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भारत विविध

377 पर 7 तर्क

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बस यही अपराध मैं हर बार करता हूँ
आदमी हूँ आदमी से प्यार करता हूँ।

1861 में अंग्रेज़ों की बनाई IPC धारा 377 के अनुसार आदमी-आदमी के प्यार को अपराध करार दिया गया था। आज डेढ़ सौ साल बाद हम इस धारा को हटाने के प्रयासों में असफल हो गए हैं। मेरे हर दोस्त का इस बारे में कुछ कहना है, और बहुत कम लोगों को सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला ग़लत लगा है। मुझसे पहले की पीढ़ी के लोगों के ऐसे विचार हों, ऐसा स्वाभाविक है, पर मेरी पीढ़ी और कुछ मुझ से अगली पीढ़ी के कुछ लोगों के भी इस मामले पर विचार कुछ पुराने हैं। स्वयं को इस शोर में अकेला तो पा रहा हूँ, पर एक खुशी है कि यह चर्चा अब बंद नहीं होने जा रही, और जितनी चर्चा होगी, उतनी लोगों को सूचना मिलेगी और उतनी लोगों की आँखें खुलेंगी। ऐसी मेरी उम्मीद है। मैं स्वयं भी पहले समलैंगिकता के विषय पर पूरी तरह निष्पक्ष नहीं था, इस कारण मैं किसी को पूरी तरह दोषी भी नहीं ठहराता। पर जैसे जैसे और जानकारी हासिल की, मेरे विचार बदले। आशा करता हूँ कि और लोग भी आँखें खुली रखेंगे, जानकारी हासिल करेंगे, और फिर निर्णय लेंगे।

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कश्मीर भारत

पिद्दा सा कश्मीर, और आज़ादी?

कुछ दिन पहले अपने अंग्रेज़ी ब्लॉग पर मैं ने कश्मीर पर एक लेख लिखा जो कई दिनों से मन में उबल रहा था, पर कश्मीर में हो रही हाल की घटनाओं के कारण उफन पड़ा। इस लेख को काफी अच्छी प्रतिक्रिया मिली — कुछ टिप्पणियाँ अच्छी, कुछ बुरी। फेसबुक और ट्विटर पर सैंकड़ों लोगों ने इसे शेयर किया। लेख का सार यह था कि कश्मीर जितना बड़ा दिखता है, उतना है नहीं। कश्मीरी मुसलमान आज़ादी ले भी लेंगे तो उनका यह “देश” नहाएगा क्या और निचोड़ेगा क्या। कुछ पाठकों ने सुझाव दिया कि इसे हिन्दी में छापूँ। इसलिए अनुवाद कर सामयिकी में भेज दिया। नीचे मूल अंग्रेज़ी लेख और सामयिकी में छपे हिन्दी अनुवाद की कड़ियाँ हैं। कृपया पढ़ें और अपनी प्रतिक्रिया अवश्य दें। अंग्रेज़ी लेख पर एक लंबे चौड़े वार्तालाप के ज़रिए कुछ और बिन्दु सामने आए हैं।

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भारत

सुर बने हमारा

बासठवें स्वतन्त्रता दिवस पर सभी भारतवासियों को शुभकामनाएँ।

इस अवसर पर एक बार फिर पढ़िए आज से चार वर्ष पहले लिखी यह पोस्ट जिस में मिले सुर मेरा तुम्हारा के हर भाषा के बोल संकलित किए गए थे। आज एक और छोटी सी सूचना, समय-लाइव के सौजन्य से

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उर्दू कश्मीर भारत

कश्मीर की जंग पॉलीथीन के संग

श्रीनगर, कश्मीर के अंग्रेज़ी अखबार ग्रेटर कश्मीर का ई-पेपर संस्करण देख रहा था तो मुख्यपृष्ठ पर यह रोचक उर्दू विज्ञापन दिखा। विज्ञापन को पढ़िए, स्वयं समझ जाएँगे कि क्या रोचक है इस में। यदि उर्दू नहीं आती तो नीचे हिन्दी अनुवाद दिया हुआ है।

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भारत

वरुण गांधी वीडियो – असली या नकली?

वरुण गांधी प्रकरण टीवी पर तो छाया ही हुआ है, देसी इंटरनेट पर भी हाल में इस प्रकरण पर जितना कहा जा रहा है, उस के और उदाहरण कम हैं। चुनाव का समय है भई, यह तो होगा ही। पर आश्चर्य की बात यह है कि वरुण गांधी की वीडियो की सच्चाई पर कोई उंगली नहीं उठा रहा, सिवाय स्वयं वरुण गांधी के।

इंटरनेट पर जो लोग इस विषय पर चिट्ठे लिख रहे हैं, वीडियो डाल रहे हैं, चहचहा (ट्विट्टर पर) रहे हैं, और टिप्पणियाँ कर रहे हैं, उन को दो वर्गों में बाँटा जा सकता है — वे जो उन के “वक्तव्यों” के कारण वरुण से नफ़रत करते हैं, और वे जो उन का समर्थन करते हैं। यदि आप भाजपा समर्थक हैं तो आप पहले वर्ग में हैं, अन्यथा दूसरे वर्ग में। इंटरनेट पर पहले वर्ग का ही बोलबाला लगता है।

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भारत मनोरंजन विदेश

स्लम-डॉग मिलियनेयर – एक समीक्षा

मुंबई के स्लम-जीवन पर केन्द्रित स्लमडॉग मिलियनेयर देखकर हॉल से निकलने के बाद अनुभूतियाँ मिश्रित थीं। फिल्म में मुंबई के झोपटपट्टी जीवन की जो छवि दिखाई गई है, उसे देख कर काफी बेचैनी लगी। अमरीकी सिनेदर्शकों से भरे हॉल में ऐसा लगा जैसे हमें पश्चिम वालों के सामने नंगा किया जा रहा है। फिल्म के पहले हिस्से में ऐसा लगा यह क्या देखने आ गए — फिल्म छोड़ कर जाने का भी विचार आया। साथ में यह भी सोचा कि जो दिखाया जा रहा है, अतिशयोक्ति के साथ ही सही, है तो सच्चाई ही। ऐसा लगा कि सलाम बॉम्बे फिर दिखाई जा रही है। अन्तर यह था कि सलाम बॉम्बे में गन्दगी दिखाने वाली हमारी अपनी मीरा नायर थीं, और यह फिल्म अंग्रेज़ निर्देशक डैनी बॉयल ने बनाई है।

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भारत विविध

कौन उर्दू बोलने वालों को दहशतगर्द कहते हैं

मोहल्ले में आजकल रोज़ की तानेबाज़ी चल रहा है। लगता है मोहल्ले वालों को सकारात्मक कुछ नहीं दिखता। संगीत में विभिन्न धर्मों के लोग हैं, यह तो सदियों पुरानी बात है, इस के लिए सुदर्शन को ताना। उर्दू बोलने वालों को कोई दहशतगर्द भले न कहे, पर ताने दो और वाहवाही लूटो। अरे भाई, इस सब से ऊपर उठो, हाथ मिलाओ और चलो वतन को आगे बढ़ाते हैं।

मैं स्वयं को राइट-ऑफ-सेंटर विचारधारा वाला समझता हूँ, और अपनी विचारधारा वाले कई लोगों को जानता हूँ। फिर भी मैं ने किसी को यह नहीं कहते सुना कि हर उर्दू बोलने वाला दहशतगर्द है, या यदि इस ताने के भीतरी अर्थ को समझा जाए तो यह कि हर मुसलमान दहशतगर्द है। पर हाँ, यदि दहशतगर्द को भी दहशतगर्द कहना गुनाह है तो फिर मुँह पर टेप लगा कर बैठ जाते हैं।

यदि कुछ बेहूदा लोग यह कहते हैं कि हर मुसलमान दहशतगर्द है, तो उतने ही बेहूदा लोग यह भी कहते हैं कि हर बुतपरस्त काफिर है, या फिर पाकिस्तान ज़िन्दाबाद का नारा लगाते हैं। ऐसे बेहूदा लोगों की बातों को ले कर रोना धोना और तानेबाज़ी कहाँ तक सही है? सकारात्मक पहलू पर ज़ोर क्यों नहीं दिया जाता? फिर यदि कुछ लोग इस तरह की बदकलामी करते भी हैं, तो क्या उस का कुछ इलज़ाम उन के सर नहीं जाता जो असल में दहशतगर्द हैं और पूरी कौम को बदनाम कर रहे हैं। यह दहशतगर्दी तो पूरी दुनिया में फैली है।

इस मुल्क में हर धर्म के लोगों का हर क्षेत्र में प्रतिनिधित्व है। पिछले चुनावों में बहुमत से एक ईसाई धर्म की स्त्री को देश का नेतृत्व सौंपा गया। अन्त में एक सिख धर्म के व्यक्ति ने उन का स्थान लिया। उन को शपथ दिलाने वाले राष्ट्रपति इस्लाम से ताल्लुक रखते हैं, जिन्हें एक हिन्दूवादी कहे जाने वाले दल ने उस पद के लिए नामांकित किया था। यह सब किस देश में हो सकता है? इस सब पर गर्व करने के स्थान पर आप बेहूदा लोगों की बातों को ले कर क्यों मनमुटाव पैदा करते हैं?

हम तो उस मुल्क को जानते हैं, जहाँ हर बन्दा उर्दू बोलता है। जीवन को जिन्दगी कहता है, और स्थान को जगह। हम तो उस मुल्क को जानते हैं जहाँ गुलाम अली और महदी हसन को सिर-आँखों पर बिठाया जाता है, शाहरुख खान और इरफान पठान तो हमारे लख़्ते जिगर हैं ही। हम तो उस मुल्क को जानते हैं जहाँ नौजवानों के लब पर यह गाना है

है यार मेरा खुशबू की तरह
है जिस की ज़ुबाँ उर्दू की तरह

इस के बरअक्स उर्दू बोलने वालों या मौसीकीकारों का हाल अलगाव के बूते पर बने मुल्कों में क्या होता है, उस तफ़सील में मैं नहीं जाना चाहता। उन से हम अपनी तुलना क्यों करें? पर यह भी नहीं चाहता कि यहाँ भी अलगाव की आग लगाई जाए।

मेरा सकारात्मक रवैया इस के बावजूद है कि जीवन में कुछ बहुत ही कड़ुवे अनुभव भी हुए हैं। कोशिश यही की है कि अच्छे को याद रखो बुरे को दरकिनार करने की कोशिश करो। मैं अपने कुछ अनुभव बाँटना चाहता हूँ।

– चौथी या पाँचवीं जमात में पढ़ता था, उत्तर कश्मीर के एक गाँव के सरकारी स्कूल में। मैं अकेला हिन्दू बच्चा था कक्षा में। रोज़ तख्ती (जिसे हम मश्क कहते थे) लिख कर ले जानी होती थी। कुछ भी लिख कर ले जाओ, पर लिखना ज़रूरी था – उर्दू की लिखाई सुधारने के लिए। मेरे सहपाठी कई बार यह लिख कर लाते थे – सारे जहाँ से अच्छा पाकिस्तान हमारा। अच्छा नहीं लगता था, पर कुछ कहने की स्थिति में नहीं थे। टीचर ने कभी कुछ नहीं कहा।

– मिडल स्कूल में यह आम बात थी कि टीचर या प्रिन्सिपल कक्षा में या असेंबली में हिन्दू बच्चों को खड़ा होने को कहे, ताकि उन्हें आइडेंटिफाइ किया जा सके।

– हाई स्कूल में (या उस से पहले) सुबह की प्रेयर में कभी जन-गण-मन नहीं गाया, वन्दे मातरम तो सुना ही नहीं था। हम कश्मीरी भाषा में दो प्रार्थनाएँ गाते थे; एक सेक्यूलर प्रेयर – साहिबो सथ छम मे चानी, और एक मुस्लिम प्रेयर नबी (सल्ल-लाहो-अलहे-वस्सलम) की शान में – या खुदा सारिय खुदाई आसिहे पर्दन अन्दर, आसिहे नय ज़ान ज़ुल्मातन रसूले मोहतरम। क्या एक कश्मीरी हिन्दू वही हल्ला कर सकता था जो भारत में वन्दे मातरम् के खिलाफ होता है? मैं यह नहीं मानता कि वन्दे मातरम् गाने से देश का कुछ भला होगा, पर गाने से गाने वालों का कुछ बुरा भी नहीं होगा, यह मानता हूँ। बेकार का हल्ला है।

– जब भुट्टो को दी गई फाँसी के विरोध में हमारा इंजीनियरिंग कॉलेज बन्द हुआ तो एहतिजाजी जुलूस में हमें भी शामिल होना पड़ा।

फिर वहाँ एक तूफान आया जिस के बाद हमें वहाँ सब छोड़ कर आना पड़ा। एक हिन्दू अल्पसंख्यक के रूप में जीवन कैसा था, इस की ज़्यादा तफ़सील में भी नहीं जाऊँगा। फिर भी यह लगता था कि कश्मीर में मुसलमानों की अक्सरियत है, शायद ये सही कहते हैं कश्मीर घाटी पाकिस्तान का ही भाग होना चाहिए। उस बात पर अपने विचार किसी अन्य पोस्ट में लिखूँगा।

दोस्त मेरे हमेशा मुसलमान रहे, और अब भी हैं। धर्म के अतिरिक्त हर चीज़ पर बहस होती थी – मैं ठहरा नास्तिक और उन में से किसी में खुदा को नकारने की हिम्मत नहीं थी। सातवीं से नौवीं तक मेरठ में पढ़ने का मौका मिला। वहाँ मेरा दोस्त था सलीम। वह हैरान होता था जब मैं उस को कश्मीर की (भारत विरोधी) बातें बताता था, और उस हिन्दुस्तानी मुसलमान की हैरानगी मुझे खुशी देती थी।

फिर कॉलेज के अन्तिम वर्ष में ऑल-इंडिया टूर के तहत हैदराबाद जाना हुआ। मैं और दो और कश्मीरी हिन्दू दोस्त चारमीनार देखने गए तो एक रिक्शे वाले ने पेशकश की – चलिए साहब शहर घुमा लाता हूँ। भाड़ा तय हुआ और हम चल पड़े। उस से नाम पूछा तो उस ने कुछ मुस्लिम नाम बताया, और हम से भी नाम पूछे। मेरे दोस्त को जाने क्या मज़ाक सूझा, उस ने भी तीनों के नाम मुस्लिम बताए। फिर वह खुल कर हमें वहाँ की बातें बताने लगा, यह देखिए यह सारा हमारा इलाका है यूँ समझिए पाकिस्तान है। हिन्दुओं के खिलाफ बातें बताने लगा। हम चुपचाप सुनते रहे – अपने घर से इतनी दूर भी पाकिस्तान हमारा पीछा नहीं छोड़ रहा था। वह हमें एक ज़ियारत में भी ले कर गया। हम ने जैसे तैसे पीछा छुड़ाया कि कहीं हमारा झूठ न पकड़ा जाए।

यह सब अनुभव मेरे भारत के भविष्य के बारे में विश्वास को नहीं डिगाते। बल्कि मेरा विश्वास मज़बूत होता है कि इतनी नकारात्मकता के बावजूद सकारात्मकता इतनी है कि हमारा देश आगे चल रहा है – बेशक दौड़ न रहा हो, और इस में हर धर्म के लोगों का हाथ है।

मैं यह नहीं मानता कि अधिकांश मुसलमान ऐसे हैं। न यह मानता हूँ कि सभी हिन्दू अच्छा ही सोचते हैं। पर भाई इन्हीं बातों का ज़िक्र छेड़ोगे तो दोनो तरफ इन्हीं बातों का ज़िक्र होगा। यह तो कभी खत्म न होने वाली बहस है, जिस का कोई सही नतीजा नहीं निकलेगा। पर यह भी बात है, कि जो चिट्ठे यही एजेंडा ले कर शुरू हुए हैं, वे फिर क्या लिखेंगे। यह जो सांप्रदायिकता वाले चिट्ठा-पोस्टों का तांता लगा हुआ है, क्या इस का वास्तविक मकसद हंगामा खड़ा करना ही नहीं है? टिप्पणियाँ इस पोस्ट पर भी पढ़ी जा चुकीं थीं, पर एक इफेक्ट के लिए टिप्पणियों की अलग पोस्ट बनाई गई, जिस का टाइटल था – हंगामा खड़ा करना मक़सद नहीं। ठीक है, आप अपना लिखने के लिए मुक्त हैं, और हम अपना। अगर चिट्ठा जगत में अब इसी का चर्चा होना है तो इसी का सही।

मुनव्वर राना अपनी ग़ज़ल में कहते हैं

मदीने तक में हम ने मुल्क की खातिर दुआ मांगी
किसी से पूछ ले इस को वतन का दर्द कहते हैं।

वतन का दर्द वतन की औलाद को नहीं होगा तो किसे होगा। हाँ मदीने वाला या कैलाश पर्बत वाला कितनी सुनता है, यह मालूम नहीं। खासकर जिस मुल्क में कुफ्र का बोलबाला हो, उस की अल्लाह क्या सुनेगा।

PS: राना साहब की हसीन ग़ज़ल के जवाब में मैं ने उस की टिप्पणी में यह ग़ज़ल की पूँछ जोड़ी थी, जिसे राजीव जी के प्रोत्साहन (नीचे पहली टिप्पणी देखें) पर यहाँ दोहरा रहा हूँ (बहर और क़ाफ़िए की गड़बड़ के लिए माज़रत-ख़्वाह हूँ)।

करा दो तआर्रुफ़ हम से भी ज़रा उन का
जो उर्दू बोलने वालों को दहशतगर्द कहते हैं।

कब ख़त्म होगा सिलसिला यह रोते धोते रहने का
जो माज़ी को भूल बढ़े आगे उसी को मर्द कहते हैं।

तमिल बोले, तेलुगू, बंगाली, उर्दू या कश्मीरी
यहाँ सब लोग हिन्दी हैं, यही सब फ़र्द कहते हैं।

उर्दू वाला नहीं मोहाजिर वो है हिस्सा वतन का
नहीं यकीं तो देख क्या वतन के सद्र कहते हैं।

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भारत

किश्ती में छेद

बीबीसी की रिपोर्ट के अनुसार :

भारत के प्रधानमंत्री ने कहा है कि कश्मीर में सीमा को ‘अर्थहीन और अप्रासंगिक’ बनाने और भारत प्रशासित कश्मीर को अधिक स्वायत्ता देने से पाकिस्तान के साथ चल रहे विवाद को सुलझाने में सहायता मिल सकती है।

मेरी प्रतिक्रिया, जो बीबीसी के पन्ने पर भी छपी है, यूँ है :

कश्मीर की सीमा को अर्थहीन बनाने का सुझाव अर्थहीन है। यह ऐसा कहने के बराबर है कि “हम अपनी कश्ती डुबो नहीं रहे हैं, केवल इस में छोटा सा छेद कर रहे हैं”। या तो दोनों देशों के बीच सारी सीमाएँ समाप्‍त करने की बात हो, जिस से पहले सारे वैमनस्य समाप्‍त होने चाहिए अन्यथा पाकिस्तान में चल रहे आतंकी कारखानों के उत्पाद को भारत को निर्यात करने का एक आसान रास्ता खुल जाएगा। फिर उसे रोकने के लिए कश्मीर और शेष भारत के बीच सीमा बांधनी पड़ेगी। यह भी सोचने की बात है कि कश्मीर के हिन्दू निवासियों के लिए कश्मीर का रास्ता बन्द है पर पाकिस्तान के निवासियों के लिए आप रास्ता खोलना चाहते हैं।

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भारत

बिना मताधिकार के मोहरे

[१९९० के आरंभ तक उत्तर कश्मीर के कलूसा गाँव के जिस घर में मेरा परिवार दशकों से रहा, उस में तब से या तो हिज़्बुल-मुजाहिदीन का डेरा रहा है या राष्ट्रीय राइफ्ल्ज़ का, जिस का जिस समय वर्चस्व रहा। वह क्षेत्र “शान्त” क्षेत्रों में से है, क्योंकि वहाँ अभी भी गिनती के दो-चार हिन्दू बचे हुए हैं। ३० किलोमीटर दूर सोपोर में जहाँ मेरे कई रिश्तेदार रहते थे, अब हिन्दू मोहल्ला खंडहर बन चुका है, जहाँ कोई नहीं रहता और घर जल कर शब्दशः मिट्टी में मिले हुए हैं। अगली पीढ़ियों के लिए कश्मीर का कुछ अर्थ हो या न हो, हमारी पीढ़ी तो इसे अपने दिलो-दिमाग़ से नहीं निकाल सकती। इसी पीढ़ी के हैं रेडिफ स्तंभकार ललित कौल। उन के पिछले सप्ताह के लेख का मैं ने हिन्दी अनुवाद किया है जो नीचे प्रस्तुत है।]

कश्मीरी हिन्दू समुदाय ने १९-२० जनवरी को कश्मीरी हिन्दू हालोकास्ट दिवस के रूप में मनाया। १५ वर्ष पहले इसी दिन इस्लामी आतंकियों ने कश्मीर घाटी से कश्मीरी हिन्दुओं के सामूहिक निष्कासन का अभियन्त्रण किया।

१९ जनवरी १९९० की रात कश्मीरी हिन्दुओं के इतिहास में सबसे काली रात थी। उस रात, घाटी की सभी मस्जिदों के लाउडस्पीकर चीख चीख कर इस अल्पसंख्यक समुदाय के विरुद्ध ज़हरीली धमकियाँ उगल रहे थे। रात भर, इस शान्तिप्रिय समुदाय को धमकी दी जा रही थी कि या तो धर्म परिवर्तन कर लें या घाटी को छोड़ दें। या फिर, मरने के लिए तैयार हो जाएँ।

१९४७ में, जब पाकिस्तानी कबाइली आक्रामक, पाकिस्तानी सेना की मदद से श्रीनगर की ओर बढ़ रहे थे तब कश्मीरी हिन्दुओं को ऐसी ही स्थिति का सामना था। उन दिनों हर परिवार की स्त्रियों को विष की पुड़ियाँ बाँटी गई थीं ताकि आक्रामकों के घर में घुसने की स्थिति में वे उसे खा लें। नार्कीय बल के विरुद्ध यह ज़हर की पुड़िया ही उन का इकलौता बचाव थी। अस्मिता हरण से पहले मौत।

जनवरी की उस रात भी कुछ ऐसी ही स्थिति थी। स्त्रियों को घरों के अन्धेरे कोनों में छिपाया जा रहा था, ताकि भाड़े के आतंकी उन्हें ढ़ूँढ़ न पाएँ। जैसे जैसे रात गहरा रही थी, भय के बादल घने होते जा रहे थे। अन्ततः सुबह होने पर कश्मीरी हिन्दू और न सह पाए और जान बचाने के लिए सब कुछ छोड़ छाड़ कर भागे — वे मन्दिर जो उन्हें सुकून और शान्ति देते थे, वे विद्यालय जहाँ से उन्होंने ज्ञान और बुद्धिमत्ता पाई थी, वे घर और चौखटें जिनसे उनकी जीवन भर की यादें जुड़ी हुई थीं, वे पुल जिन पर उन्होंने वितस्ता (जेहलम) नदी को सराहते हुए अपनी शामें गुज़ारी थीं, चिनार के वे शानदार वृक्ष जिनकी छाया भर से उनके घाव भर जाते थे, कश्मीरी में ‘डब’ कहलाई जाने वाली वह बाल्कनियाँ जिन पर वे अपने घरों की टीन की छतों पर गिरती बारिश की छन छन सुनते थे। हर चीज़ जिनसे उन्हें प्यार और लगाव था।

पन्द्रह वर्ष हुए हैं तब से, और उनके लिए बहुत कुछ नहीं बदला है। तब कोई उनकी मदद के लिए नहीं आया। आज भी किसी को उनकी परवा नहीं है। तब कश्मीरी हिन्दू कश्मीर की शतरंज में मोहरे थे। आज भी वे मोहरे ही हैं।

आजकल जम्मू कश्मीर राज्य में २७ वर्ष बाद स्थानीय चुनाव हो रहे हैं। ज़रा अन्दाज़ा लगाएँगे? घाटी के ४००,००० कश्मीरी हिन्दुओं में से एक का नाम भी मतदाता सूची में नहीं है। एक ही झटके में सभी ४००,००० कश्मीरी हिन्दुओं का मतदान करने का मूल अधिकार उनसे छीन लिया गया है। क्यों? क्योंकि वे अब घाटी में नहीं रहते। और क्यों नहीं रहते घाटी में वे? फिर समझाना पड़ेगा क्या?

इधर इन कश्मीरी हिन्दुओं के मूलभूत अधिकारों का हनन हो रहा है, उधर सभी राजनीतिक दल अपने अपने स्वार्थ के लिए स्थिति का भरपूर लाभ उठा रहे हैं। जम्मू-कश्मीर के मुख्य मन्त्री मुफ्ती मुहम्मद सईद और उनके पीडेपा वाले चमचे कह रहे हैं कि चूँकि ये कश्मीरी हिन्दू घाटी में नहीं रहते, उन्हें मतदाता सूची में नहीं रखा जा सकता। उन की बहस का मुद्दा यह है कि इन खाना-बदोश लोगों को वहाँ की मतदाता सूची में होना चाहिए जहाँ वे रहते हैं, जैसे जम्मू, उधमपुर, आदि।

मुफ्ती साहब के उप मुख्य मन्त्री मंगत राम शर्मा जो उन की साझेदार पार्टी काँग्रेस-इ से हैं (और जम्मू से हैं), राज्य के राज्यपाल से अधिसूचना की माँग कर रहे हैं कि इन कश्मीरी हिन्दुओं को घाटी की मतदाता सूचियों में वापस ड़ाल दिया जाए। (जम्मू के) भाजपा वाले भी इन शरणार्थियों को घाटी की मतदाता सूचियों में ही रखना चाहते हैं। यानी कुछ लोग उन्हें कश्मीर से निकालने के चक्कर में हैं और कुछ लोग जम्मू से। कुछ लोग अपने यहाँ की मतदाता सूचियों से उन्हें बाहर देखना चाहते हैं तो कुछ लोग दूसरी जगह की मतदाता सूचियों में ड़ालना चाहते हैं।

राजनीतिक दलों की इस उठापटक के चलते प्रभावित लोगों की कोई नहीं सुन रहा। कश्मीरी हिन्दू क्या चाहते हैं इस की किसी को परवाह नहीं।

भारत जैसे जनतान्त्रिक देश में कोई मतदान का संवैधानिक अधिकार कितनी आसानी से खो सकता है, यह देख कर घिन्न होती है। एम्नेस्टी इंटरनेश्नल और ह्यूमन राइट्स वाच अब कहाँ हैं? शायद मैनहटन न्यूयार्क के किसी पैंटहाउस में स्काच की चुस्कियाँ लेने में व्यस्त होंगे।

अपने यहाँ के राजनीतिज्ञ किस तरह गिरगिट की तरह रंग बदलते हैं, यह देख कर ग्लानि होती है। जब सत्ता में होते हैं तब अपनी ही ऐंठ में होते हैं और जिन लोगों को हानि पहुंची है उन की वाजिब माँगों को भी नकार देते हैं। और जब हार कर विपक्ष में बैठते हैं, फिर मसीहा बने फिरते हैं।

अभी कुछ ही दिन पहले भूतपूर्व उप प्रधान मन्त्री लाल कृष्ण आड़वानी कश्मीरी हिन्दू हालोकास्ट दिवस के उपलक्ष्य में कश्मीरी हिन्दुओं से मिले। प्रतिनिधिमण्डल को सम्बोधित करते हुए बोले, “मैं स्वीकार करता हूँ कि राजग सरकार कश्मीरी हिन्दुओं की समस्या को हल करने के लिए बहुत कुछ नहीं कर पाई। गठबन्धन की कई अड़चनें थीं। फिर भी भाजपा सरकार में रहते हुए इस समस्या के बारे में अब के मुकाबले अधिक हासिल कर सकती थी।

“इस के बावजूद”, वे बोले “मैं समुदाय को विश्वास दिलाना चाहता हूँ कि विपक्ष, विशेषकर भाजपा, इस मुद्दे को संसद के भीतर और बाहर उठाएगा। मैं यूपीए सरकार पर इस मुद्दे की महत्ता को व्यक्त करता रहूँगा और इस समुदाय को न्याय दिलाने में कोई कसर नहीं छोड़ूँगा। अपनी ही मातृभूमि में इस समुदाय का सफाया कर देना दुर्भाग्यपूर्ण है और दुनिया को इस मुद्दे की ख़बर होनी चाहिए।”

यह वक्तव्य बहुत अच्छा समझें तो परिहासपूर्ण है, बुरा समझें तो धूर्तता-पूर्ण।

अब हम आड़वानी जी पर कैसे भरोसा कर लें? यदि उन्होंने सत्ता में रहते कुछ नहीं किया तो कैसे मान लें कि अब कुछ कर पाएँगे। किस को शेख़ चिल्ली की कहानियाँ सुना रहे हैं वे? विश्वास नहीं होता कि किस तरह ये राजनीतिज्ञ हर मुद्दे को वोटों की जमा-तफ़रीक में बदल देते हैं। मानववादी शर्तें भी इन स्वार्थी राजनीतिज्ञों के लिए कोई अर्थ नहीं रखतीं।

यूपीए सरकार के लिए यह एक मौका है त्रुटिनिवारण का, और दुनिया को दिखाने का कि उसका सभी समुदायों के साथ न्याय में पक्का विश्वास है। मैं चुनौती देता हूँ उन को, कि कश्मीरी हिन्दुओं के घाटी से सफाया किए जाने के कारणों का निरीक्षण करने के लिए एक जाँच आयोग बिठाएँ, इस घिनौनी कृति के लिए ज़िम्मेदार लोगों को खोज निकालें और उन्हें देश के विधान के अनुसार दंडित करें।

यदि लालू प्रसाद यादव गोधरा काँड की पुनः जाँच करने के लिए जस्टिस बैनर्जी की अध्यक्षता में जाँच समिति नियुक्त कर सकते हैं, तो गृह मन्त्री शिवराज पाटिल कश्मीरी हिन्दुओं के सफाए की जाँच के लिए आयोग क्यों नहीं नियुक्त कर सकते?

क्या यूपीए सरकार यह चुनौती स्वीकार करने को तैयार है? कोई सुन रहा है यूपीए सरकार सरकार में? कोई सुन रहा है? कोई है?


ललित कौल “कश्मीर हेराल्ड” के सम्पादक हैं। उनके अन्य लेख पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।

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आतंक से मुख्यधारा की राह क्या हो?

Anugunj: Third event
हाल ही के कुछ समाचार माध्यमों में खबर थी, १९९० के पूर्वार्ध में जम्मू कश्मीर छात्र स्वातंत्र्य फ्रंट के कर्ताधर्ता और आत्मसमर्पण करने वाले आतंकियों की संस्था इख़्वान‍-उल-मुस्लिमीन के सर्वोच्च कमांडर ताहिर शेख इख़्वानी ने टेरिटोरियल सेना के अफसरों की चयन परीक्षा उत्तीर्ण कर ली है। बहस उठी कि क्या यह मुनासिब है कि पूर्व आतंकवादियों को सामरिक रूप से महत्वपूर्ण पद सोंपे जाएँ? यही बना तीसरी अनुगूँज का विषय: “आतंक से मुख्यधारा की राह क्या हो?”

मेरे विचार में आतंक से मुख्यधारा की राह जो भी हो, उस की मंज़िल भारतीय सेना नहीं होनी चाहिए। पहले तो आतंक से मुख्य धारा की राह हो ही क्यों? यदि सामान्य जीवन में कोई क़त्ल करता है, तो चाहे पकड़ा जाए या आत्मसमर्पण करे, उस की राह जेल में जाके ही रुकती है। अगला पड़ाव मृत्यु दण्ड या आजीवन कारावास, नहीं तो लम्बा कारावास। मुख्य धारा की बात हो भी तो सज़ा काटने के बाद। जिन आतंकियों ने असंख्य हत्याएँ की हों उनके साथ मुख्य धारा की बात क्यों हो? क़त्ल भी ऐसे वैसे नहीं किए होते इन लोगों ने — फौजियों को मारा होता है। अब इन्हीं लोगों को फौज में शामिल करेंगे आप? परीक्षा तो कोई भी उत्तीर्ण कर ले, जाने क्या स्थितियाँ रही होंगी जब ताहिर मियाँ ने टेरिटोरियल सेना के अफसरों की चयन परीक्षा उत्तीर्ण की होगी। हो सकता है उसमें उन्हीं राजनीतिक शक्तियों का हाथ हो जो उन्हें सेना का अफ़सर बनाने पर तुले हुए हैं। यों तो मुन्ना भाई ने भी डाक्टरी की एक से बढ़ के एक परीक्षा टाप करी थी, यह तो उनसे आपरेशन करवाने वाली बात हो गई।

चलिए माना इखवान वाले सरकारी आतंकवादी हैं। इन लोगों ने काफी सहायता की है भारतीय एजेंसीज़ की। बेचारे ताहिर मियाँ पर तो जानलेवा हमले भी हुए पाकिस्तान-परस्त आतंकियों द्वारा। इख़वानुल-मुस्लिमीन का संस्थापक और पूर्व अध्यक्ष कुका परे तो राजनीति में भी कूद पड़ा था। १९९६ में विधायक का चुनाव भी जीता। पर पिछले वर्ष मार दिया गया। कई साथी भी मारे गए। पर विश्व भर में ऐसे गुटों का इतिहास देखिए। अक्सर देखा गया है कि यह लोग आस्तीन के साँप होते हैं, कभी न कभी पालने वाले को ही काट खाते हैं। जरनैल सिंह भिंडरावाले से ले कर तालिबान तक कई लोग और गुट किसी न किसी रूप में पहले “सरकारी” आतंकी रहे हैं।

अब प्रश्न यह है कि यदि इन लोगों ने सरकार की सहायता की है और उसे अगर पुरस्कृत करना ही है तो कैसे किया जाए? पैट्रोल पम्प दे दीजिए। गैस एजेन्सी दे दीजिए। राजनीति भी चल जाएगी, वैसे ही देश-द्रोहियों से भरी पड़ी है। पर फौजी अफ़्सर? नहींऽऽऽऽ !!!