगी।

6. अक्सर देशों में यह अभियान चलाया जाता है कि घड़ियों का समय बदलने के साथ स्मोक अलार्म के सेल भी बदलें। यह एक तरह से इस द्विवार्षिक कार्य की याद दिलाता है, और आप का स्मोक अलार्म काम करता रहता है। यह अलग बात है कि जब हमारे घरों में खाने में तड़का लगता है, तो स्मोक अलार्म को बजने से बचाने के लिए कई तिगड़में करनी पड़ती हैं।

समय-क्षेत्रों के विषय में कुछ और रोचक सूचनाएँ

1. जहाँ बांगला-देश, भारत, पाकिस्तान में आधे-आधे घंटे का समय अन्तर है, वहीं मुख्य भूखंड यूएस में (यानी हवाई और अलास्का, जो मुख्य अमरीकी भूखंड के साथ नहीं जुड़े हैं, को छोड़ कर) चार मानक समयों का प्रयोग होता है जो एक दूसरे से एक एक घंटे के अन्तर पर हैं। यानी जहाँ मैं रहता हूँ और जहाँ मिर्ची सेठ रहते हैं, उन स्थानों के बीच तीन घंटों का अन्तर है। इस के अतिरिक्त हवाई और अलास्का में दो और टाइम ज़ोन हैं, यानी पूर्वी यूएस और पश्चिमी यूएस में लगभग उतना समय अन्तर है जितना भारत और इंगलैंड में है।

2. विश्व में सब से ज़्यादा (ग्यारह) टाइम ज़ोन्स रूस में हैं। चीन ऐसा सब से बड़ा देश है जिस में एक ही समय रखा गया है, हालाँकि वहाँ 1949 से पहले पाँच समय क्षेत्र थे।

3. विश्व के अधिकांश क्षेत्रों में यूटीसी से पूरे घंटों (यानी एक, दो, दस, आदि) का अन्तर रखा जाता है, पर कई देशों में “साढ़े” घंटों का भी अन्तर है, जिन में भारत भी है। नेपाल शायद ऐसा अकेला देश है जिस में “पौने” घंटों का भी अन्तर है। इस के अतिरिक्त ऐसे कुछ क्षेत्र आस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड में हैं।

4. विकीपीडिया के अनुसार मुंबई में 1955 तक शेष भारत से 39 मिनट का अन्तर था। क्या यह सही है?

बहुत हो गया, मुझे उठ कर वीसीआर का समय ठीक करना है। कहा जाता है कि जिन लोगों का तकनीकी रुझान नहीं होता उन के वीसीआर में हमेशा 12:00 बजे का समय ब्लिंक करता रहता है। मैं अपना इंप्रेशन तो ठीक कर लूँ।