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सवाल बहुवचन संबोधन में अनुस्वार का

मित्रो, मैं आज बहुत समय बाद लिख रहा हूँ और आशा है कि आगे से नियमित लिखूँगा।

ऊपर लिखे इस वाक्य में आप को कुछ अटपटा लगा? मुझे यकीन है कि कुछ लोगों को “मित्रो” शब्द आम भाषा से विपरीत लगा होगा, क्योंकि उन्हें संबोधन में भी “मित्रों” लिखने कहने की आदत है। दरअसल यह लेख इसी प्रश्न का उत्तर देने की एक कोशिश है कि संबोधन बहुवचन में “मित्रो” कहा जाना चाहिए या “मित्रों”, “भाइयो-बहनो” कहा जाना चाहिए या “भाइयों-बहनों”। हाल में इस विषय पर बर्ग वार्ता के अनुराग जी से फ़ेसबुक पर लंबा संवाद हुआ, और अपने इस लेख में उन्होंने अपनी बात को विस्तार पूर्वक भी रखा। फ़ेसबुक के मुकाबले ब्लॉग पर लेख रखना अच्छा है, और इसके लिए मैं उनको धन्यवाद देना चाहता हूँ। फ़ेसबुक पर लिखा हुआ आम तौर पर कुछ दिनों में खो जाता है, और हमारी पहुँच से तो क्या, गूगल की पहुँच से भी बाहर हो जाता है। इसके अतिरिक्त ब्लॉग पर links और images देने में भी अधिक स्वतंत्रता रहती है।

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गूगल की उर्दू – कराची मतलब भारत

गूगल ने उर्दू के शौकीनों के लिए बहुत ही नायाब टूल उपलब्ध करा दिया है। पिछली 13 मई से गूगल अनुवादक में उर्दू जोड़ दी गई है, यानी आप अब उर्दू से, या उर्दू में, दर्जनों भाषाओं का अनुवाद कर सकते हैं। गूगल ट्रान्सलेट पर जाइए, “Translate from” में “Urdu ALPHA” चुनिए, “Translate to” में हिन्दी, अंग्रेज़ी या दर्जनों अन्य भाषाओं में से कोई भी चुन लीजिए और ट्रान्सलेट का बटन दबाइए। अनुवादक अभी एल्फा, या यूँ कहें अलिफ़ अवस्था में है, इस कारण कुछ बचपना, कुछ शरारतें तो करेगा ही, पर कुल मिला कर काम की चीज़ है।

बढ़िया बात यह है कि इस टूल का प्रयोग न केवल अनुवाद करने में किया जा सकता है, बल्कि उर्दू लिखनें में भी किया जा सकता है, और कुछ शब्दों का हिन्दी से लिप्यन्तरण करने में भी प्रयोग किया जा सकता है। यानी यदि आप को उर्दू लिखनी पढ़नी नहीं आती, तो भी आप रोमन अक्षरों का प्रयोग कर उर्दू टाइप कर सकते हैं। ध्यान रखें कि Type Phonetically वाला चैकबॉक्स सक्रिय हो, अब उर्दू वाले बक्से में bhaarat लिखें और आप को بھارت लिखा मिल जाएगा।

कुछ वर्ष पहले मैं ने एक पोस्ट लिखी थी जिस में मैं ने बताया था कि जैसे अन्य भारतीय भाषाओं में एक लिपि से दूसरी में लिप्यन्तरण संभव है, वह उर्दू के साथ क्यों संभव नहीं है। लिपि की भिन्नता की यह समस्या किसी हद तक गूगल ने इस टूल के द्वारा हल कर दी है, हालाँकि कमियाँ अभी मौजूद हैं।

अनुवाद की कुछ कमियाँ तो बड़ी रोचक हैं, और इनकी ओर ध्यान दिलाने के लिए शुएब और अरविन्द का धन्यवाद — उन से बज़ पर कुछ बातचीत हुई थी इस बारे में। मुलाहिज़ा फरमाइए गूगल-उर्दू-अनुवादक के कुछ नमूने

उर्दू में लिखिए हिन्दी अनुवाद
کراچی (कराची) भारत
افغانستان (अफ़ग़ानिस्तान) भारत
انڈیا (इंडिया) भारत और पड़ौस
پاکستان (पाकिस्तान) भारत

यानी गूगल वालों को इस क्षेत्र में भारत के सिवाय कुछ नहीं दिखता। यह विशेष अनुवाद उर्दू से हिन्दी में ही उपलब्ध है, उर्दू से अंग्रेज़ी में अनुवाद ठीक हो रहा है। यह आश्चर्च की बात है कि जब कि उर्दू से हिन्दी में अनुवाद सब से आसान होना चाहिए था, इसी में दिक्कतें आ रही हैं। अरे गूगल भाई, कुछ नहीं आता तो शब्द को जस का तस लिख दो। हिन्दी से उर्दू के अनुवाद में भारत का अनुवाद भारत ही है, पर भारत और पड़ौस लिखेंगे तो उसका अनुवाद है انڈیا (इंडिया)।

ऊपर दिए शब्दों के इस स्क्रीनशॉट में देखिए
Google Translator Urdu Alpha

वैसे कुछ उर्दू पृष्ठ जो आप अभी तक नहीं समझ पाते थे, अब समझ पाएँगे। पृष्ठ का यूआरएल, या मसौदा, गूगल के अनुवादक में डालिए और अनुवाद पाइए। समझ पाने लायक तो अनुवाद हो ही जाएगा। उदाहरण के लिए शुएब के इस ब्लॉग-पोस्ट का अनुवाद

कुछ प्रश्न हों, कुछ संशय हों, कृपया टिप्पणी खाने में पूछें। यदि आपको भी कुछ अजीबोग़रीब तरजमे मिले हों तो अवश्य बताएँ।

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उर्दू देवनागरी लिपियाँ – एक तुलनात्मक अध्ययन

[आज जुलाई का अन्तिम दिन है। यदि आज मैं यह प्रविष्टि नहीं लिखता तो इस चिट्ठे की पौने तीन वर्ष की आयु में पहला महीना ऐसा चला जाता जिस में कुछ भी न लिखा गया हो। अपने चिट्ठे को सुप्तावस्था से बाहर लाने की कोशिश है यह प्रविष्टि, जो मैं ने कुछ समय पहले आरंभ की थी और इसे अभी भी पूरा नहीं कर पाया हूँ।]

USA and Britain are called two nations divided by the same language. I think Hindi and Urdu remain the same language divided by a script.

अभय अग्रवाल के चिट्ठे से लिया यह उद्धरण मुझे बहुत सटीक लगा। उर्दू इतनी हसीन ज़बान है और इतनी अपनी लगती है, पर इस की लिपि ने इसे पराई कर दिया है। यह बात नहीं है कि उर्दू में प्रयुक्त नस्तालीक़ लिपि सीखी नहीं जा सकती, पर उसी ज़बान को लिखने के लिए जब हम देवनागरी जैसी लिपि का प्रयोग जानते हैं, तो उसी के लिए एक और लिपि सीखना मेहनत का काम तो है ही। हिन्दी वालों ने संस्कृत के शब्दों से और उर्दू वालों ने अरबी-फ़ारसी शब्दों से इस एक ही भाषा में जो दरार डाली है, उसे आम तौर पर हिन्दुस्तानी बोलने वालों ने सीधी-सादी भाषा बोल कर पाट दिया है। पर लिपियों की भिन्नता ने जो दरार डाली है, उसे पाटने के लिए बहुत मेहनत चाहिए।

जितना हिन्दी चिट्ठाजगत का कारवाँ बढ़ रहा है, उतनी तेज़ी से नस्तालीक़ में लिखे उर्दू चिट्ठे तो सामने नहीं आ रहे हैं, पर उर्दू में जितना भी लिखा जा रहा है, उसे पढ़ने की ललक हिन्दी चिट्ठाकारों और पाठकों में बढ़ती जा रही है। पिछले वर्ष मैं ने उर्दू में लिखे चिट्ठों पर एक नज़र डाली थी, और उम्मीद की थी कि इसे नियमित रूप से लिख पाऊँगा। पर जैसा इस चिट्ठे पर होता आया है, वही हुआ। महीने में कुल जमा दो-तीन पोस्ट लिखे जाते हैं, और वह भी बिना किसी प्लानिंग के। इस के इलावा भारत से उर्दू के कोई खास चिट्ठे भी सामने नहीं आए। शुऐब का उर्दू चिट्ठा نئی باتیں / نئی سوچ (नई बातें नई सोच) नियमित पढ़ता हूँ। इंडस्क्राइब का बेस्ट ग़ज़ल्स भी बढ़िया है पर वे यूनिकोड उर्दू न लिख कर ग़ज़लों को स्कैन कर के छापते हैं। हिन्दी चिट्ठाजगत में उर्दूदानों की संख्या बढ़ गई है, पर उर्दू चिट्ठाकारों की संख्या ज्यों की त्यों है।

इस बीच एक अच्छे इरादे से कोशिश हो रही है उर्दू-हिन्दी लिप्यन्तरण (ट्रान्सलिट्रेशन) सॉफ्टवेयर बनाने की। भोमियो के पीयूष, जो कि भारतीय लिपियों को आपस में परिवर्तित करने में बहुत सफल रहे हैं, अब प्रयत्न कर रहे हैं उर्दू से हिन्दी ट्रान्सलिट्रेशन की। जो अभी तक हासिल हुआ है, उस के बारे में यही कहा जा सकता है कि कुछ न होने से तो बेहतर है। कई लोग इस से उत्साहित हैं, पर इस मामले में मैने शुरू से जो टिप्पणियाँ दी हैं, वे बहुत अधिक उत्साहवर्धक नहीं रही हैं इस काम में लगे लोगों के लिए, या इस सॉफ्टवेयर का इन्तज़ार कर रहे लोगों के लिए। इसका कारण यह है कि मैं दोनों लिपियों को समझता हूँ और यह मानता हूँ कि उर्दू से हिन्दी (या उर्दू से रोमन) का सही लिप्यन्तरण लगभग असंभव है। जो लोग उत्साहित हैं वे उर्दू नहीं जानते। जो जानते हैं, उन्हें मालूम है कि मंजिल दूर है। अपनी इस राय के कारण को विस्तार से समझाने की कोशिश करूँगा इस पोस्ट में।

भारतीय लिपियों के बीच ट्रान्सलिट्रेशन बहुत सरल है। देवनागरी, गुरमुखी, गुजराती, बंगाली, तमिल आदि लिपियों की संरचना समान है, बस अक्षरों के आकार भिन्न हैं। इन सब लिपियों से रोमन में ट्रान्सलिट्रेशन भी सरल है, क्योंकि जो रोमन आप को हासिल होती है, वह अग्रेज़ी हिज्जों या नियमों की मोहताज नहीं है। इस सरलता ने हमारी उम्मीदें बढ़ा दी हैं, और अब हम बिना उर्दू सीखे ही उसे भी पढ़ना चाहते हैं। पर कल्पना कीजिए कि आप को अंग्रेज़ी से देवनागरी का ट्रान्सलिट्रेशन बनाने को कहा जाए। एक सीधे से वाक्य “George Bush is the President of United States of America” का लिप्यान्तरण बनेगा “गेओर्गे बुश इस थे प्रेसिदेन्त ओफ उनितेद स्ततेस ओफ अमेरिका”। यदि आप को इस तरह का लिप्यन्तरण चलता है तो फिर ठीक है। पर सही लिप्यन्तरण के लिए इस में ऐसे टूल डालने पड़ेंगे जो हर शब्द का ध्वन्यात्मक रूप खोजे और उसे फिर देवनागरी में लिपिबद्ध करे – यानी एक अंग्रेज़ी का टेक्स्ट-टू-वॉइस कन्वर्टर और हिन्दी का वॉइस-टू-टेक्सट कन्वर्टर। यूँ समझिए कि उर्दू की हालत इस से कई गुणा जटिल है। उर्दू में हर शब्द का क्या उच्चारण है यह इस बात पर निर्भर करता है कि सन्दर्भ क्या है। उदाहरण के लिए “क्या” और “किया” एक ही तरह से लिखा जाता है। “अस”, “इस” और “उस” एक ही तरीके से लिखा जाता है। पढ़ने वाला मज़मून के मुताबिक उसे सही पढ़ता है। यह उम्मीद कंप्यूटर से तो नहीं की जा सकती न?

आइए उर्दू लिपि की संरचना पर एक नज़र डालें (हिन्दुस्तानी भाषा की दृष्टि से – फारसी या अरबी की दृष्टि से नहीं), जो इस को आम कंप्यूटर की समझ से बाहर कर देते हैं।

1. उर्दू अक्षरमाला
उर्दू लिपि में 37 अक्षर हैं और कुछ चिह्न हैं, पर हिन्दुस्तानी की दृष्टि से कई ध्वनियाँ डुप्लिकेट हैं, और कई अक्षर हैं ही नहीं। दो “अ” हैं (अलिफ़ और ऐन), चार-पाँच “ज़” हैं (ज़े, ज़ाल, ज़ुआद, ज़ोए, और तीन बिन्दियों वाला रे), दो “त” हैं (ते और तोए), दो “स” हैं (से और सुआद)। इन सब में आपस में उच्चारण का कोई अन्तर नहीं है; शायद अरबी फ़ारसी में होता हो, उर्दू में नहीं है। पर नियमानुसार यह भी आवश्यक है कि अरबी फ़ारसी से आए शब्दों के लिए सही अक्षर का ही प्रयोग हो। मसलन यदि “मसलन” के लिए “से” का प्रयोग होता है तो “सुआद” या “सीन” का प्रयोग नहीं हो सकता (या इस का उल्टा)। “मसलन” के आखिर में जो न की ध्वनि है उस के लिए “नून” नहीं लिखा जाता पर “अलिफ़” के ऊपर दो लकीरें डाली जाती हैं, पता नहीं क्यों। ख, घ, छ, झ, आदि के लिए उर्दू में अक्षर नहीं है पर इन्हें क, ग, च, ज, आदि के साथ ह (दोचश्मी-हे) जोड़ कर लिखा जाता है। कीफ़-क़ाफ़, गाफ़-ग़ैन, आदि में कुछ उच्चारण का अन्तर है, जो हिन्दुस्तानी बोलने वाले आम तौर पर जानते हैं, पर हमेशा नहीं। देवनागरी में नुक़्ते वाले अक्षर क़, ग़ आदि इसी के लिए प्रयोग होते हैं।

2. स्वर/मात्राएँ
उर्दू लिपि में कुछ स्वरों के लिए अक्षरों का प्रयोग होता है (अलिफ़, ऐन, ये, वाव) और कुछ स्वरों के लिए ऊपर या नीचे लगाए जाने वाले चिह्न (ज़ेर, ज़बर, पेश)। पर जो चिह्न हैं, उन का प्रयोग बिल्कुल ऐच्छिक (optional) है, यानी लगाया तो लगाया, नहीं लगाया तो नहीं लगाया। आम तौर पर इन चिह्नों को नहीं ही लगाया जाता है। यही कारण है कि क+स लिखने पर यह पढ़ने वाले को स्वयं अन्दाज़ा लगाना है कि यह किस है, कस है या कुस। शब्द में जितने अधिक अक्षर होंगे उतनी संभावनाएँ बढ़ जाएँगी। क+स+न = कसन / किसन / कसिन / कुसन / कसुन / किसिन / कुसुन / कस्न / कुस्न / किस्न / क्सन। अब हमें तो मालूम है “किसन” होगा, पर कंप्यूटर बेचारे को क्या पता कहाँ पर कौन सी मात्रा लगानी है, या किस अक्षर को आधा कर के पढ़ना है।

व के लिए जो अक्षर प्रयोग होता है (वाव) वही ऊ, ओ और औ के लिए भी प्रयोग होता है। यानी कौल लिखेंगे तो उसे कौल, कोल, कवल, कूल कुछ भी पढ़ा जा सकता है।

य के लिए जो अक्षर प्रयोग होता है (नीचे दो बिन्दियाँ) वही ई, ए, ऐ के लिए भी प्रयोग होता है। यानी सेठ को सैठ, सेठ, सयठ, सीठ, कुछ भी पढ़ा जा सकता है।

3. ह का प्रयोग
जैसा मैं ने बताया ख, घ, छ, झ, आदि के लिए अक्षर नहीं है पर इन्हें क, ग, च, ज, आदि के साथ ह (दोचश्मी-हे) जोड़ कर लिखा जाता है। दो चश्मी हे को कई बार ह के लिए भी प्रयोग किया जाता है (शब्द के आरंभ में)। हे को अन्त में कई बार आ की ध्वनि के लिए प्रयोग किया जाता है – जैसे वग़ैरा/वग़ैरह, मुज़ाहिरा/मुज़ाहिरह, हमला/हमलह, इन सब के अन्त में अलिफ़ (आ) के स्थान पर हे (ह) आता है।

4. शब्दों के बीच स्थान
शब्दों के बीच अलग से स्थान छोड़ने का नियम नहीं है। पर अक्षरों को जोड़ने के जो नियम हैं, उन से एक शब्द के बीच ऐसे स्थान आ जाता है, कि वे दो शब्द लगते हैं। जैसे, क्या आप बता सकते हैं कि इस शेर की एक लाइन में कितने अल्फ़ाज़ (शब्द) हैं?
daagh dehlvi
कंप्यूटर के लिए भी यह समझना कठिन होगा कि कौन सा शब्द कहाँ आरंभ होता है और कहाँ समाप्त होता है। दोनों पंक्तियों के बीच जो बिन्दियाँ हैं, वे ऊपर के अक्षरों के साथ हैं, या नीचे के अक्षरों के साथ, यह समझना भी एक मशीन के लिए मुश्किल है। यानी, ओ.सी.आर. भी दिक्कत का काम है।

इस सब को देखते हुए मेरा यह मानना है कि उर्दू पढ़नी हो तो सब से सही तरीका है, उर्दू सीखो। अच्छी खबर यह है कि उर्दू सीखना मुश्किल नहीं है। फ़ुर्सत रही तो उर्दू को आसानी से सिखाने के लिए कुछ लेख भी लिखूँगा। दिल यह कहता है कि उर्दू को भी देवनागरी में लिखा जाए तो कितना ही अच्छा हो। पर उर्दू के ठेकेदारों को यह बात नागवार गुज़रनी है।

पीयूष ने अपने लिप्यन्तरण सॉफ्टवेयर पर उर्दूदानों की राय जानने के लिए उर्दू के यूज़नेट वाले ग्रुप में मदद मांगी थी, पर वहाँ बहस ऐसी छिड़ी और ऐसी मुड़ी कि नतीजा कुछ नहीं निकला।

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उर्दू तकनीकी हिन्दी

यूनिनागरी में अब शुषा, कृतिदेव लेआउट, और उर्दू भी

आप साइबर कैफे में, लाइब्रेरी में, दफ्तर में या किसी ऐसे कंप्यूटर पर काम कर रहे हैं जहाँ आप को कुछ भी इन्स्टाल करने की आज़ादी नहीं है, और आप हिन्दी लिखना चाहते हैं। ऐसे में यूनिनागरी और हग जैसे ऑनलाइन टाइपराइटर बहुत काम आते हैं। मेरी साइट पर यूनिनागरी पिछले दो वर्षों से अधिक से चल रहा है, और कई लोग इसे नियमित प्रयोग कर रहे हैं। अनुभवी लेखकों के काम आने के इलावा इस तरह के टूल उन के भी काम आते हैं जो हिन्दी में लिखना शुरू कर रहे हैं, और अभी कुछ डाउनलोड-इन्स्टाल करने की स्थिति में नहीं हैं।

यूनिनागरी का अपना डिफॉल्ट कुंजीपटल फोनेटिक है, पर फोनेटिक नहीं भी। मतलब यह कि यह ट्रान्सलिट्रेशन नहीं करता, एक कुंजी से एक अक्षर टाइप होता है, जो जहाँ तक हो सके फोनेटिक होने के नज़दीक है (ट्रान्स्लिट्रेशन के लिए हग टूल बहुत बढ़िया काम करता है)। डिफॉल्ट कुंजीपटल के अतिरिक्त मैं ने यूनिनागरी में कुछ समंय पहले इन्स्क्रिप्ट कुंजीपटल जोड़ा था, जो कई लोगों के काम आ रहा है। रवि भाई का इसरार था कि इस में उन लोगों के लिए भी कीबोर्ड लेआउट बनाए जाएँ जो रेमिंगटन/कृतिदेव पर या शुषा पर लिखने के आदी हैं। इस से उन लोगों को भी यूनिकोड में कन्वर्ट करने में आसानी होगी, जो टाइपिंग की आदत नहीं बदलना चाहते और उस कारण कृतिदेव या शुषा प्रयोग कर रहे हैं, या यूनिकोड पर तो आ गए हैं, पर टाइपिंग में दिक्कत महसूस कर रहे हैं।

तो लीजिए हाज़िर है यूनिनागरी का नया रूप – जिस में कृतिदेव/रेमिंगटन और शुषा से मिलते जुलते कीबोर्ड जोड़ दिए गए हैं। जब इन्स्क्रिप्ट जोड़ा था तो साथ में गुरुमुखी लिपि का टाइपराइटर भी जोड़ा था। अब की बार बोनस है उर्दू का टाइपराइटर। इंटरनेट पर ऑनलाइन उर्दू एडिटर की कमी बहुत खल रही थी। उम्मीद है, भारत से और उर्दू चिट्ठाकार उभर कर आएँगे – अभी तक दो तीन ही हैं – जिन में से एक अपने शुएब भाई हैं। नए प्रयोक्ताओं के लिए एक आम प्रश्नोत्तरी भी जोड़ दी है। आगे का इरादा और भारतीय भाषाओं की टाइपिंग जोड़ने का है, ताकि यूनिनागरी एक इंडिक ऑनलाइन टाइपराइटर बन सके।

यदि आप स्वयं के कंप्यूटर पर काम कर रहे हैं तो आम तौर पर ऑनलाइन टाइपराइटर की दरकार नहीं होती। मेरा मानना है कि मानकीकरण के लिए हम सब को इन्स्क्रिप्ट टाइपराइटर की आदत डाल लेनी चाहिए। इन्स्क्रिप्ट टाइपराइटर माइक्रोसॉफ्ट के इंडिक

Keyboard options on Indic IME 1 ver. 5

आइ.एम.ई. में उपलब्ध है ही। इंडिक आइ.एम.ई. 1 वर्जन 5 में और कई और कुंजीपटलों का चुनाव संभव है – रेमिंगटन है, पर शुषा नहीं। आप यह भी जानते होंगे (नहीं जानते हैं तो जान लीजिए) कि माइक्रोसॉफ्ट के कीबोर्ड लेआउट क्रिएटर टूल के द्वारा आप अपनी मर्ज़ी का कीबोर्ड लेआउट बना सकते हैं। इसे डाउनलोड कीजिए और जो लेआउट आप को पसन्द हो वह बनाइए।

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नुक़्ते की बात

नुक़्ताचीं है ग़मे दिल उस को सुनाए न बने
क्या बने बात जहाँ बात बनाए न बने।

जो लोग उर्दू शायरी के शौकीन नहीं हैं, उन के लिए ग़ालिब के इस शेर की थोड़ी सी व्याख्या (मेरी समझ से) –

नुक़्ताचीं = नुक़्ताचीनी या आलोचना करने वाला। वह नुक्ताचीं है (हर बात पर आलोचना करता है), इस कारण उसे दिल का ग़म सुनाते नहीं बनता। अब जहाँ बात बनाते (करते) नहीं बनती वहाँ अपनी बात कैसे बन सकती है? शाब्दिक अर्थ तो मैं ने बता दिया। अब इस से गहरी विवेचना आप स्वयं सोच सकते हैं। वह कौन है? बात क्या है?

हरेक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है
तुम्हीं कहो कि ये अन्दाज़े गुफ़्तगू क्या है।

न, यह लेख शेरो-शायरी के बारे में नहीं है। मेरा यह लेख काफी समय से ओवरड्यू है, सही हिन्दी शृंख्ला शृंखला के अन्तर्गत। पिछली बार चन्द्रबिन्दु और अनुस्वार के नियम बताए गए थे, और वादा हुआ था कि अगली बार नुक़्ते के सही प्रयोग की बात होगी। तो लीजिए पेश है नुक़्ते की बात।

पहली बात यह समझने की है कि मूल हिन्दी भाषा में नुक़्ते का (या नुक्ते का?) कोई काम नहीं है। मूल भारतीय हिन्दी भाषा में ऐसे शब्द हैं ही नहीं जिन के लिए नुक़्ते का प्रयोग ज़रूरी हो, क्षमा करें, जरूरी हो। देवनागरी लिपि नुक़्ते के बिना ही हिन्दी के हर अक्षर, हर ध्वनि को लिखने में सक्षम है। हाँ इस में जब अरबी-फारसी (उर्दू के द्वारे) या अंग्रेज़ी के शब्द जोड़े गए, और उन का सही उच्चारण करने की ज़रूरत महसूस हुई तो उन के लिए नुक़्ता प्रयोग में लाया गया।

यह कैसे पता चले कि कहाँ पर नुक़्ता प्रयोग करना है और कहाँ पर नहीं। दुर्भाग्यवश, इस का जवाब चन्द्रबिन्दु और अनुस्वार जैसा आसान नहीं है – क्योंकि इस पर देवनागरी के सरल नियम लागू नहीं होते। इस के लिए या तो अंग्रेज़ी या उर्दू लिपि में मूल वर्तनी देखनी पड़ती है, या शब्द का मूल भाषा में एकदम सही उच्चारण मालूम होना चाहिए। अंग्रेज़ी की रोमन लिपि तो आम तौर पर सभी को आती है, पर उर्दू की नस्तालीक़ लिपि के बारे में ऐसा नहीं कहा जा सकता। पर सौभाग्यवश, ग़लती न हो इस का एक सरल उपाय है – वह यह कि हिन्दी लिखते हुए जहाँ संदेह हो, वहाँ नुक़्ते का प्रयोग न करें – क्योंकि हिन्दी में तो नुक़्ता होता ही नहीं। भई हम गजल, जरूरत, जिन्दगी बोलते हैं तो वही तो लिखेंगे न? हाँ कई जगह नुक़्ते का प्रयोग जरूरी, क्षमा करें ज़रूरी, हो जाता है, यदि हम मूल भाषा का वाक्य उद्धृत कर रहे हों, किसी का नाम लिख रहे हों, आदि। जैसे – अज़हर ने कहा, “ही इज़ ए गुड बैट्समैन।” इस में ज़ की जगह ज नहीं चलेगा। यह भी ध्यान दें कि यदि हम नुक़्ते का प्रयोग कर रहे हैं तो हम यह बता रहे हैं कि हमें मालूम है कि यहाँ पर नुक़्ता प्रयोग होगा – इसलिए बेहतर है कि हमें वाक़ई यह मालूम हो।

नुक़्ता जिन अक्षरों में प्रयोग होता है, वे हैं – क़, ख़, ग़, फ़, और ज़। यह सब उर्दू से आए हैं, केवल ज़ ऐसी ध्वनि है जो अंग्रेज़ी में भी पाई जाती है। ड और ढ के नीचे आने वाले बिन्दु (ड़, ढ़) अलग हैं, वे विदेशी शब्दों को इंगित नहीं करते और उन से उच्चारण में आने वाला अन्तर हिन्दी भाषियों को भली भान्ति मालूम है। आइए देखें क़, ख़, ग़, फ़, और ज़ के उदाहरण।

क़ – उर्दू वर्णमाला में काफ़ (ک) और क़ाफ़ (ق) दो अलग वर्ण हैं, और दोनों के उच्चारण में अन्तर है। क़ की ध्वनि को फोनेटिक्स की भाषा में voiceless uvular stop कहा जाता है। रोमन लिपि में उर्दू लिखते हुए इस के लिए q का प्रयोग होता है, जबकि क के लिए k का। पर यह केवल सुविधा के लिए किया गया है – अंग्रेज़ी में q और k के बीच ऐसा कोई अन्तर नहीं है, और जहाँ तक मेरी जानकारी है, अंग्रेज़ी में क़ाफ वाली कोई ध्वनि नहीं है। पर फिर भी यदि आप किसी उर्दू शब्द के अंग्रेज़ी हिज्जों में q का प्रयोग देखते हैं तो आप उसे हिन्दी में लिखते हुए क़ का प्रयोग कर सकते हैं। उदाहरण – नुक़्ता, क़रीब, क़ायदा, क़ैफ़ियत जैसे शब्दों में नुक़्ता प्रयोग होगा, जबकि किनारा, किताब, मुल्क, इनकार जैसे शब्दों में नहीं होगा (सुनें)।

ख़ – उर्दू वर्णमाला में ख की ध्वनि के लिए काफ़ के साथ दो-चश्मी-हे (ھ) को जोड़ा जाता है (ک + ھ = کھ) , यानी क के साथ ह को जोड़ कर ख बनता है – शायद इसलिए कि अरबी फारसी में ख की ध्वनि नहीं होती, पर ख़ (voiceless uvular fricative) के लिए अलग वर्ण है जिसे ख़े कहते हैं। रोमन लिपि में मैं ने इस के लिए कोई विशेष वर्ण मानक रूप में प्रयोग होते नहीं देखा। उदाहरण – ख़रीद, ख़ारिज, ख़ैबर, अख़बार (ख़बर, मुख़बिर), ख़ास, कुतुबख़ाना (पुस्तकालय) आदि में नुक़्ता प्रयोग होगा। बिना नुक़्ते के ख वाले शब्द अरबी-फारसी से नहीं हैं, इस कारण देसी शब्दों के लिए ख और अरबी-फारसी शब्दों के लिए ख़ का प्रयोग करें, जैसे खाना-ख़ज़ाना (सुनें)।

ग़ – यहाँ अन्तर है गाफ़ (گ) और ग़ैन (غ) का। यहाँ भी अंग्रेज़ी स्पेलिंग से कोई मदद नहीं मिल पाएगी, हाँ कई बार ग़ैन के लिए gh का प्रयोग होता है जैसे ghazal (ग़ज़ल)। पर इस का घ से भी कन्फ्यूजन हो सकता है, इस कारण उच्चारण का अन्तर, या फिर उर्दू के हिज्जे पता होने चाहिएँ। उदाहरण – ग़रीब, ग़ायब, मग़रिब (पश्चिम), ग़ुस्सा, आदि में ग़ प्रयोग होगा, और अलग, अगर, गिरह, गिरेबान में ग (सुनें)।

फ़ – अरबी-फ़ारसी लिपि में फ की कमी प+ह=फ (پ +ھ = پھ) के द्वारा पूरी की जाती है, और फ़ के लिए फ़े (ف) का प्रयोग होता है। अंग्रेज़ी में उर्दू शब्द लिखते हुए फ के लिए ph और फ़ के लिए f का प्रयोग होता है। पर मुझे नहीं लगता अंग्रेज़ी भाषा में ph और f के बीच कोई अन्तर है। इस कारण मुझे नहीं लगता कि f वाले अंग्रेज़ी शब्दों (file, format, foot) के लिए नुक़्ते के प्रयोग की आवश्यकता है। हाँ, उर्दू के शब्दों के उदाहरण हैं – फ़रमाइश, फ़रिश्ता, काफ़िर, आदि। फ वाले शब्द देसी हैं, इस कारण हिन्दी शब्दों (फिर, फल, फागुन) के लिए फ, और उर्दू शब्द यदि अरबी-फ़ारसी से आया है, तो उस के लिए फ़ का प्रयोग करें (सुनें)।

ज़ – मेरे विचार में हिन्दी भाषियों के लिए ज़ की ध्वनि पहचानना सब से आसान है, क्योंकि इस की ध्वनि ज से काफी भिन्न है। यहाँ पर नुक़्ते का ग़लत प्रयोग बहुत खटकता है। अन्तर है j और z का। उर्दू में चार ऐसे वर्ण हैं जिन से ज़ की आवाज़ आती है – ज़ाल (ذ), ज़े (ز), ज़ुआद (ض), ज़ोए (ظ), और एक वर्ण जिस से ज की आवाज़ आती है, जीम (ج)। कई हिन्दी भाषी उत्साह में (लिखने या बोलने में) वहाँ भी ज़ की आवाज़ निकालते हैं जहाँ ज की आवाज़ आनी चाहिए – जैसे जलील की जगह ज़लील, मजाल की जगह मज़ाल, जाहिल की जगह ज़ाहिल, आदि। ऐसी ग़लती से बचना चाहिए, क्योंकि इस से शब्द का अर्थ ही बदल सकता है – जैसे, मैं दुल्हन को सज़ा (सजा) दूँगी। ऐसे में फिर वही नुस्ख़ा दोहराऊँगा – जब सन्देह हो तो नुक़्ते से बचें। नुक़्ता न लगाने का बहाना है, पर ग़लत जगह लगाने का नहीं है। ज और ज़ के कुछ और उदाहरण – ज़रूर, ज़ुल्म, जुर्म, राज़ (रहस्य), सज़ा, ज़बरदस्त, जमील, जलाल, वजूद, ज़ंजीर, मिज़ाज, ज़्यादा, जज़ीरा (द्वीप) आदि (सुनें)।

उर्दू की लिपि की इन विसंगतियों को देखते हुए आप को यह नहीं लगता कि उर्दू वालों को भी देवनागरी अपनानी चाहिए? मैं तो ऐसा ही मानता हूँ, पर चलिए उस के बारे में फिर कभी बात करते हैं। इस लेख, यानी नुक़्ते की बात, पर आप के ख़्यालात मुख़्तलिफ़ हों, या आप कोई नुक़्ताचीनी करना चाहते हों तो टिप्पणियों के डिब्बे का प्रयोग करें।

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चुटकुला-गूँज + सुभाषित-सहस्र

विवाह के विषय में कुछ सुभाषित (पुरुषों की नज़र से)


मैं ने सुना है कि प्रेम रसायनशास्त्र की तरह है। शायद यही वजह है मेरी पत्नी मुझे विषैले पदार्थ के समान समझती है।   

डेविड बिसोनेट


कोई व्यक्ति यदि आप की पत्नी को चुरा लेता है, तो उस से बदला लेने का सब से बेहतर तरीका है कि उसे ही रखने दो।   

साचा गिल्ट्री


विवाह के बाद पति पत्नी एक ही सिक्के के दो पहलू बन जाते हैं — वे एक दूसरे का मुँह नहीं देख सकते हैं पर सदा साथ रहते हैं।   


विवाह आप के लिए हर तरह से लाभकारी है — यदि अच्छी पत्नी मिली तो सुखी रहेंगे, बुरी मिली तो फिलासफर बनेंगे।   

– सुकरात


सफल विवाह में कुछ लेना होता है, कुछ देना। पति का देना और पत्नी का लेना।   


नारी हमें महान कार्य करने की प्रेरणा देती है, और उन्हें अंजाम देने से रोकती है।   

– ड्यूमास


जीवन का सब से दुष्कर प्रश्न, जिस का मुझे उत्तर नहीं मिल पाया है….. “आखिर नारी चाहती क्या है?”   

– फ्रायड


हमारा वार्तालाप हुआ — मैंने कुछ शब्द कहे, और उस ने कुछ पृष्ठ कहे।   


“कुछ लोग मुझ से हमारे सफल दांपत्य जीवन का राज़ पूछते हैं। हम हर सप्ताह में दो बार रेस्तराँ जाने का समय निकालते हैं — कैंडल-लाइट डिनर, कुछ संगीत, कुछ नाच। वह हर मंगल जाती है, मैं हर शुक्र।”   

– हेनरी यंगमैन


“मैं आतंकवाद से नहीं ड़रता। मैं दो साल तक शादीशुदा रहा हूँ।”   

– सैम किनिसन


“बीवियों के बारे में मेरी हमेशा किस्मत ख़राब रही है। पहली मुझे छोड़ कर चली गई, और दूसरी नहीं गई।”   

– पैट्रिक मरे


यह सही है कि सब लोग आज़ाद और बराबर जन्म लेते हैं, पर कुछ लोग शादी कर लेते हैं!   


विवाह एक ऐसी विधि है जिस के द्वारा आप यह मालूम करते हैं कि आप की पत्नी को किस तरह का व्यक्ति दरकार था।   


विवाह को आनन्दमय रखने के दो राज़   

1. जब आप गलत हों तो गलती मान लें
2. जब आप सही हों तो चुप रहें

– नैश


मेरी पत्नी को बस दो शिकायतें हैं — पहनने को कुछ नहीं है, और कपड़ों के लिए अलमारियाँ काफी नहीं हैं।   


मैं शादी से पहले क्या करता था? …. जो जी में आता था।   

– हेनरी यंगमैन


मेरी पत्नी और मैं बीस साल तक बहुत खुश रहे। फिर हमारी मुलाकात हुई।   

– रॉडनी डेंजरफील्ड


एक अच्छी पत्नी हमेशा अपनी ग़लती के लिए अपने पति को माफ कर देती है।   

– मिल्टन बर्ल


शादी एक अकेला ऐसा युद्ध है जिस में आप अपने शत्रु के साथ सोते हैं।   

– अनाम


“मैं ने अपनी पत्नी से कई वर्षों से बात नहीं की। मैं बीच में नहीं टोकना चाहता था।”   

– रॉडनी डेंजरफील्ड


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चन्द्रबिन्दु (ँ) और अनुस्वार (ं) के नियम

अभी हाल में प्रतीक का पोस्ट पढ़ा सही हिन्दी (broken link) लिखने पर। बहुत ही सटीक और सामयिक लेख था, और इस विषय पर मैं भी बहुत समय से लिखना चाहता था। अब प्रतीक की बात को ही आगे बढ़ाता हूँ। हालाँकि हम सभी चिट्ठाकार हिन्दी के दीवाने हैं, हम में से अधिकांश लोगों ने हिन्दी में कोई उच्चस्तरीय शिक्षा नहीं प्राप्त की है। लगभग सभी लोग तकनीकी क्षेत्रों में हैं, और बहुत कम लोगों ने हाइ-स्कूल से आगे हिन्दी पढ़ी होगी। इस कारण हम में से कई लोग ऐसे हैं जो मात्राओं आदि का हेर-फेर करते रहते हैं। इस के अतिरिक्त हिन्दी में किसी वर्तनी-जांचक-तन्त्र की कमी के कारण हम से कई त्रुटियाँ अनदेखी हो जाती हैं। पर फिर भी हम यदि अंग्रेज़ी लिखते हुए स्पेलिंग, ग्रामर, पंक्चुएशन जाँचने के बाद ही “पोस्ट” पर क्लिक करते हैं, तो हिन्दी लिखते समय भी थोड़ा ध्यान तो दे ही सकते हैं। अंग्रेज़ी में तो शब्दकोश का सहारा लेना पड़ता है, पर हिन्दी में बस सही उच्चारण मालूम हो, कुछेक नियमों का ज्ञान हो और सही लिखने की इच्छा हो, तो सब सही हो जाता है।

मेरे विचार में चिट्ठों पर वर्तनी की अशुद्धियाँ निम्न वर्गों में बांटी जा सकती हैं (नीचे अशुद्धियों के जो उदाहरण हैं, पिछले एक-दो सप्ताह में प्रकाशित चिट्ठों से लिए गए हैं, और टेढ़े अक्षरों मे लिखे हैं। सही वर्तनी कोष्ठक में दी गई है।)

1. अनुस्वार, चन्द्रबिन्दु, आदि का ग़लत प्रयोग या अप्रयोग

हालाकि (हालाँकि), होन्गे (होंगे), बहुसन्ख्यक (बहुसंख्यक), मानदन्ड (मानदंड), साथियों (साथियो), कंही (कहीं), टन्डन (टण्डन/टंडन), पहुन्च (पहुँच), वंस (वन्स as in “once more”)

2. नुक़्ते का ग़लत प्रयोग

फ़िर (फिर), सफ़लता (सफलता), अग़र (अगर), ज़नाब (जनाब)

3. मात्राओं की ग़लतियाँ

पहेले (पहले), प्रणालि (प्रणाली), जेसे (जैसे), क्यु (क्यों), इमेल (ईमेल), यदी (यदि), आदी (आदि), जाईयेगा (जाइयेगा), क्योंकी (क्योंकि), उसकि (उसकी)

“कि” और “की” का अन्तर न समझने वाले बहुत हैं। कुछ लोग “में” और “मैं” की भी परवा नहीं करते।

4. ट्रान्सलिट्रेशन या टाइपराइटर की कमी के कारण पैदा हुई ग़लतियाँ

उल्लस (उल्लास), ड़ की नीचे वाली बिन्दी न मिलने पर से काम चला लेना, टेढ़ी मात्राओं का प्रयोग (से के स्थान पर सॆ, सो के स्थान पर सॊ) आदि।

5. व्याकरण और पंक्चुएशन की त्रुटियाँ, html की त्रुटियाँ

पूर्ण-विराम, अल्प विराम, आदि के आस पास खाली स्थान का ग़लत प्रयोग, कड़ी के अन्त में या पहले खाली स्थान छोड़ना, या दो शब्दों के बीच खाली स्थान नहीं छोड़ना।

6. अन्य त्रुटियाँ – क्षेत्रीय या त्रुटिपूर्ण उच्चारण के कारण

प्रास्त (परास्त), आन्नद (आनन्द), आदि।

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तो इस श्रेणी के पहले लेख में अनुस्वार और चन्द्रबिन्दु के सही प्रयोग की बात की जाए। इन के लिए पहले तत्सम और अन्य शब्दों का अन्तर समझना पड़ेगा।

तत्सम शब्द – अनुस्वार का प्रयोग

तत्सम शब्द वे होते हैं जो संस्कृत से ज्यों के त्यों हिन्दी में लिए गए हैं, जैसे माता, पिता, बालक, अस्थि, आदि।

1. पहली बात — तत्सम शब्दों में चन्द्रबिन्दु (पँकज) का प्रयोग न करें, या तो अनुस्वार (पंकज) का प्रयोग करें, या वर्ग के अन्तिम अक्षर का आधा (पङ्कज)। वर्ग के अन्तिम अक्षर का आधा — इस का सही और नियमित प्रयोग आलोक के चिट्ठे पर देखा जा सकता है।

2. देवनागरी वर्णमाला को ध्यान से देखें। हर वर्ग के अन्त में नासिक ध्वनि के लिए क्या प्रयोग करना है, वह दिया हुआ है। जैसे,

[क ख ग घ ] अङ्गद, पङ्कज, शङ्कर या अंगद, पंकज, शंकर
[च छ ज झ ] अञ्चल, सञ्जय, सञ्चय या अंचल, संजय, संचय
[ट ठ ड ढ ] कण्टक, दण्ड, कण्ठ या कंटक, दंड, कंठ
[त थ द ध ] अन्त, मन्थन, चन्दन या अंत, मंथन, चंदन
[प फ ब भ ] कम्पन, सम्भव, चम्बल या कंपन, संभव, चंबल

जैसे आप देख रहे हैं, जहाँ पर वर्ग के चार अक्षरों के पहले अन्तिम अक्षर का आधा हो, वहाँ उस के स्थान पर अनुस्वार का प्रयोग हो सकता है, पर चन्द्रबिन्दु का नहीं। यानी सँजय, चँदन, आदि ग़लत हैं। तत्सम शब्दों में य र ल व श ष स ह के साथ भी अनुस्वार का ही प्रयोग होगा, जैसे संयम, अंश, संलग्न, संरक्षण, आदि। चन्द्रबिन्दु का नहीं।

3. हाँ, कई शब्दों में वर्ग के अन्तिम अक्षर के साथ स्वयं वही अक्षर, या अन्य वर्ग का अन्तिम अक्षर होता है। ऐसे शब्दों में उसे हटा कर अनुस्वार नहीं लगाया जा सकता। जैसे जन्म, अक्षुण्ण, अन्न, आदि के स्थान पर जंम, अक्षुंण, अंन, आदि नहीं लिखा जा सकता।

4. इसी प्रकार त-थ-द-ध के इलावा अन्य वर्गों के अक्षरों के साथ न् लगाना ग़लत है, जैसे अन्क, अन्डा, कान्टा, सन्जय, आदि।

तद्भव/देशज/विदेशी शब्द – चन्द्रबिन्दु का प्रयोग

1. इन शब्दों में जहाँ ऊपर बताए शब्दों वाली ही ध्वनि हो, वहाँ पर वही नियम प्रयोग करें। जैसे बन्दर/बंदर, खञ्जर/खंजर, पिञ्जरा/पिंजरा, आदि।

2. जहाँ पर ध्वनि शुद्ध नासिक हो, वहाँ पर चन्द्रबिन्दु का प्रयोग करें, जैसे वहाँ, जहाँ, हाँ, काइयाँ, इन्साँ, साँप, आदि। पर जहाँ पर ऊपर की ओर आने वाली मात्राएँ (‌ि ी ‌े ‌ै ‌ो ‌ौ) आएँ, वहाँ पर चन्द्रबिन्दु के स्थान पर अनुस्वार का ही प्रयोग करें। जैसे भाइयों, कहीं, मैं, में, नहीं, भौं-भौं, आदि। यह नियम शायद छपाई की सुविधा के लिए बनाया गया है। इस नियम के अनुसार कहीँ, केँचुआ, सैँकड़ा, आदि शब्द ग़लत हैं।

3. कई जगह पर, विशेषकर विदेशी मूल के शब्दों में अक्षरों का ऐसा मेल होता है, जो हिन्दी में प्राकृतिक रूप में नहीं पाया जाता। जैसे इन्सान, वन्स (once), तन्ज़, आदि। इन शब्दों में अनुस्वार का प्रयोग न करें। इंसान, वंस, तंज़ सही नहीं हैं।

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जिन लेखकों के उदाहरण मैं ने प्रयोग किए हैं, वे नाराज़ न हों। शायद इतिहास में लेखकों ने कभी वर्तनी की चिन्ता न की हो :-), पर पहले छापेखाने और प्रूफ रीडर हुआ करते थे जिन का काम ही वर्तनी सुधारना था। अब हम ही लेखक हैं, हम ही छापे वाले हैं और हम ही प्रूफ रीडर हैं, इस कारण अधिक सावधानी बरतने की आवश्यकता है। यह भी ध्यान रहे कि कई लोग चिट्ठों से ही हिन्दी सीखेंगे।

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मेरा अगला लेख नुक़्ते के सही प्रयोग पर होगा। तब तक मेरा यह नियम प्रयोग करें — जहाँ पर नुक़्ते के प्रयोग के विषय में शंका हो, वहाँ नुक़्ते का प्रयोग न करें। ज़रूरत के स्थान पर जरूरत चल जाएगा, पर मजबूरी के स्थान पर मज़बूरी नहीं। कोई शक़?

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इस बीच आप की टिप्पणियों का स्वागत है। इन नियमों में कुछ ग़लत हो, कुछ और जोड़ने की आवश्यकता हो, मेरे लिखने में त्रुटियाँ हों, बताएँ।

सही हिंदी पर मेरे अन्य लेख

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हार की जीत

सुदर्शन लिखित हार की जीत मेरी सर्वाधिक प्रिय कहानियों में से है। किस कारणवश आज इस कहानी की याद आ गई, यह अगली पोस्ट में बताऊँगा। अभी प्रस्तुत है यह कहानी, सधन्यवाद भारत दर्शन*, जहाँ यह कहानी शुषा मुद्रलिपि में मिली, और रजनीश मंगला जिनके चमत्कारी टूल ने इसे यूनिकोड में परिवर्तित किया।
* अपडेट 27 दिसंबर 2009 – यह कड़ी अब काम नहीं कर रही। यह रही नई कड़ी, जहाँ अब यह कहानी अब यूनिकोड में उपलब्ध है।

हार की जीत

– सुदर्शन

माँ को अपने बेटे और किसान को अपने लहलहाते खेत देखकर जो आनंद आता है, वही आनंद बाबा भारती को अपना घोड़ा देखकर आता था। भगवद्-भजन से जो समय बचता, वह घोड़े को अर्पण हो जाता। वह घोड़ा बड़ा सुंदर था, बड़ा बलवान। उसके जोड़ का घोड़ा सारे इलाके में न था। बाबा भारती उसे ‘सुल्तान’ कह कर पुकारते, अपने हाथ से खरहरा करते, खुद दाना खिलाते और देख-देखकर प्रसन्न होते थे। उन्होंने रूपया, माल, असबाब, ज़मीन आदि अपना सब-कुछ छोड़ दिया था, यहाँ तक कि उन्हें नगर के जीवन से भी घृणा थी। अब गाँव से बाहर एक छोटे-से मन्दिर में रहते और भगवान का भजन करते थे। “मैं सुलतान के बिना नहीं रह सकूँगा”, उन्हें ऐसी भ्रान्ति सी हो गई थी। वे उसकी चाल पर लट्टू थे। कहते, “ऐसे चलता है जैसे मोर घटा को देखकर नाच रहा हो।” जब तक संध्या समय सुलतान पर चढ़कर आठ-दस मील का चक्कर न लगा लेते, उन्हें चैन न आता।

खड़गसिंह उस इलाके का प्रसिद्ध डाकू था। लोग उसका नाम सुनकर काँपते थे। होते-होते सुल्तान की कीर्ति उसके कानों तक भी पहुँची। उसका हृदय उसे देखने के लिए अधीर हो उठा। वह एक दिन दोपहर के समय बाबा भारती के पास पहुँचा और नमस्कार करके बैठ गया। बाबा भारती ने पूछा, “खडगसिंह, क्या हाल है?”

खडगसिंह ने सिर झुकाकर उत्तर दिया, “आपकी दया है।”

“कहो, इधर कैसे आ गए?”

“सुलतान की चाह खींच लाई।”

“विचित्र जानवर है। देखोगे तो प्रसन्न हो जाओगे।”

“मैंने भी बड़ी प्रशंसा सुनी है।”

“उसकी चाल तुम्हारा मन मोह लेगी!”

“कहते हैं देखने में भी बहुत सुँदर है।”

“क्या कहना! जो उसे एक बार देख लेता है, उसके हृदय पर उसकी छवि अंकित हो जाती है।”

“बहुत दिनों से अभिलाषा थी, आज उपस्थित हो सका हूँ।”

बाबा भारती और खड़गसिंह अस्तबल में पहुँचे। बाबा ने घोड़ा दिखाया घमंड से, खड़गसिंह ने देखा आश्चर्य से। उसने सैंकड़ो घोड़े देखे थे, परन्तु ऐसा बाँका घोड़ा उसकी आँखों से कभी न गुजरा था। सोचने लगा, भाग्य की बात है। ऐसा घोड़ा खड़गसिंह के पास होना चाहिए था। इस साधु को ऐसी चीज़ों से क्या लाभ? कुछ देर तक आश्चर्य से चुपचाप खड़ा रहा। इसके पश्चात् उसके हृदय में हलचल होने लगी। बालकों की-सी अधीरता से बोला, “परंतु बाबाजी, इसकी चाल न देखी तो क्या?”

दूसरे के मुख से सुनने के लिए उनका हृदय अधीर हो गया। घोड़े को खोलकर बाहर गए। घोड़ा वायु-वेग से उडने लगा। उसकी चाल को देखकर खड़गसिंह के हृदय पर साँप लोट गया। वह डाकू था और जो वस्तु उसे पसंद आ जाए उस पर वह अपना अधिकार समझता था। उसके पास बाहुबल था और आदमी भी। जाते-जाते उसने कहा, “बाबाजी, मैं यह घोड़ा आपके पास न रहने दूँगा।”

बाबा भारती डर गए। अब उन्हें रात को नींद न आती। सारी रात अस्तबल की रखवाली में कटने लगी। प्रति क्षण खड़गसिंह का भय लगा रहता, परंतु कई मास बीत गए और वह न आया। यहाँ तक कि बाबा भारती कुछ असावधान हो गए और इस भय को स्वप्न के भय की नाईं मिथ्या समझने लगे। संध्या का समय था। बाबा भारती सुल्तान की पीठ पर सवार होकर घूमने जा रहे थे। इस समय उनकी आँखों में चमक थी, मुख पर प्रसन्नता। कभी घोड़े के शरीर को देखते, कभी उसके रंग को और मन में फूले न समाते थे। सहसा एक ओर से आवाज़ आई, “ओ बाबा, इस कंगले की सुनते जाना।”

आवाज़ में करूणा थी। बाबा ने घोड़े को रोक लिया। देखा, एक अपाहिज वृक्ष की छाया में पड़ा कराह रहा है। बोले, “क्यों तुम्हें क्या कष्ट है?”

अपाहिज ने हाथ जोड़कर कहा, “बाबा, मैं दुखियारा हूँ। मुझ पर दया करो। रामावाला यहाँ से तीन मील है, मुझे वहाँ जाना है। घोड़े पर चढ़ा लो, परमात्मा भला करेगा।”

“वहाँ तुम्हारा कौन है?”

“दुगार्दत्त वैद्य का नाम आपने सुना होगा। मैं उनका सौतेला भाई हूँ।”

बाबा भारती ने घोड़े से उतरकर अपाहिज को घोड़े पर सवार किया और स्वयं उसकी लगाम पकड़कर धीरे-धीरे चलने लगे। सहसा उन्हें एक झटका-सा लगा और लगाम हाथ से छूट गई। उनके आश्चर्य का ठिकाना न रहा, जब उन्होंने देखा कि अपाहिज घोड़े की पीठ पर तनकर बैठा है और घोड़े को दौड़ाए लिए जा रहा है। उनके मुख से भय, विस्मय और निराशा से मिली हुई चीख निकल गई। वह अपाहिज डाकू खड़गसिंह था।बाबा भारती कुछ देर तक चुप रहे और कुछ समय पश्चात् कुछ निश्चय करके पूरे बल से चिल्लाकर बोले, “ज़रा ठहर जाओ।”

खड़गसिंह ने यह आवाज़ सुनकर घोड़ा रोक लिया और उसकी गरदन पर प्यार से हाथ फेरते हुए कहा, “बाबाजी, यह घोड़ा अब न दूँगा।”

“परंतु एक बात सुनते जाओ।” खड़गसिंह ठहर गया।

बाबा भारती ने निकट जाकर उसकी ओर ऐसी आँखों से देखा जैसे बकरा कसाई की ओर देखता है और कहा, “यह घोड़ा तुम्हारा हो चुका है। मैं तुमसे इसे वापस करने के लिए न कहूँगा। परंतु खड़गसिंह, केवल एक प्रार्थना करता हूँ। इसे अस्वीकार न करना, नहीं तो मेरा दिल टूट जाएगा।”

“बाबाजी, आज्ञा कीजिए। मैं आपका दास हूँ, केवल घोड़ा न दूँगा।”

“अब घोड़े का नाम न लो। मैं तुमसे इस विषय में कुछ न कहूँगा। मेरी प्रार्थना केवल यह है कि इस घटना को किसी के सामने प्रकट न करना।”

खड़गसिंह का मुँह आश्चर्य से खुला रह गया। उसका विचार था कि उसे घोड़े को लेकर यहाँ से भागना पड़ेगा, परंतु बाबा भारती ने स्वयं उसे कहा कि इस घटना को किसी के सामने प्रकट न करना। इससे क्या प्रयोजन सिद्ध हो सकता है? खड़गसिंह ने बहुत सोचा, बहुत सिर मारा, परंतु कुछ समझ न सका। हारकर उसने अपनी आँखें बाबा भारती के मुख पर गड़ा दीं और पूछा, “बाबाजी इसमें आपको क्या डर है?”

सुनकर बाबा भारती ने उत्तर दिया, “लोगों को यदि इस घटना का पता चला तो वे दीन-दुखियों पर विश्वास न करेंगे।” यह कहते-कहते उन्होंने सुल्तान की ओर से इस तरह मुँह मोड़ लिया जैसे उनका उससे कभी कोई संबंध ही नहीं रहा हो।

बाबा भारती चले गए। परंतु उनके शब्द खड़गसिंह के कानों में उसी प्रकार गूँज रहे थे। सोचता था, कैसे ऊँचे विचार हैं, कैसा पवित्र भाव है! उन्हें इस घोड़े से प्रेम था, इसे देखकर उनका मुख फूल की नाईं खिल जाता था। कहते थे, “इसके बिना मैं रह न सकूँगा।” इसकी रखवाली में वे कई रात सोए नहीं। भजन-भक्ति न कर रखवाली करते रहे। परंतु आज उनके मुख पर दुख की रेखा तक दिखाई न पड़ती थी। उन्हें केवल यह ख्याल था कि कहीं लोग दीन-दुखियों पर विश्वास करना न छोड़ दे। ऐसा मनुष्य, मनुष्य नहीं देवता है।

रात्रि के अंधकार में खड़गसिंह बाबा भारती के मंदिर पहुँचा। चारों ओर सन्नाटा था। आकाश में तारे टिमटिमा रहे थे। थोड़ी दूर पर गाँवों के कुत्ते भौंक रहे थे। मंदिर के अंदर कोई शब्द सुनाई न देता था। खड़गसिंह सुल्तान की बाग पकड़े हुए था। वह धीरे-धीरे अस्तबल के फाटक पर पहुँचा। फाटक खुला पड़ा था। किसी समय वहाँ बाबा भारती स्वयं लाठी लेकर पहरा देते थे, परंतु आज उन्हें किसी चोरी, किसी डाके का भय न था। खड़गसिंह ने आगे बढ़कर सुलतान को उसके स्थान पर बाँध दिया और बाहर निकलकर सावधानी से फाटक बंद कर दिया। इस समय उसकी आँखों में नेकी के आँसू थे। रात्रि का तीसरा पहर बीत चुका था। चौथा पहर आरंभ होते ही बाबा भारती ने अपनी कुटिया से बाहर निकल ठंडे जल से स्नान किया। उसके पश्चात्, इस प्रकार जैसे कोई स्वप्न में चल रहा हो, उनके पाँव अस्तबल की ओर बढ़े। परंतु फाटक पर पहुँचकर उनको अपनी भूल प्रतीत हुई। साथ ही घोर निराशा ने पाँव को मन-मन भर का भारी बना दिया। वे वहीं रूक गए। घोड़े ने अपने स्वामी के पाँवों की चाप को पहचान लिया और ज़ोर से हिनहिनाया। अब बाबा भारती आश्चर्य और प्रसन्नता से दौड़ते हुए अंदर घुसे और अपने प्यारे घोड़े के गले से लिपटकर इस प्रकार रोने लगे मानो कोई पिता बहुत दिन से बिछड़े हुए पुत्र से मिल रहा हो। बार-बार उसकी पीठपर हाथ फेरते, बार-बार उसके मुँह पर थपकियाँ देते। फिर वे संतोष से बोले, “अब कोई दीन-दुखियों से मुँह न मोड़ेगा।”

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मुंशी प्रेमचन्द की कहानियाँ

कड़ी : प्रेमचन्द की कहानियाँ

सी-डॅक की साइट पर अनेकों ई-पुस्तकें उपलब्ध हैं। इन में से मेरी मनपसन्द हैं मुंशी प्रेमचन्द की कहानियों वाली ई-पुस्तकें। यह ई-पुस्तकें वर्ड फाइलों के रूप में उपलब्ध हैं और हर फाइल में ३ से ६ कहानियाँ हैं। सीडॅक ने यह बहुत उत्कृष्ट काम किया है। पर इन्हें पढ़ने और खोजने में मुझे कुछ दिक्कत होती रही है — एक तो वर्ड में खोलने पर अक्षरों के बीच में बहुत ज़्यादा जगह दिखती है (हाँ वर्डपैड में बढ़िया पढ़ी जाती हैं)। दूसरे यह खोजना पड़ता है कि कौन सी कहानी किस फाइल में है और कहाँ पर है। इस समस्या का समाधान करने के लिए मैं काफी समय से सोच रहा था कि इन को ऍचटीऍमऍल में रूपान्तरित करूँ, पर शुरू करने पर भी यह काम अधूरा छूटा हुआ था। अब ब्लॉगस्पॉट ने काम और आसान कर दिया। पिछले हफ़्ते से लग कर मैं ने इन सौ से ऊपर कहानियों को ब्लॉगस्पॉट पर चढ़ा दिया, ताकि सब लोग हिन्दी के महान कहानीकार मुंशी प्रेमचन्द की कहानियों का आनन्द ले सकें। अभी कुछ काम बाकी है — कुछ कहानियाँ अपलोड करनी बाकी हैं, और कई जगह पर वर्तनी की त्रुटियाँ हैं, उन को ठीक करना है। उम्मीद है इस हफ्ते में यह काम भी पूरा हो जाएगा। तो आनन्द लीजिए प्रेमचन्द की कहानियों का।

अपनी राय इस प्रविष्टि पर टिप्पणी के रूप में दें।

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अगर तुम आ जाते एक बार

अगर तुम आ जाते एक बार

काँटे फिर न पीड़ा देते
आँसू भी मोती बन जाते
तेरी बाहें जो बन जाती मेरे गले का हार
अगर तुम आ जाते एक बार

जीवन का सच अतिसय सुन्दर
पा जाते हम दोनों मिलकर
उजड़े दिलों में छा जाती मदमाती नई बहार
अगर तुम आ जाते एक बार

आँखों के सतरंगी सपने
सच हो जाते जो तुम होते
राहें फिर न तन्हा रहतीं
तय हो जातीं हंसते गाते
इन्द्रधनुष के रंगों से फिर हो जाता शृंगार
अगर तुम आ जाते एक बार

आभास अधूरेपन का मिटता
एकाकीपन फिर क्यों डसता
तेरी आँखों में मिल जाता मन को मन का उपहार
अगर तुम आ जाते एक बार

– कैलाश चन्द्र गुप्ता (चन्द्रगुप्त)

कैलाश को चेतावनी दी गई थी, कि यदि नहीं लिखोगे, तो हम तुम्हारा लिखा छापना शुरू कर देंगे। यह पहली बानगी है।