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मोहल्ले के कैन्सर से बचाव के लिए एक अपील

मोहल्ला हिन्दी चिट्ठा जगत में एक कैन्सर बन कर उभर रहा है — ऐसा कैन्सर जिस का कोई इलाज नहीं लग रहा। इस चिट्ठे का और इस से जुड़े कुछ और चिट्ठों का एक ही मकसद है – हिन्दी चिट्ठाकारों और पाठकों को हिन्दू मुस्लिम झगड़े में उलझाना। हम लोग अच्छे खासे भाईचारे में चल रहे थे, इन चिट्ठों ने तूफान मचा दिया। आम तौर पर चिट्ठे मुक्त लेखन में विश्वास करते हैं – कभी कुछ लिख दिया कभी कुछ, और स्वाभाविक है इस में कभी कभार धर्म-समाज आदि की भी बात आ जाती है। पर कुछ चिट्ठे किसी एक थीम पर ही आधारित होते हैं – कुछ खेल पर, कुछ तकनीकी विषयों पर, कुछ मनोरंजन पर। और इन्होंने एक समाज विशेष को लताड़ना अपनी थीम बना रखा है, इसी का ठेका ले रखा है। यह लोग कोई समस्या हल नहीं करना चाहते, चाहते तो एक तार्किक बहस में यकीन रखते। पर यहाँ तो अहं की अति है, और दूसरों पर लांछन लगाने की अति है। एक ही कूची से सभी को रंगने की मानसिकता है। जो प्रश्न उन्हीं के विषय के सन्दर्भ में पूछे जाते हैं, उन्हें सन्दर्भहीन कहा जाता है। और खुद बेबुनियाद इलज़ाम लगाते जाते हैं दूसरों पर। जो लोग दावे के साथ यह कहें कि अमरीकी सरकार ने स्वयं वर्ल्ड ट्रेड सेंटर, पैंटागन पर हमला कर के हज़ारों लोगों को मारा, और गुजरात सरकार नें स्वयं गोधरा में कार सेवकों को जलाया, उन लोगों को किसी तर्क या प्रमाण की आवश्यकता नहीं है, न आप उन से तर्क या प्रमाण की बात कर सकते हैं। वे सिर्फ एक समुदाय को ही दूध का धुला समझते हैं और उस के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं।

उन के चिट्ठे पर कई बार टिप्पणी करने पर कोई हल नहीं मिला। कीचड़ में पत्थर फेंकते हैं तो खुद को छींटें आती हैं। और उन का मक़सद पूरा हो जाता है गन्द फैलाने का। अपने चिट्ठे पर मैं उन के प्रश्नों का उत्तर दे देता, पर मैं अपने चिट्ठे पर यह कीचड़ नहीं लाना चाहता। इसलिए मैं ने निश्चय किया है कि मैं इन लोगों से बहस में अपना समय नष्ट नहीं करुँगा। मैं ने अपने फीड रीडर से इन की फीड हटा दी है। नारद की फीड में इन की नफरत दिखती रहेगी, पर कोशिश करूँगा कि उस में से सही पोस्टें ही चुन कर पढ़ूँ। मैं उन सब चिट्ठाकारों और पाठकों से अपील करता हूँ कि यदि आप मोहल्ले की विभाजक विचारधारा से सहमत नहीं हैं, तो उन को अपने उद्देश्य में सफल न होने दें। उन के ब्लॉग पर टिप्पणी करना बन्द कर दें। अपने चिट्ठों पर भी इस विभाजक विषय पर लिखना बन्द कर दें। यदि वे आपस में ही बहस करते रहना चाहते हैं तो करें। यदि उन को इसी में अपनी जीत लगती है तो लगे। हमें इस रोज़ रोज़ के झगड़े में दिलचस्पी नहीं है। हम ने काफी कोशिश की कि इन का विलाप बन्द हो, पर यदि इन के पास और कोई विषय नहीं है तो क्या करें। बाकी लोगों के पास और भी काम हैं, और भी ग़म हैं।

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क्या क्रिकेट में हार भारत के लिए फ़ायदेमंद है?

Its never just a game when you’re winning.
George Carlin

अब चूँकि हम हार गए हैं, तो हम कह सकते हैं कि इट्स जस्ट ऍ गेम।

बीबीसी पर मुकुल केशवन पूछते हैं, क्या भारत की हार क्रिकेट के लिए फ़ायदेमंद है? मुकुल का तर्क बिल्कुल सही है। वे भारत और पाकिस्तान के घर लौट आने पर कहते हैं

क्रिकेट जगत के इन दोनों दिग्गज़ (sic) काग़जी शेर (sic) के बाहर होने से अब क्रिकेट प्रेमियों का ध्यान असली क्रिकेटरों और क्रिकेट खेल पर जा सकेगा.

पर मेरा प्रश्न दूसरा है, क्या (भारत की) क्रिकेट में हार भारत के लिए फ़ायदेमंद है? यदि भारत की क्रिकेट-क्रेज़ी जनता, मीडिया और सब से ज़रूरी, खेल प्रबन्धक जागें तो। जैसा मैं ने बहुत पहले एक पोस्ट में लिखा था, क्रिकेट हमारे बाकी खेलों पर और विश्व स्तर पर हमारी खेल-क्षमता पर परछाई बन कर खड़ा हुआ है। यह एक विडंबना ही है, कि जिस खेल का हमारे उपमहाद्वीप में सब से ज़्यादा बोलबाला है, वह अंग्रेज़ों की गुलामी की याद दिलाता है। क्या कारण है कि नीदरलैंड्स को छोड़ कर एक भी ऐसा देश क्रिकेट नहीं खेलता जो अंग्रेज़ों का गुलाम न रहा हो। जो देश क्रिकेट खेलते भी हैं, उन में (भारतीय उपमहाद्वीप के देशों को छोड़ कर) एक भी ऐसा नहीं है जिस में क्रिकेट मुख्य खेल हो। कैनाडा में यदि आम आदमी से क्रिकेट के बारे में पूछा जाए तो शायद ही उसे इस खेल के बारे में कुछ मालूम हो या यह पता हो कि कैनाडा की कोई क्रिकेट टीम है, जो विश्व कप क्रिकेट में भाग ले रही है। इस से मिलता जुलता हाल ऑस्ट्रेलिया, न्यूज़ीलैंड और दक्षिण अफ्रीका में होगा। भारत के लिए बहुत ज़रूरी है कि ऐसे खेलों की तरफ ध्यान दे, जो उन की ओलंपिक मैडल तालिका को शून्य से ऊपर सरका सके।

खैर फिलहाल मीडिया से ले कर दर्शकों, कंपनियों, और ब्लॉगरों तक लोगों को लग रहा है कि उन के साथ धोखा हुआ है। इस वर्ष के इंडीब्लॉग्स विजेता ग्रेटबौंग ने पहले ही दिन अपने दो सौ डॉलर को अलविदा कह दिया था जो उन्होंने क्रिकेट वर्ल्ड कप को टीवी पर देखने के लिए खर्च कर दिए थे – जब भारत बांग्लादेश के हाथों मार खा गया था। अब उन को दो सौ डॉलर यानी लगभग नौ हज़ार रुपए में भारत के केवल तीन मैच देखने को मिलने थे, जिन में से एक वह हार चुका था। आखिरी मैच के समय उन को विश्वास हो गया कि सौ करोड़ “नीलस्वप्नदर्शियों” के वेट-ड्रीम का शीघ्रपतन हो गया है।

चलिए इस बात पर गर्व किया जाए कि बर्म्यूडा को भारत ने धूल चटाई। पर उस से पहले बर्म्यूडा पर एक नज़र डाली जाए, ताकि इस “ऐतिहासिक” विजय को सही परिपेक्ष्य में देखा जाए

– बर्म्यूडा की आबादी 67,000 है, यानी झुमरी तलैया से कम
– बर्म्यूडा का क्षेत्रफल 53.3 वर्ग कि.मी. है – यूँ समझिए कि कनॉट प्लेस को केन्द्र मान कर 4 किलोमीटर त्रिज्या का वृत खींच दीजिए। इंडिया गेट से दरयागंज तक का जो इलाका बनेगा, उसे 138 टुकड़ों में बांट दीजिए। यह बर्म्यूडा है, जिस में 138 द्वीप हैं।

ऐसे देश की क्रिकेट टीम है, यह विश्व क्रिकेट की मजबूरी को दर्शाता है, और इस देश की टीम ने भारत के पाँच खिलाड़ी आउट कर दिए, यह भारतीय टीम की मजबूर हालत को।

अन्त में भारतीय क्रिकेट टीम की शान में विशेष रूप से रिकार्ड किया गया यह गीत देखिए और सुनिए (सूचना सौजन्य RMIM)

टैग –

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एक डॉलर का डोमेन

Godaddy 99 cent domain sale जी हाँ, गोडैडी 99 सेंट का डोमेन बेच रहा है, पर केवल डॉट-इन्फो (.info)। मैं ने एक डोमेन खरीदा जो टैक्स आदि मिला कर 1.24 का पड़ा – यानी 55 रुपए के करीब। है न अच्छा सौदा? डोमेन बुक कीजिए और उसे ब्लॉगर पर मुफ्त होस्ट कीजिए।
बस समस्या यह है कि एक साल बाद जब रिन्यू करने का मौका आएगा तो शायद सामान्य रेट देना पडेगा, जो कि आज की तारीख में USD8.95 है।

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उर्दू तकनीकी हिन्दी

यूनिनागरी में अब शुषा, कृतिदेव लेआउट, और उर्दू भी

आप साइबर कैफे में, लाइब्रेरी में, दफ्तर में या किसी ऐसे कंप्यूटर पर काम कर रहे हैं जहाँ आप को कुछ भी इन्स्टाल करने की आज़ादी नहीं है, और आप हिन्दी लिखना चाहते हैं। ऐसे में यूनिनागरी और हग जैसे ऑनलाइन टाइपराइटर बहुत काम आते हैं। मेरी साइट पर यूनिनागरी पिछले दो वर्षों से अधिक से चल रहा है, और कई लोग इसे नियमित प्रयोग कर रहे हैं। अनुभवी लेखकों के काम आने के इलावा इस तरह के टूल उन के भी काम आते हैं जो हिन्दी में लिखना शुरू कर रहे हैं, और अभी कुछ डाउनलोड-इन्स्टाल करने की स्थिति में नहीं हैं।

यूनिनागरी का अपना डिफॉल्ट कुंजीपटल फोनेटिक है, पर फोनेटिक नहीं भी। मतलब यह कि यह ट्रान्सलिट्रेशन नहीं करता, एक कुंजी से एक अक्षर टाइप होता है, जो जहाँ तक हो सके फोनेटिक होने के नज़दीक है (ट्रान्स्लिट्रेशन के लिए हग टूल बहुत बढ़िया काम करता है)। डिफॉल्ट कुंजीपटल के अतिरिक्त मैं ने यूनिनागरी में कुछ समंय पहले इन्स्क्रिप्ट कुंजीपटल जोड़ा था, जो कई लोगों के काम आ रहा है। रवि भाई का इसरार था कि इस में उन लोगों के लिए भी कीबोर्ड लेआउट बनाए जाएँ जो रेमिंगटन/कृतिदेव पर या शुषा पर लिखने के आदी हैं। इस से उन लोगों को भी यूनिकोड में कन्वर्ट करने में आसानी होगी, जो टाइपिंग की आदत नहीं बदलना चाहते और उस कारण कृतिदेव या शुषा प्रयोग कर रहे हैं, या यूनिकोड पर तो आ गए हैं, पर टाइपिंग में दिक्कत महसूस कर रहे हैं।

तो लीजिए हाज़िर है यूनिनागरी का नया रूप – जिस में कृतिदेव/रेमिंगटन और शुषा से मिलते जुलते कीबोर्ड जोड़ दिए गए हैं। जब इन्स्क्रिप्ट जोड़ा था तो साथ में गुरुमुखी लिपि का टाइपराइटर भी जोड़ा था। अब की बार बोनस है उर्दू का टाइपराइटर। इंटरनेट पर ऑनलाइन उर्दू एडिटर की कमी बहुत खल रही थी। उम्मीद है, भारत से और उर्दू चिट्ठाकार उभर कर आएँगे – अभी तक दो तीन ही हैं – जिन में से एक अपने शुएब भाई हैं। नए प्रयोक्ताओं के लिए एक आम प्रश्नोत्तरी भी जोड़ दी है। आगे का इरादा और भारतीय भाषाओं की टाइपिंग जोड़ने का है, ताकि यूनिनागरी एक इंडिक ऑनलाइन टाइपराइटर बन सके।

यदि आप स्वयं के कंप्यूटर पर काम कर रहे हैं तो आम तौर पर ऑनलाइन टाइपराइटर की दरकार नहीं होती। मेरा मानना है कि मानकीकरण के लिए हम सब को इन्स्क्रिप्ट टाइपराइटर की आदत डाल लेनी चाहिए। इन्स्क्रिप्ट टाइपराइटर माइक्रोसॉफ्ट के इंडिक

Keyboard options on Indic IME 1 ver. 5

आइ.एम.ई. में उपलब्ध है ही। इंडिक आइ.एम.ई. 1 वर्जन 5 में और कई और कुंजीपटलों का चुनाव संभव है – रेमिंगटन है, पर शुषा नहीं। आप यह भी जानते होंगे (नहीं जानते हैं तो जान लीजिए) कि माइक्रोसॉफ्ट के कीबोर्ड लेआउट क्रिएटर टूल के द्वारा आप अपनी मर्ज़ी का कीबोर्ड लेआउट बना सकते हैं। इसे डाउनलोड कीजिए और जो लेआउट आप को पसन्द हो वह बनाइए।

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बर्गन का वह पागलखाना

Asylum at Bergenसफर शुरू हुए दो घंटे हो चुके थे। मैं ने किताब से नज़र हटा कर खिड़की से बाहर देखा। शाम होने को थी, बादल थे, पर अभी उजाला था — मुझे मालूम था आधी रात टलने तक ऐसा ही रहना है। बाहर देहात तीव्र गति से गुज़र रहा था — चीड़ और शंकुवृक्ष नीची पहाड़ियों को घेरे थे, नॉर्वे की ग्रीष्म ऋतु की ठंडी धूप से नहाए हुए से। जैसे जैसे रेलगाड़ी ऊँचाई को जाने लगी, पहाड़ी दीवारों से चिपके बर्फ के पैबन्द भी दिखने लगे – गहरे हरे रंग की पृष्ठभूमि पर सफेद चमकते हुए। मैं कुछ मिनट ऐसे ही देखता रहा, फिर वह कर्कष सौन्दर्य अखरने लगा; मैं ने जैकेट को ज़ोर से लपेटा और दोबारा किताब पढ़ने लगा।

‘माफ कीजिए आप वह ब्रेन सर्जन हैं क्या?’

मेरे सामने वाली सीट पर बैठा आदमी अधेड़, गंजा और थोड़ा सा मोटा था। मैं ने मुस्करा कर जवाब दिया –

‘हाँ’

‘मैंने आप के बारे में सुना है – अखबार पर ट्रान्सप्लांट के बारे में जो खबर थी उस में। ओ, आप भारत से हैं, हैं न?’

मेरी मुस्कान चौड़ी हुई। मुझे इस बात की आदत हो गई थी कि मेरे काम से ज़्यादा रुचि मेरी नस्ल में जताई जाती हो, कई बार तो मेरे सहकर्मियों द्वारा भी। मैं ने हाँ में सिर हिलाया और फिर किताब की ओर लौट कर अपना पन्ना खोजने लगा।

***

यह शुरुआत है उस साइ-फाइ कहानी की जिस के लिए आदित्य सुदर्शन को साइंटिफिक इंडियन द्वारा आयोजित विज्ञान फंतासी कथा लेखन प्रतियोगिता में प्रथम पुरस्कार प्राप्त हुआ था। मैं ने इस कहानी का निरन्तर के नवीनतम अंक के लिए हिन्दी अनुवाद किया है। यदि आप ने पहले से नहीं पढ़ी तो, निरन्तर की साइट पर इसे अवश्य पढ़ें; बहुत ही रोमांचकारी कहानी लिखी है आदित्य ने। मूल अंग्रेज़ी कहानी यहाँ पर है।

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भारत विविध

कौन उर्दू बोलने वालों को दहशतगर्द कहते हैं

मोहल्ले में आजकल रोज़ की तानेबाज़ी चल रहा है। लगता है मोहल्ले वालों को सकारात्मक कुछ नहीं दिखता। संगीत में विभिन्न धर्मों के लोग हैं, यह तो सदियों पुरानी बात है, इस के लिए सुदर्शन को ताना। उर्दू बोलने वालों को कोई दहशतगर्द भले न कहे, पर ताने दो और वाहवाही लूटो। अरे भाई, इस सब से ऊपर उठो, हाथ मिलाओ और चलो वतन को आगे बढ़ाते हैं।

मैं स्वयं को राइट-ऑफ-सेंटर विचारधारा वाला समझता हूँ, और अपनी विचारधारा वाले कई लोगों को जानता हूँ। फिर भी मैं ने किसी को यह नहीं कहते सुना कि हर उर्दू बोलने वाला दहशतगर्द है, या यदि इस ताने के भीतरी अर्थ को समझा जाए तो यह कि हर मुसलमान दहशतगर्द है। पर हाँ, यदि दहशतगर्द को भी दहशतगर्द कहना गुनाह है तो फिर मुँह पर टेप लगा कर बैठ जाते हैं।

यदि कुछ बेहूदा लोग यह कहते हैं कि हर मुसलमान दहशतगर्द है, तो उतने ही बेहूदा लोग यह भी कहते हैं कि हर बुतपरस्त काफिर है, या फिर पाकिस्तान ज़िन्दाबाद का नारा लगाते हैं। ऐसे बेहूदा लोगों की बातों को ले कर रोना धोना और तानेबाज़ी कहाँ तक सही है? सकारात्मक पहलू पर ज़ोर क्यों नहीं दिया जाता? फिर यदि कुछ लोग इस तरह की बदकलामी करते भी हैं, तो क्या उस का कुछ इलज़ाम उन के सर नहीं जाता जो असल में दहशतगर्द हैं और पूरी कौम को बदनाम कर रहे हैं। यह दहशतगर्दी तो पूरी दुनिया में फैली है।

इस मुल्क में हर धर्म के लोगों का हर क्षेत्र में प्रतिनिधित्व है। पिछले चुनावों में बहुमत से एक ईसाई धर्म की स्त्री को देश का नेतृत्व सौंपा गया। अन्त में एक सिख धर्म के व्यक्ति ने उन का स्थान लिया। उन को शपथ दिलाने वाले राष्ट्रपति इस्लाम से ताल्लुक रखते हैं, जिन्हें एक हिन्दूवादी कहे जाने वाले दल ने उस पद के लिए नामांकित किया था। यह सब किस देश में हो सकता है? इस सब पर गर्व करने के स्थान पर आप बेहूदा लोगों की बातों को ले कर क्यों मनमुटाव पैदा करते हैं?

हम तो उस मुल्क को जानते हैं, जहाँ हर बन्दा उर्दू बोलता है। जीवन को जिन्दगी कहता है, और स्थान को जगह। हम तो उस मुल्क को जानते हैं जहाँ गुलाम अली और महदी हसन को सिर-आँखों पर बिठाया जाता है, शाहरुख खान और इरफान पठान तो हमारे लख़्ते जिगर हैं ही। हम तो उस मुल्क को जानते हैं जहाँ नौजवानों के लब पर यह गाना है

है यार मेरा खुशबू की तरह
है जिस की ज़ुबाँ उर्दू की तरह

इस के बरअक्स उर्दू बोलने वालों या मौसीकीकारों का हाल अलगाव के बूते पर बने मुल्कों में क्या होता है, उस तफ़सील में मैं नहीं जाना चाहता। उन से हम अपनी तुलना क्यों करें? पर यह भी नहीं चाहता कि यहाँ भी अलगाव की आग लगाई जाए।

मेरा सकारात्मक रवैया इस के बावजूद है कि जीवन में कुछ बहुत ही कड़ुवे अनुभव भी हुए हैं। कोशिश यही की है कि अच्छे को याद रखो बुरे को दरकिनार करने की कोशिश करो। मैं अपने कुछ अनुभव बाँटना चाहता हूँ।

– चौथी या पाँचवीं जमात में पढ़ता था, उत्तर कश्मीर के एक गाँव के सरकारी स्कूल में। मैं अकेला हिन्दू बच्चा था कक्षा में। रोज़ तख्ती (जिसे हम मश्क कहते थे) लिख कर ले जानी होती थी। कुछ भी लिख कर ले जाओ, पर लिखना ज़रूरी था – उर्दू की लिखाई सुधारने के लिए। मेरे सहपाठी कई बार यह लिख कर लाते थे – सारे जहाँ से अच्छा पाकिस्तान हमारा। अच्छा नहीं लगता था, पर कुछ कहने की स्थिति में नहीं थे। टीचर ने कभी कुछ नहीं कहा।

– मिडल स्कूल में यह आम बात थी कि टीचर या प्रिन्सिपल कक्षा में या असेंबली में हिन्दू बच्चों को खड़ा होने को कहे, ताकि उन्हें आइडेंटिफाइ किया जा सके।

– हाई स्कूल में (या उस से पहले) सुबह की प्रेयर में कभी जन-गण-मन नहीं गाया, वन्दे मातरम तो सुना ही नहीं था। हम कश्मीरी भाषा में दो प्रार्थनाएँ गाते थे; एक सेक्यूलर प्रेयर – साहिबो सथ छम मे चानी, और एक मुस्लिम प्रेयर नबी (सल्ल-लाहो-अलहे-वस्सलम) की शान में – या खुदा सारिय खुदाई आसिहे पर्दन अन्दर, आसिहे नय ज़ान ज़ुल्मातन रसूले मोहतरम। क्या एक कश्मीरी हिन्दू वही हल्ला कर सकता था जो भारत में वन्दे मातरम् के खिलाफ होता है? मैं यह नहीं मानता कि वन्दे मातरम् गाने से देश का कुछ भला होगा, पर गाने से गाने वालों का कुछ बुरा भी नहीं होगा, यह मानता हूँ। बेकार का हल्ला है।

– जब भुट्टो को दी गई फाँसी के विरोध में हमारा इंजीनियरिंग कॉलेज बन्द हुआ तो एहतिजाजी जुलूस में हमें भी शामिल होना पड़ा।

फिर वहाँ एक तूफान आया जिस के बाद हमें वहाँ सब छोड़ कर आना पड़ा। एक हिन्दू अल्पसंख्यक के रूप में जीवन कैसा था, इस की ज़्यादा तफ़सील में भी नहीं जाऊँगा। फिर भी यह लगता था कि कश्मीर में मुसलमानों की अक्सरियत है, शायद ये सही कहते हैं कश्मीर घाटी पाकिस्तान का ही भाग होना चाहिए। उस बात पर अपने विचार किसी अन्य पोस्ट में लिखूँगा।

दोस्त मेरे हमेशा मुसलमान रहे, और अब भी हैं। धर्म के अतिरिक्त हर चीज़ पर बहस होती थी – मैं ठहरा नास्तिक और उन में से किसी में खुदा को नकारने की हिम्मत नहीं थी। सातवीं से नौवीं तक मेरठ में पढ़ने का मौका मिला। वहाँ मेरा दोस्त था सलीम। वह हैरान होता था जब मैं उस को कश्मीर की (भारत विरोधी) बातें बताता था, और उस हिन्दुस्तानी मुसलमान की हैरानगी मुझे खुशी देती थी।

फिर कॉलेज के अन्तिम वर्ष में ऑल-इंडिया टूर के तहत हैदराबाद जाना हुआ। मैं और दो और कश्मीरी हिन्दू दोस्त चारमीनार देखने गए तो एक रिक्शे वाले ने पेशकश की – चलिए साहब शहर घुमा लाता हूँ। भाड़ा तय हुआ और हम चल पड़े। उस से नाम पूछा तो उस ने कुछ मुस्लिम नाम बताया, और हम से भी नाम पूछे। मेरे दोस्त को जाने क्या मज़ाक सूझा, उस ने भी तीनों के नाम मुस्लिम बताए। फिर वह खुल कर हमें वहाँ की बातें बताने लगा, यह देखिए यह सारा हमारा इलाका है यूँ समझिए पाकिस्तान है। हिन्दुओं के खिलाफ बातें बताने लगा। हम चुपचाप सुनते रहे – अपने घर से इतनी दूर भी पाकिस्तान हमारा पीछा नहीं छोड़ रहा था। वह हमें एक ज़ियारत में भी ले कर गया। हम ने जैसे तैसे पीछा छुड़ाया कि कहीं हमारा झूठ न पकड़ा जाए।

यह सब अनुभव मेरे भारत के भविष्य के बारे में विश्वास को नहीं डिगाते। बल्कि मेरा विश्वास मज़बूत होता है कि इतनी नकारात्मकता के बावजूद सकारात्मकता इतनी है कि हमारा देश आगे चल रहा है – बेशक दौड़ न रहा हो, और इस में हर धर्म के लोगों का हाथ है।

मैं यह नहीं मानता कि अधिकांश मुसलमान ऐसे हैं। न यह मानता हूँ कि सभी हिन्दू अच्छा ही सोचते हैं। पर भाई इन्हीं बातों का ज़िक्र छेड़ोगे तो दोनो तरफ इन्हीं बातों का ज़िक्र होगा। यह तो कभी खत्म न होने वाली बहस है, जिस का कोई सही नतीजा नहीं निकलेगा। पर यह भी बात है, कि जो चिट्ठे यही एजेंडा ले कर शुरू हुए हैं, वे फिर क्या लिखेंगे। यह जो सांप्रदायिकता वाले चिट्ठा-पोस्टों का तांता लगा हुआ है, क्या इस का वास्तविक मकसद हंगामा खड़ा करना ही नहीं है? टिप्पणियाँ इस पोस्ट पर भी पढ़ी जा चुकीं थीं, पर एक इफेक्ट के लिए टिप्पणियों की अलग पोस्ट बनाई गई, जिस का टाइटल था – हंगामा खड़ा करना मक़सद नहीं। ठीक है, आप अपना लिखने के लिए मुक्त हैं, और हम अपना। अगर चिट्ठा जगत में अब इसी का चर्चा होना है तो इसी का सही।

मुनव्वर राना अपनी ग़ज़ल में कहते हैं

मदीने तक में हम ने मुल्क की खातिर दुआ मांगी
किसी से पूछ ले इस को वतन का दर्द कहते हैं।

वतन का दर्द वतन की औलाद को नहीं होगा तो किसे होगा। हाँ मदीने वाला या कैलाश पर्बत वाला कितनी सुनता है, यह मालूम नहीं। खासकर जिस मुल्क में कुफ्र का बोलबाला हो, उस की अल्लाह क्या सुनेगा।

PS: राना साहब की हसीन ग़ज़ल के जवाब में मैं ने उस की टिप्पणी में यह ग़ज़ल की पूँछ जोड़ी थी, जिसे राजीव जी के प्रोत्साहन (नीचे पहली टिप्पणी देखें) पर यहाँ दोहरा रहा हूँ (बहर और क़ाफ़िए की गड़बड़ के लिए माज़रत-ख़्वाह हूँ)।

करा दो तआर्रुफ़ हम से भी ज़रा उन का
जो उर्दू बोलने वालों को दहशतगर्द कहते हैं।

कब ख़त्म होगा सिलसिला यह रोते धोते रहने का
जो माज़ी को भूल बढ़े आगे उसी को मर्द कहते हैं।

तमिल बोले, तेलुगू, बंगाली, उर्दू या कश्मीरी
यहाँ सब लोग हिन्दी हैं, यही सब फ़र्द कहते हैं।

उर्दू वाला नहीं मोहाजिर वो है हिस्सा वतन का
नहीं यकीं तो देख क्या वतन के सद्र कहते हैं।

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तकनीकी

वर्डप्रेस 2.1.1 “खतरनाक” है

यह समाचार उन लोगों के लिए है जो वर्डप्रेस को अपने सर्वर पर प्रयोग कर रहे हैं। वर्डप्रेस के द्वारा जारी नई खबर के अनुसार वर्डप्रेस का अब तक का नवीनतम संस्करण 2.1.1 असुरक्षित ही नहीं “खतरनाक” है। यदि आप ने वर्डप्रेस 2.1.1 को पिछले तीन चार दिन में डाउनलड कर इन्सटाल किया है, तो फटाफट 2.1.2 डाउनलोड कर के उसे ओवर-राइट करें।

वर्डप्रेस वाले बताते हैं कि किसी अनधिकृत व्यक्ति ने वर्डप्रेस के सर्वर में सेन्ध लगा कर डाउनलोड फाइल को ही बदल डाला, और उस में दो फाइलों को इस तरह बदला कि आप के सर्वर पर PHP फाइलों को बाहर से चलाया जा सकता है। पूरी सूचना आप वर्डप्रेस की साइट पर पढ़ सकते हैं

कल ही श्रीश ने वर्डप्रेस के विषय में एक जानकारीपूर्ण लेख लिखा था, और उस में बताया था

सॉफ्टवेयर का नया संस्करण आने पर आपको सॉफ्टवेयर को स्वयं अपग्रेड करना होगा।

यही नहीं, आप को इस तरह की चीज़ों का ध्यान रखना होगा, यह ध्यान रखना होगा कि नया संस्करण कब आ रहा है, और इस तरह की कोई सुरक्षा संबन्धी समस्या तो नहीं है। जैसा कि अमित ने बताया कि

जो सेवाएँ एक क्लिक इंस्टॉल वाली सुविधा देती हैं वे एक क्लिक पर अपग्रेड की सुविधा भी देती हैं।

उम्मीद है कि ऐसी सेवाएँ एकदम नया संस्करण उपलब्ध कराएँगी। मेरा पहले का अनुभव यह रहा है, कि फैंटास्टिको जैसी सेवाएँ अक्सर नवीनतम संस्करण उपलब्ध नहीं करातीं। शायद उस में अब कुछ सुधार आ गया हो।

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विविध

टैगिंग की उत्तर-पुस्तिका

श्रीश जी धन्यवाद एक आलसी चिट्ठाकार को जगाने के लिए। देर के लिए क्षमा.. पर अब बिना समय गवाँए, यह रहे मेरे जवाब।

१. कम्प्यूटर पर हिन्दी टाइपिंग के बारे में सबसे पहले आपने कब सुना और कैसे, अपने कम्प्यूटर में हिन्दी में सबसे पहले किस सॉफ्टवेयर में/द्वारा टाइप किया और कब, आपको उसके बारे में पता कैसे चला ?

कम्प्यूटर पर हिन्दी टाइपिंग की खोज तो तब से ही थी, जब से कंप्यूटर से सब से पहले पाला पड़ा। वह ज़माना विंडोज़, वर्ड और इंटरनेट के चलन से पहले का था। मैं ने जब पीसी पर काम करना सीखा (1989-90 में) तो एम.एस.डॉस, वर्डस्टार, लोटस 1-2-3 आदि प्रोग्राम अधिक प्रचलित थे। उन दिनों एक हिन्दी का वर्ड-प्रोसेसर भी मिला था, जो वर्डस्टार जैसा ही था और एम.एस. डॉस पर चलता था। जहाँ तक मुझे याद है, उस का नाम अक्षर था। आज खोजा तो कुछ सूचना इस पते पर मिली। पर उस पर टाइपिंग नाममात्र ही की। फिर विंडोज़ आया, फिर इंटरनेट आया, वी.एस.एन.एल. के मुफ्त सर्वर पर पहली वेबसाइट बनाई और तब सीडैक के आइ-लीप का प्रयोग किया। 1999 में वी.एस.एन.एल. की स्टार्टर सीडी के साथ आइ-लीप का सीमित परीक्षण संस्करण मुफ़्त था। इस सीड़ी को प्राप्त करने के लिए नई दिल्ली में वी.एस.एन.एल. के दफ्तर में लाइन में लगना पड़ा था। आइलीप को फुल वर्जन में परिवर्तित करने के लिए 500 रुपए का चैक भेजना पड़ा था सीडैक को। उस की रसीद, क्रियान्वयन कूट वाली ईमेल, और वह सीडी मेरे पास अभी भी मौजूद है – यह मेरा पहला खरीदा हुआ सॉफ्टवेयर भी था। उन दिनों गिनी चुनी हिन्दी साइटें थीं, और मेरी उन में से एक थी। ब्लॉगिंग का नाम तब नहीं सुना था, पर हमारी साइटें कुछ कुछ ब्लॉग जैसी ही थीं। फिर यहाँ, यू.एस. आया तो इंटरनेट और कंप्यूटर का प्रयोग अपेक्षाकृत काफी सुलभ हो गया। हिन्दी के सॉफ्टवेयरों की खोज जारी रही, और फिर शुषा का प्रयोग भी कुछ समय के लिए किया – शुषा में सब से बड़ा फायदा यह था कि आप को टाइपिंग के लिए किसी बाहरी टूल की आवश्यकता नहीं थी। हिन्दी के याहू-समूहों में सक्रिय रहा। अभिव्यक्ति भी नियमित पढ़ता रहा। फिर 2002 में यूनिकोड मिला तो वारे न्यारे हो गए। यूनिकोड में सब से पहले टाइपिंग छहरी से की। यूनिपैड का भी प्रयोग किया, फिर यूनिनागरी बनाया तो उसे काफी समय तक प्रयोग किया। , और अन्त में आइ.एम.ई. पर आ कर रुका।

२. आपका हिन्दी चिट्ठाजगत में आगमन कैसे हुआ, इसके बारे में कैसे पता लगा, पहला हिन्दी चिट्ठा/पोस्ट कौन सा पढ़ा/पढ़ी ? अपना चिट्ठा शुरु करने की कैसे सूझी ?

हिन्दी के लिए अन्तर्जाल को खंगालते रहना तो पहले से चल ही रहा था। फिर चिट्ठे दिखे तो पढ़ने लगा। मैं जब 2004 के अन्त में चिट्ठाकारी की दुनिया में आया तो करीब 15-16 चिट्ठाकार थे। सब से पहले कौन सा पढ़ा, ठीक से याद नहीं – फुरसतिया, नौ दो ग्यारह, नुक्ताचीनी, हाँ भाई (जो अब मिर्चीसेठ बन गया है), मेरा पन्ना या रोजनामचा। या शायद सभी एक ही दिन मिले। अक्षरग्राम का आरंभ कुछ माह पहले हो चुका था। अक्षरग्राम पर, या किसी भी ब्लाग पर मेरी पहली टिप्पणी शायद यह थी। फिर मेरे प्रिय विषय कश्मीर का ज़िक्र आया तो अक्षरग्राम पर यह टिप्पणी की, जिस के जवाब में जीतू ने अपना चिट्ठा लिखने को उकसाया (मेरी हर टिप्पणी में वर्तनी की मीन मेख निकालने की भी बीमारी मिलेगी आप को, ..यह अलग बात है कि कई बार मुँह की भी खाई है)। बस फिर क्या था, कुछ ही दिनों में ब्लॉगस्पॉट पर चिट्ठा शुरू किया, जिसे बाद में वर्डप्रेस द्वारा अपने सर्वर पर डाल दिया।

३. चिट्ठा लिखना सिर्फ छपास पीडा शांत करना है क्या ? आप अपने सुख के लिये लिखते हैं कि दूसरों के (दुख के लिये 😉 क्या इससे आप के व्यक्तित्व में कोई परिवर्तन या निखार आया ? टिप्पणी का आपके जीवन में क्या और कितना महत्त्व है ?

मेरे लिए तो छपास पीड़ा शान्त करना ही है। स्वयं के सुख के लिए तो लिखता ही हूँ, साथ में दूसरों को भी दुख हो तो क्या कहने ;-)। साल भर पहले तक इतने कम चिट्ठे थे कि हर चिट्ठाकार हर चिट्ठा पढ़ता ही था। इस कारण अपराध बोध होता था कि कितने लोगों को दुखी कर रहा हूँ अपने सुख के लिए। अब इतने चिट्ठे हो गए हैं, सब को अपने भले बुरे का चुनाव करने की स्वतन्त्रता है; ऐसे में भी यदि कोई मेरे चिट्ठे पर आता है, तो अपने रिस्क पर आता है, इस लिए मैं अब उन के दुख के लिए स्वयं को उत्तरदायी नहीं मानता। पर यह कहना बेईमानी होगी कि मैं केवल अपने लिए लिखता हूँ, कोई पढ़े या न पढ़े। लिखता इसी उम्मीद में हूँ कि लोगों को अच्छा लगे, लोग पढ़ें, टिप्पणी करें। पिछली दो प्रविष्टियों पर कोई टिप्पणी नहीं हुई, ऐसा लगता है मोहल्ले के शोर में खो गईं, जब कि मैं सोच रहा था कि ये विषय एक गर्म बहस का भी हिस्सा हैं, और राष्ट्रीय स्तर पर महत्वपूर्ण भी। अंग्रेज़ी में लिखा तो विरोध ही सही, पर प्रतिक्रिया तो मिली। वह कहते हैं न

कत’आ कीजे न त’आल्लुक हम से,
कुछ नहीं है तो अदावत ही सही।

(कत’आ = समाप्त करना, त’आल्लुक = सम्बन्ध, अदावत = शत्रुता)

व्यक्तित्व में कितना परिवर्तन आया, कहना कठिन है – निखार कहना और भी कठिन है। हाँ दिनचर्या में बहुत बड़ा परिवर्तन आ गया है। पहले ही वेब सर्फिंग में काफी समय निकल जाता था, अब चिट्ठे पढ़ने-लिखने में भी काफी समय चला जाता है। दूसरों के चिट्ठे पढ़ता ही हूँ, स्वयं लिखने का बहुत समय नहीं मिलता, पर बिना लिखे भी टिप्पणियों और हिट्स का इन्तज़ार रहता है। इसे vanity ही कहा जा सकता है – शब्दकोश के हिसाब से हल्कापन। वेब सर्फिंग यदि उपयोगी न हो तो समय की बरबादी ही है, और यदि यह दफ्तर में की जाए तो बेईमानी भी है। हिन्दी चिट्ठाकारी के चलते वेब सर्फिंग दुगनी हो गई है, और लत इतनी तेज़ है कि दफ्तर के समय का भी अच्छा खासा समय इसी में निकल जाता है, जिसे रोकने की कोशिश करता हूँ पर असफल रहता हूँ। कई बार ऐसा लगता है कि हम एक वर्चुअल दुनिया में रह रहे हैं, एक वर्चुअल ज़िन्दगी जी रहे हैं, और असली ज़िन्दगी पीछे छूट रही है। बेटी को बुखार है, दवाई लेने जाना है, पर यह प्रविष्टि पहले खत्म कर लूँ। मिश्रा जी के यहाँ पार्टी चल रही है – आप का कंप्यूटर तो चल रहा है न मिश्रा जी, मैं ज़रा ईमेल चैक कर लूँ।

४. अपने जीवन की कोई उल्लेखनीय, खुशनुमा या धमाकेदार घटना(एं) बताएं, यदि न सूझे तो बचपन की कोई खास बात जो याद हो बता दें।

अब मुश्किल सवाल पर ला खड़ा किया है। इस पर तो एक अनुगूँज हो सकती है। इतना लिख पाते तो फुरसतिया न होते। अरे याद आया इस पर पहले एक प्रविष्टि लिखी थी, फिलहाल उसे पढ़ लीजिए। 🙂

५. यदि भगवान आपको भारतवर्ष की एक बात बदल देने का वरदान दें, तो आप क्या बदलना चाहेंगे/चाहेंगी ?

यह और भी मुश्किल प्रश्न है। इतनी सारी चीज़ें मन में आती हैं, कि किसी एक चीज़ पर उंगली रखना मुश्किल है। मेरे विचार में सब से बड़ी तीन चीज़े जिन से भारत को पीछा छुड़ाने की आवश्यकता है, वे हैं – जनसंख्या विस्फोट, घूसखोरी और आतंकवाद। फिलहाल तो यही चाहूँगा कि आतंकवाद का नाश हो क्योंकि इस में भारत को बहुत शीघ्र नष्ट करने की क्षमता है, यदि आतंकवाद नहीं थमा तो सारी प्रगति धरी रह जाएगी।

उम्मीद है, परीक्षा में उत्तीर्ण होने लायक अंक मिल जाएँगे।

अब मुझे जगाया गया है, तो मैं भी कुछ सोये हुए चिट्ठाकारों को जगाने का प्रयत्न करता हूँ। चिट्ठाजगत में घूम रहा हूँ, जहाँ से खर्राटों की आवाज़ आ रही है, वहीं नाम नोट कर रहा हूँ। मैं ऐसे चिट्ठाकारों को टैग कर रहा हूँ जो पिछले एक वर्ष या अधिक समय से सोए हुए हैं। यदि एक को भी जगा पाया तो अपने प्रयत्न को सफल समझूँगा। तो कुंभकर्ण सूची यह रही –

1. रमन बी, जिन्हें अपनी बात कहे अरसा गुज़र गया
2. राजेश कुमार सिंह, आप का अब क्या अभिप्राय है
3. अरुण कुलकर्णी जी, अब तो कुछ उवाचिए
4. बेदिल भगत, मियाँ अब इतने बेदिल भी न बनिए
5. पद्मजा जी, अब कुछ और कहिए तो कही अनकही जीवित हो

बस आप लोगों को करना यह है कि अपने चिट्ठों के पासवर्ड ढूँढ ढाँढ कर एक प्रविष्टि लिखनी है, जिस में पाँच प्रश्नों के उत्तर देने हैं। प्रश्न पत्र वही है जो मुझे दिया गया था। यानी

१. कम्प्यूटर पर हिन्दी टाइपिंग के बारे में सबसे पहले आपने कब सुना और कैसे, अपने कम्प्यूटर में हिन्दी में सबसे पहले किस सॉफ्टवेयर में/द्वारा टाइप किया और कब, आपको उसके बारे में पता कैसे चला ?

२. आपका हिन्दी चिट्ठाजगत में आगमन कैसे हुआ, इसके बारे में कैसे पता लगा, पहला हिन्दी चिट्ठा/पोस्ट कौन सा पढ़ा/पढ़ी ? अपना चिट्ठा शुरु करने की कैसे सूझी ?

३. चिट्ठा लिखना सिर्फ छपास पीडा शांत करना है क्या ? आप अपने सुख के लिये लिखते हैं कि दूसरों के (दुख के लिये 😉 क्या इससे आप के व्यक्तित्व में कोई परिवर्तन या निखार आया ? टिप्पणी का आपके जीवन में क्या और कितना महत्त्व है ?

४. अपने जीवन की कोई उल्लेखनीय, खुशनुमा या धमाकेदार घटना(एं) बताएं, यदि न सूझे तो बचपन की कोई खास बात जो याद हो बता दें।

५. यदि भगवान आपको भारतवर्ष की एक बात बदल देने का वरदान दें, तो आप क्या बदलना चाहेंगे/चाहेंगी?

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तकनीकी

एक ब्लॉगर जुगाड़

जैसा आप जानते ही होंगे, यह चिट्ठा ब्लॉगर पर न हो कर एक अलग सर्वर पर है, और वर्डप्रेस के सहारे चलता है। पर यदि आप मेरा ब्लॉगर प्रोफाइल देखेंगे तो उस में इस चिट्ठे की कड़ी भी पाएँगे। इस में कोई बड़ी बात नहीं, पर इस से यह लाभ है कि यदि मैं किसी ब्लॉगस्पॉट के चिट्ठे पर टिप्पणी करता हूँ और उस के फलस्वरूप कोई मेरे प्रोफाइल पर जाता है, तो उसे वहाँ मेरे सभी चिट्ठों की कड़ियाँ मिलेंगी। यदि आप थोड़े भी सक्रिय चिट्ठाकार हैं तो आप का ब्लॉगर खाता होना ज़रूरी है, चाहे आप का मुख्य चिट्ठा ब्लॉगर पर न भी हो। मेरे ब्लॉगर परिचय पृष्ठ को देख कर किसी ने यह प्रश्न पूछा था, इस कारण यहाँ सभी की सुविधा के लिए उत्तर दे रहा हूँ। जुगाड़ काफी सरल है।

अपने ब्लॉगर खाते में उसी शीर्षक का एक चिट्ठा बनाना शुरू करें जिस की आप कड़ी बनाना चाहते हैं। सेटिंग्स में जा कर पब्लिशिंग टैब में FTP को चुनें। FTP Server, Blog URL और Blog Filename वाले खानों में इच्छित सूचना भर दें। FTP Username और FTP Password वाले खानों में कुछ भी उल्टा सीधा भर दें, और Save settings पर क्लिक करें। बस, चिट्ठे को पब्लिश करने की ज़रूरत नहीं, न ही इस चिट्ठे पर कोई प्रविष्टि लिखने की आवश्यकता है। काम हो गया।

वैसे क्या ही अच्छा हो कि कोई ऐसा यूनवर्सल प्रोफाइल सिस्टम हो (जैसे टेक्नोराती) जिसे हर मुख्य ब्लॉग प्लैटफॉर्म पहचाने। क्या ऐसा कोई यन्त्र है?

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तकनीकी विविध

वर्डप्रेस 2.1 ऍला

वर्डप्रेस के द्वारा दी गई सूचना के अनुसार वर्डप्रेस का नया संस्करण 2.1 ऍला जारी हो गया है। इस ब्लॉग पर वर्डप्रेस का नवीनतम संस्करण स्थापित कर दिया गया है। इस संस्करण के कुछ नए फीचर्स की सूची इस पते पर देखें।

वर्डप्रेस 2.1 ऍला