Categories
विविध

छः लाख रुपए में मुँह मीठा कीजिए

Image courtesy: BBC Newsजी हाँ, यही है इस महंगे होटल में इस नए डेसर्ट की कीमत – और यह होटल लंदन, न्यूयॉर्क या टोकियो में नहीं, श्रीलंका के दक्षिणी तट के शहर गालि (காலி) में है।

छः लाख की चॉकलेट आइसक्रीम? इस में हीरे मोती जड़े हैं क्या?

वैसे भी यह होटल (द फोर्ट्रेस) एशिया के सब से महंगे होटलों में है, और वहाँ के कमरे का किराया 1700 डॉलर (68,000 रुपए) तक हो सकता है।

Categories
मनोरंजन

SMS का कमाल, प्रशान्त तामांग

Prashant Tamang and Amit Paulप्रशान्त तामांग बुरे गायक नहीं हैं, पर अमित पॉल से जीतने की शक्ति उन में गाने के आधार पर तो नहीं थी। प्रशान्त की इंडियन आइडल के फाइनल में जीत ने यह साबित कर दिया कि उन के समर्थकों ने एस.एम.एस. द्वारा अमित को ही नहीं, बल्कि और कई अच्छे गायकों को धूल चटा दी। फाइनल तक सब ठीक था – इमॉन, दीपाली, चारू, पूजा, अंकिता जैसे अच्छे गायकों का बाहर हो जाना तब तक नहीं खला, जब तक अमिल पॉल बचा हुआ था और उस के जीतने की उम्मीद मौजूद थी। मैं मानता था कि इस खेल में एसएमएस पर काफी दारोमदार है, पर सारा खेल उसी का है, यह अन्त में प्रशान्त की जीत ने साबित कर दिया।

इंटरनेट पर नेपाल और दार्जीलिंग के कई फोरम चल रहे थे, जहाँ से प्रशान्त के लिए वोटिंग जुटाई जा रही थी। कुछ फ्री एसएमएस का भी जुगाड़ था।

इंडियन आइडल पर मेरे पिछले पोस्ट पर संजय बेंगाणी ने जो भविष्यवाणी की थी, वह सौ फीसदी सच साबित हुई। फिर भी यदि जजों की बातों में, खासकर जावेद अख़्तर की बातों में, कुछ ईमानदारी थी, तो अमित पॉल को पार्श्वगायन का काम मिलना चाहिए।

Categories
मनोरंजन

परदेसी इंडियन आइडल


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

भाई, एस.एम.एस. द्वारा संगीत के सितारों की चयन प्रक्रिया से अन्य चिट्ठाकार बन्धुओं के साथ मैं भी परेशान हूँ। पर फिर भी देसी टीवी पर संगीत प्रतिस्पर्धाओं पर आधारित कार्यक्रम हमेशा मेरी कमज़ोरी रहे हैं, इस के बावजूद कि संगीत को कर्णप्रियता के आधार पर सुनता हूँ, बारीकी की कोई समझ नहीं है। इस कारण हर शुक्रवार को रात नौ बजे इंडियन आइडल का गायन एपिसोड और हर शनि को परिणाम एपिसोड मैं मिस नहीं कर सकता।

अब इंडियन आइडल के अन्तिम मरहलों में कुछ ही गायक रह गए हैं और हर हफ्ते हमारा कोई पसन्दीदा गायक ही बाहर होता है। इस वर्ष की शृंखला में दो रोचक गायक हैं/थे, जो आम उत्तर-भारतीय-हिन्दी-भाषी के ढ़र्रे से बाहर भी हैं, गाते भी अच्छा हैं, और लोकप्रिय भी हैं – मयंग चैंग, जो चीनी मूल के हैं, और प्रशान्त तमांग, जो पश्चिम बंगाल के एक पुलिस कर्मी हैं। वैसे देखा जाए तो अग्रणी समझे जाने वाले प्रतियोगी अमित पॉल भी उत्तर पूर्व से हैं।

मयंग चैंग
पिछले सप्ताह मयंग चैंग बाहर हो गए। मयंग को अपनी पर्सनैलिटी के आधार पर अधिक वोट मिलते रहे, और बेहतरीन गायक न होते हुए भी वे टॉप पाँच में पहुँच गए — इस कारण मुझे उन के बाहर होने से ज़्यादा शिकायत नहीं है। वहीं मुझे यह बात कुछ अटपटी लगी कि मयंग के चीनी मूल पर इस कार्यक्रम में कुछ ज़्यादा ही ज़ोर दिया गया — यहाँ तक कि शो की प्रस्तुति में मुझे बहुत हद तक नस्लवाद की बू आई। मयंग का जन्म भारत में हुआ है, पिछली कई पुश्तों से उन का परिवार भारत में बसा हुआ है। वे ठेठ हिन्दी बोलते हैं, 100 प्रतिशत भारतीय हैं, चीन कभी गए नहीं। चीनी उन्हें आती नहीं। फिर उन्हें चीनी कहना कहाँ तक सही है। चीनी मूल का कहना एक बात थी। यही नहीं, उन्हें प्यार से चिंगू-मिंगू कहा जाता रहा, और उन की पतली आँखों पर भी प्यार से ही सही, पर मज़ाक किए गए। मयंग अकेले प्रतियोगी हैं, जिन्हें उन के फर्स्ट-नेम मयंग के बदले उन के लास्ट-नेम चैंग से पुकारा गया, और वोटिंग के लिए उसी नाम का प्रयोग किया गया। इंडियन आइडल की आधिकारिक साइट पर भी उन्हें a Chinese guy with an Indian heart कहा गया है।

संजय मलकरअमेरिकन आइडल में इसी प्रकार एक भारतीय लड़का संजय मलकर बहुत आगे जाता रहा। उसे भी गायन के इलावा अन्य चीज़ों के कारण वोट मिलते रहे। पर उसे कभी भी ग़ैर अमरीकी या भारतीय कह कर नहीं पुकारा गया। अमरीका स्वयं को विश्व का मिक्सिंग बोउल मानता है, भारत भी एक प्रकार से दक्षिण एशिया का मिक्सिंग बोउल है, जहाँ विभिन्न प्रकार की संस्कृतियों का मिश्रण पाया जाता है। पर जहाँ कोई व्हाइट, ब्लैक, या पूर्वी एशियाई नैन-नक्श वाला दिखता है, वह बाहर का ही लगता है चाहे वह भारत के अतिरिक्त किसी देश को न जानता हो।

खैर इंडियन आइडल की बात की जाए। कल कौन बाहर होगा? अंकिता, ईमॉन, प्रशान्त या अमित? आप की क्या राय है?

Categories
उर्दू हिन्दी

उर्दू देवनागरी लिपियाँ – एक तुलनात्मक अध्ययन

[आज जुलाई का अन्तिम दिन है। यदि आज मैं यह प्रविष्टि नहीं लिखता तो इस चिट्ठे की पौने तीन वर्ष की आयु में पहला महीना ऐसा चला जाता जिस में कुछ भी न लिखा गया हो। अपने चिट्ठे को सुप्तावस्था से बाहर लाने की कोशिश है यह प्रविष्टि, जो मैं ने कुछ समय पहले आरंभ की थी और इसे अभी भी पूरा नहीं कर पाया हूँ।]

USA and Britain are called two nations divided by the same language. I think Hindi and Urdu remain the same language divided by a script.

अभय अग्रवाल के चिट्ठे से लिया यह उद्धरण मुझे बहुत सटीक लगा। उर्दू इतनी हसीन ज़बान है और इतनी अपनी लगती है, पर इस की लिपि ने इसे पराई कर दिया है। यह बात नहीं है कि उर्दू में प्रयुक्त नस्तालीक़ लिपि सीखी नहीं जा सकती, पर उसी ज़बान को लिखने के लिए जब हम देवनागरी जैसी लिपि का प्रयोग जानते हैं, तो उसी के लिए एक और लिपि सीखना मेहनत का काम तो है ही। हिन्दी वालों ने संस्कृत के शब्दों से और उर्दू वालों ने अरबी-फ़ारसी शब्दों से इस एक ही भाषा में जो दरार डाली है, उसे आम तौर पर हिन्दुस्तानी बोलने वालों ने सीधी-सादी भाषा बोल कर पाट दिया है। पर लिपियों की भिन्नता ने जो दरार डाली है, उसे पाटने के लिए बहुत मेहनत चाहिए।

जितना हिन्दी चिट्ठाजगत का कारवाँ बढ़ रहा है, उतनी तेज़ी से नस्तालीक़ में लिखे उर्दू चिट्ठे तो सामने नहीं आ रहे हैं, पर उर्दू में जितना भी लिखा जा रहा है, उसे पढ़ने की ललक हिन्दी चिट्ठाकारों और पाठकों में बढ़ती जा रही है। पिछले वर्ष मैं ने उर्दू में लिखे चिट्ठों पर एक नज़र डाली थी, और उम्मीद की थी कि इसे नियमित रूप से लिख पाऊँगा। पर जैसा इस चिट्ठे पर होता आया है, वही हुआ। महीने में कुल जमा दो-तीन पोस्ट लिखे जाते हैं, और वह भी बिना किसी प्लानिंग के। इस के इलावा भारत से उर्दू के कोई खास चिट्ठे भी सामने नहीं आए। शुऐब का उर्दू चिट्ठा نئی باتیں / نئی سوچ (नई बातें नई सोच) नियमित पढ़ता हूँ। इंडस्क्राइब का बेस्ट ग़ज़ल्स भी बढ़िया है पर वे यूनिकोड उर्दू न लिख कर ग़ज़लों को स्कैन कर के छापते हैं। हिन्दी चिट्ठाजगत में उर्दूदानों की संख्या बढ़ गई है, पर उर्दू चिट्ठाकारों की संख्या ज्यों की त्यों है।

इस बीच एक अच्छे इरादे से कोशिश हो रही है उर्दू-हिन्दी लिप्यन्तरण (ट्रान्सलिट्रेशन) सॉफ्टवेयर बनाने की। भोमियो के पीयूष, जो कि भारतीय लिपियों को आपस में परिवर्तित करने में बहुत सफल रहे हैं, अब प्रयत्न कर रहे हैं उर्दू से हिन्दी ट्रान्सलिट्रेशन की। जो अभी तक हासिल हुआ है, उस के बारे में यही कहा जा सकता है कि कुछ न होने से तो बेहतर है। कई लोग इस से उत्साहित हैं, पर इस मामले में मैने शुरू से जो टिप्पणियाँ दी हैं, वे बहुत अधिक उत्साहवर्धक नहीं रही हैं इस काम में लगे लोगों के लिए, या इस सॉफ्टवेयर का इन्तज़ार कर रहे लोगों के लिए। इसका कारण यह है कि मैं दोनों लिपियों को समझता हूँ और यह मानता हूँ कि उर्दू से हिन्दी (या उर्दू से रोमन) का सही लिप्यन्तरण लगभग असंभव है। जो लोग उत्साहित हैं वे उर्दू नहीं जानते। जो जानते हैं, उन्हें मालूम है कि मंजिल दूर है। अपनी इस राय के कारण को विस्तार से समझाने की कोशिश करूँगा इस पोस्ट में।

भारतीय लिपियों के बीच ट्रान्सलिट्रेशन बहुत सरल है। देवनागरी, गुरमुखी, गुजराती, बंगाली, तमिल आदि लिपियों की संरचना समान है, बस अक्षरों के आकार भिन्न हैं। इन सब लिपियों से रोमन में ट्रान्सलिट्रेशन भी सरल है, क्योंकि जो रोमन आप को हासिल होती है, वह अग्रेज़ी हिज्जों या नियमों की मोहताज नहीं है। इस सरलता ने हमारी उम्मीदें बढ़ा दी हैं, और अब हम बिना उर्दू सीखे ही उसे भी पढ़ना चाहते हैं। पर कल्पना कीजिए कि आप को अंग्रेज़ी से देवनागरी का ट्रान्सलिट्रेशन बनाने को कहा जाए। एक सीधे से वाक्य “George Bush is the President of United States of America” का लिप्यान्तरण बनेगा “गेओर्गे बुश इस थे प्रेसिदेन्त ओफ उनितेद स्ततेस ओफ अमेरिका”। यदि आप को इस तरह का लिप्यन्तरण चलता है तो फिर ठीक है। पर सही लिप्यन्तरण के लिए इस में ऐसे टूल डालने पड़ेंगे जो हर शब्द का ध्वन्यात्मक रूप खोजे और उसे फिर देवनागरी में लिपिबद्ध करे – यानी एक अंग्रेज़ी का टेक्स्ट-टू-वॉइस कन्वर्टर और हिन्दी का वॉइस-टू-टेक्सट कन्वर्टर। यूँ समझिए कि उर्दू की हालत इस से कई गुणा जटिल है। उर्दू में हर शब्द का क्या उच्चारण है यह इस बात पर निर्भर करता है कि सन्दर्भ क्या है। उदाहरण के लिए “क्या” और “किया” एक ही तरह से लिखा जाता है। “अस”, “इस” और “उस” एक ही तरीके से लिखा जाता है। पढ़ने वाला मज़मून के मुताबिक उसे सही पढ़ता है। यह उम्मीद कंप्यूटर से तो नहीं की जा सकती न?

आइए उर्दू लिपि की संरचना पर एक नज़र डालें (हिन्दुस्तानी भाषा की दृष्टि से – फारसी या अरबी की दृष्टि से नहीं), जो इस को आम कंप्यूटर की समझ से बाहर कर देते हैं।

1. उर्दू अक्षरमाला
उर्दू लिपि में 37 अक्षर हैं और कुछ चिह्न हैं, पर हिन्दुस्तानी की दृष्टि से कई ध्वनियाँ डुप्लिकेट हैं, और कई अक्षर हैं ही नहीं। दो “अ” हैं (अलिफ़ और ऐन), चार-पाँच “ज़” हैं (ज़े, ज़ाल, ज़ुआद, ज़ोए, और तीन बिन्दियों वाला रे), दो “त” हैं (ते और तोए), दो “स” हैं (से और सुआद)। इन सब में आपस में उच्चारण का कोई अन्तर नहीं है; शायद अरबी फ़ारसी में होता हो, उर्दू में नहीं है। पर नियमानुसार यह भी आवश्यक है कि अरबी फ़ारसी से आए शब्दों के लिए सही अक्षर का ही प्रयोग हो। मसलन यदि “मसलन” के लिए “से” का प्रयोग होता है तो “सुआद” या “सीन” का प्रयोग नहीं हो सकता (या इस का उल्टा)। “मसलन” के आखिर में जो न की ध्वनि है उस के लिए “नून” नहीं लिखा जाता पर “अलिफ़” के ऊपर दो लकीरें डाली जाती हैं, पता नहीं क्यों। ख, घ, छ, झ, आदि के लिए उर्दू में अक्षर नहीं है पर इन्हें क, ग, च, ज, आदि के साथ ह (दोचश्मी-हे) जोड़ कर लिखा जाता है। कीफ़-क़ाफ़, गाफ़-ग़ैन, आदि में कुछ उच्चारण का अन्तर है, जो हिन्दुस्तानी बोलने वाले आम तौर पर जानते हैं, पर हमेशा नहीं। देवनागरी में नुक़्ते वाले अक्षर क़, ग़ आदि इसी के लिए प्रयोग होते हैं।

2. स्वर/मात्राएँ
उर्दू लिपि में कुछ स्वरों के लिए अक्षरों का प्रयोग होता है (अलिफ़, ऐन, ये, वाव) और कुछ स्वरों के लिए ऊपर या नीचे लगाए जाने वाले चिह्न (ज़ेर, ज़बर, पेश)। पर जो चिह्न हैं, उन का प्रयोग बिल्कुल ऐच्छिक (optional) है, यानी लगाया तो लगाया, नहीं लगाया तो नहीं लगाया। आम तौर पर इन चिह्नों को नहीं ही लगाया जाता है। यही कारण है कि क+स लिखने पर यह पढ़ने वाले को स्वयं अन्दाज़ा लगाना है कि यह किस है, कस है या कुस। शब्द में जितने अधिक अक्षर होंगे उतनी संभावनाएँ बढ़ जाएँगी। क+स+न = कसन / किसन / कसिन / कुसन / कसुन / किसिन / कुसुन / कस्न / कुस्न / किस्न / क्सन। अब हमें तो मालूम है “किसन” होगा, पर कंप्यूटर बेचारे को क्या पता कहाँ पर कौन सी मात्रा लगानी है, या किस अक्षर को आधा कर के पढ़ना है।

व के लिए जो अक्षर प्रयोग होता है (वाव) वही ऊ, ओ और औ के लिए भी प्रयोग होता है। यानी कौल लिखेंगे तो उसे कौल, कोल, कवल, कूल कुछ भी पढ़ा जा सकता है।

य के लिए जो अक्षर प्रयोग होता है (नीचे दो बिन्दियाँ) वही ई, ए, ऐ के लिए भी प्रयोग होता है। यानी सेठ को सैठ, सेठ, सयठ, सीठ, कुछ भी पढ़ा जा सकता है।

3. ह का प्रयोग
जैसा मैं ने बताया ख, घ, छ, झ, आदि के लिए अक्षर नहीं है पर इन्हें क, ग, च, ज, आदि के साथ ह (दोचश्मी-हे) जोड़ कर लिखा जाता है। दो चश्मी हे को कई बार ह के लिए भी प्रयोग किया जाता है (शब्द के आरंभ में)। हे को अन्त में कई बार आ की ध्वनि के लिए प्रयोग किया जाता है – जैसे वग़ैरा/वग़ैरह, मुज़ाहिरा/मुज़ाहिरह, हमला/हमलह, इन सब के अन्त में अलिफ़ (आ) के स्थान पर हे (ह) आता है।

4. शब्दों के बीच स्थान
शब्दों के बीच अलग से स्थान छोड़ने का नियम नहीं है। पर अक्षरों को जोड़ने के जो नियम हैं, उन से एक शब्द के बीच ऐसे स्थान आ जाता है, कि वे दो शब्द लगते हैं। जैसे, क्या आप बता सकते हैं कि इस शेर की एक लाइन में कितने अल्फ़ाज़ (शब्द) हैं?
daagh dehlvi
कंप्यूटर के लिए भी यह समझना कठिन होगा कि कौन सा शब्द कहाँ आरंभ होता है और कहाँ समाप्त होता है। दोनों पंक्तियों के बीच जो बिन्दियाँ हैं, वे ऊपर के अक्षरों के साथ हैं, या नीचे के अक्षरों के साथ, यह समझना भी एक मशीन के लिए मुश्किल है। यानी, ओ.सी.आर. भी दिक्कत का काम है।

इस सब को देखते हुए मेरा यह मानना है कि उर्दू पढ़नी हो तो सब से सही तरीका है, उर्दू सीखो। अच्छी खबर यह है कि उर्दू सीखना मुश्किल नहीं है। फ़ुर्सत रही तो उर्दू को आसानी से सिखाने के लिए कुछ लेख भी लिखूँगा। दिल यह कहता है कि उर्दू को भी देवनागरी में लिखा जाए तो कितना ही अच्छा हो। पर उर्दू के ठेकेदारों को यह बात नागवार गुज़रनी है।

पीयूष ने अपने लिप्यन्तरण सॉफ्टवेयर पर उर्दूदानों की राय जानने के लिए उर्दू के यूज़नेट वाले ग्रुप में मदद मांगी थी, पर वहाँ बहस ऐसी छिड़ी और ऐसी मुड़ी कि नतीजा कुछ नहीं निकला।

Categories
तकनीकी

नेत्रहीनों को कंप्यूटर पढ़ कर सुना सकता है

मैं ने पिछली बार एक प्रविष्टि लिखी थी गूगल में काम करने वाले नेत्रहीन वेब-वैज्ञानिक डा. टी.वी. रामन के बारे में। तब डा. रामन ने गूगल के आधिकारिक ब्लॉग पर अपनी प्रविष्टि में यह बताया था कि वे किस प्रकार गूगल का प्रयोग किसी व्यक्तिवाचक संज्ञा के सही हिज्जे पता करने के लिए करते हैं।

गूगल ब्लॉग पर अपनी नई प्रविष्टि में डा. रामन ने एक और रोचक तकनीक के विषय में बताया है – कि OCR (Optical Character Recognition) और वाचक ब्राउज़र के मेल से कैसे नेत्रहीनों द्वारा किसी भी दस्तावेज़ को पढ़ा जा सकता है । वे कहते हैं कि “मैं बिना कागज़ की दुनिया में रहना पसन्द करता हूँ, और हर काग़ज़ के टुकड़े को स्कैन करता हूँ”। अभी तक वे व्यावसायिक रूप से उपलब्ध OCR सॉफ्टवेयर प्रयोग करते थे, पर अब उन्होंने स्वयं ही एक मुक्त तन्त्रांश वाला सॉफ्टवेयर ओसीआर-ओपस शुरू किया है। यह उन के वाचक ब्राउज़र ईमैकस्पीक से मिल कर नेत्रहीनों के लिए बढ़िया औज़ार तो बन ही गया है, पर हम जैसे लोग, जिन्हें दृष्टि प्राप्त है, भी इस का प्रयोग कर सकते हैं। ओसीआर-ओपस स्कैन हुए काग़ज़ को टेक्स्ट में बदलेगा और उस की html फाइल तैयार करेगा, और ईमैकस्पीक उसे पढ़ कर सुनाएगा।

पर हम हिन्दी वालों और अन्य भारतीय भाषाओं में काम करने वालों के लिए फिर वही प्रश्न है – हमारी भाषा में इतनी प्रगति कब होगी?

पुनश्च : यही प्रश्न मैं ने इस प्रविष्टि के अंग्रेज़ी संस्करण में पूछा था, और चूँकि उस का पिंगबैक डा. रामन की मूल प्रविष्टि पर गया, उसे उन्होंने भी पढ़ा और मेरी प्रविष्टि पर टिप्पणी के रूप में उन्होंने उत्तर भी दिया। यहाँ पढ़ें

Categories
तकनीकी

क्या आप वर्डप्रेस का अनुवाद कर रहे हैं

इस विषय पर यदि चिट्ठाजगत में पहले ही किसी ने सूचना दी हो तो क्षमा करें। आज कई दिनों बाद चिट्ठा लिख रहा हूँ। पिछले दिनों से व्यस्तता के कारण नियमित रूप से चिट्ठे पढ़ भी नहीं पा रहा हूँ, हालाँकि उठ रहे भूचाल से अनभिज्ञ भी नहीं हूँ।

कल ही याहू-ग्रुप्स के हिन्दी फोरम पर वी.एस.रावत जी का सन्देश देखा जिस से पता चला कि वर्डप्रेस.कॉम वाले अपने इंटरफेस का अनुवाद स्वयंसेवी आधार पर करा रहे हैं। इस साइट पर जाएँ, अपने वर्डप्रेस.कॉम प्रयोक्ता नाम और कूटशब्द से लॉग-इन करें, भाषा चुनें और शुरू हो जाएँ। इस में हिन्दी के अतिरिक्त अन्य कई भारतीय भाषाएँ हैं – اردو , मराठी, অসমীয়া, বাংলা, ਪੰਜਾਬੀ, ગુજરાતી, தமிழ், తెలుగు, ಕನ್ನಡ, മലയാളം, कश्मीरी, सिन्धी।

Translate WordPress

पहली नज़र में तो ऐसा लगता है अधिक संख्या भारतीय भाषाओं की ही है। तो आइए, इस अनुवाद में हाथ बटाएँ। आप को जो भाषा आती हो उस में शुरू हो जाइए। मैं ने हिन्दी, कश्मीरी और उर्दू में अनुवाद शुरू कर दिया है। बस यह ध्यान रखें कि जो अनुवाद करें उसे जाँच परख कर ही सबमिट करें – और यदि वर्तनी और आधिकारिक भाषा पर पकड़ हो तभी यह कार्य करें। इस से पहले गूगल ग्रुप्स का जो अनुवाद हुआ था, वह बहुत अधकचरा था, अब जा कर कुछ ठीक हुआ है।

यह अनुवाद वर्डप्रेस.ऑर्ग से डाउनलोड होने वाले वर्डप्रेस के अनुवाद से अलग है। उस का अनुवाद हि.मो फाइल के द्वारा किया गया था, जिसे हम लोगों ने 2004 में मिल कर पूरा कर लिया था। उस में भी एक बार फिर काम करने की आवश्यकता है, क्यों कि पिछले दो-तीन वर्षों में काफी कुछ जुड़ गया है।

संबन्धित सूचना – याहूग्रुप हिन्दी फोरम के सदस्य बनने के लिए यहाँ क्लिक करें, या Hindi-Forum-subscribe@yahoogroups.com पर एक ईमेल भेजें।

Categories
विविध

एक चिट्ठाकार मिलन कैनाडा में

कल परसों मुझे सौभाग्य प्राप्त हुआ 2006 के सर्वश्रेष्ठ उदीयमान चिट्ठाकार (तरकश सम्मान प्राप्त) और इंडीब्लॉगीज़-2006 के सर्वोत्तम हिन्दी ब्लॉगर से मिलने का। जी हाँ, टोरोंटो की अपनी संक्षिप्त यात्रा के दौरान, मुझे उड़नतश्तरी की स्वर्ण-कलम के पीछे छिपे स्वर्णिम व्यक्तित्व के स्वामी समीर लाल जी से और उन के परिवार से उन के घर पर मिलने का मौका मिला।

कैनाडा जाने का कार्यक्रम अचानक बन गया था। मुझे और मेरी पत्नी को किसी ज़रूरी काम से वहाँ जाना पड़ा। तय हुआ कि सोमवार को यहाँ से ड्राइव कर के जाएँगे और मंगल को वापस आएँगे। कुल मिला कर 1800 किलोमीटर के करीब का सफर। कुल ड्राइविंग समय 18 घंटे। यह मेरे लिए सब से थकाने वाली यात्राओं में से था। पहले यह सफर दर्जनों बार कर चुका हूँ, पर वहाँ पहुँच कर एकाध दिन रुकना होता था। एक तरफ की यात्रा लगभग 900 किलोमीटर है, और इस बार वहाँ रात को रुकना था, सुबह उठकर एक दफ्तर में जा कर काम भी करना था, और वापसी की यात्रा भी करनी थी। इस बीच में ऐसा लग रहा था कि सब से मिल भी नहीं पाएँगे, शायद सभी काम भी न हो पाएँ। पर जैसे तैसे सब निबटाया और वापसी यात्रा आरंभ करने से पहले समीर जी से भी मिल लिए।

समीर लाल से मिल कर ऐसा नहीं लगा कि पहली बार मिल रहा हूँ। उन के लेखन से परिचित होने के कारण उन के व्यक्तित्व की भी एक झलक बनी हुई थी, और उन के चित्रों से उन्हें पहचानने में भी दिक्कत नहीं आनी थी। शायद अनजाने में भी बाज़ार आदि में मिल जाते तो मैं पहचान लेता। फिर एक विशेष आत्मीयता से भरा व्यक्तित्व और हिन्दी चिट्ठाकारी का अपनत्व। यह बात शायद ही किसी और रिश्ते में हो सकती है।

समीर लाल और रमण कौल

मैं उन चिट्ठाकारों के बारे में सोच रहा था जिन से मैं मिल चुका हूँ, और मेरा ध्यान इस बात की ओर गया कि वे लोग इंडीब्लॉगीज़ से किसी न किसी तरह से जुड़े हुए हैं। यह मेरा सौभाग्य ही समझिए कि मेरा पहला मिलन (जो कि हिन्दी चिट्ठाकारी का भी पहला मिलन था) इंडीब्लॉगीज़-2004 के विजेता अतुल अरोरा से हुआ। पिछले वर्ष पुणे की यात्रा के दौरान इंडीब्लॉगीज़-2005 के विजेता शशि सिंह से भेंट होते होते रह गई। उन से बस फोन पर बात हो पाई, और दूसरे विजेता अनूप शुक्ला से भी फोन पर ही बात हो पाई थी। पर उस की भरपाई की थी पुणे में इंडीब्लॉगीज़ के रचयिता देबाशीष से मुलाकात कर के। और अब 2006 के विजेता समीर लाल जी। 2007 के विजेता कृपया आगे आएँ। हमें अगली विज़िट प्लान करनी है।

Categories
तकनीकी विदेश विविध

टी.वी.रामन – आँखें खोल देने वाला व्यक्तित्व

इंटरनेट पर, किसे मालूम है कि आप एक कुत्ता नहीं हो। या फिर यह कि आप फिर वही कुत्ता नहीं हो।

यदि आप को मेरा अनुवाद समझ में नहीं आया, तो यह रहा टी.वी. रमण रामन का मूल कथन

On the Internet, no one knows you aren’t a dog! Nor even if you are still the same dog!

जी हाँ, अमरीका के प्रतिष्ठित कॉर्नेल विश्वविद्यालय से पी.एच.डी. की उपाधि प्राप्त टी.वी.रमण रामन ने सोर्सफोर्ज पर अपने वेबपृष्ठ पर यही लिखा है। दरअसल टी.वी. रमण रामन की दिनचर्या में श्वानवंश की प्राणी हबल का अच्छा खासा योगदान है। रमण रामन नेत्रहीन हैं, और उन की उपलब्धियाँ मुझ जैसे लाखों आँखों वालों को शर्मिन्दा कर देंगीं।

हाल ही में डा. रमण रामन के बारे में तब पता चला जब गूगल ब्लॉग पर उन की यह प्रविष्टि दिखी। इस में वे गूगल के एक अनूठे इस्तमाल के बारे में बता रहे हैं – यदि आप को किसी शब्द, विशेषकर व्यक्तिवाचक संज्ञा (स्थान आदि का नाम) के हिज्जों में कन्फ्यूजन है तो उसे गूगल पर खोज कर देखें। वे आजकल गूगल में काम करते हैं, और इंटरनेट को नेत्रहीन लोगों के लिए सुलभ बनाने के कार्य में जुटे हुए हैं। उन की यह प्रविष्टि भी पढ़िए जिस में वे बताते हैं कि नेत्रहीन लोगों के लिए उन का गूगल खोज इंजन कैसे उन वेब पृष्ठों को प्राथमिकता देता है जिन पर चित्र कम हैं, और इस कारण उन्हें नेत्रहीनों द्वारा प्रयुक्त वाचक यन्त्र द्वारा सरलता से पढ़ा जा सकेगा।

डा. रमण रामन ब्लॉगिंग समुदाय के सक्रिय सदस्य हैं, और जैसा उन के ब्लॉगर प्रोफाइल से मालूम होता है, वे कई तकनीकी चिट्ठों के मालिक हैं।

Image source http://emacspeak.sourceforge.net/raman/वेब सुलभता (नेत्रहीनों के लिए) के विषय पर अपने साक्षात्कार में डा. रमण रामन अपनी सर्च इंजन तकनीक के बारे में और काफी जानकारी देते हैं। अपने बारे में पूछे जाने पर वे संक्षेप में बताते हैं – “ज़रूर, http://emacspeak.sf.net/raman”। और वहाँ जाने पर उन के काम की और जानकारी मिलती है। उन के रिज़मे से पता चलता है कि उन्होंने पुणे विश्वविद्यालय से गणित में स्नातन के बाद आइ.आइ.टी. मुंबई से कंप्यूटर विज्ञान में स्नातकोत्तर शिक्षा प्राप्त की है, और फिर कॉर्नेल से एम.एस. और पी.एच.डी.।

ज़ाहिर है, नेत्रहीनों के कंप्यूटर में मॉनीटर का कोई काम नहीं है। उन के प्रोग्राम और वेबपृष्ठ दिखते नहीं, बोलते हैं। शब्दों की प्राथमिकता है, चित्रों की नहीं। क्या निकट भविष्य में हिन्दी के लिए ऐसा काम हो सकेगा? जब टी.वी.रमण रामन की प्रविष्टियों पर इस प्रविष्टि का पिंगबैक आएगा, तो क्या वे इसे “पढ़” पाएँगे?

मेरे लिए ऐसे व्यक्ति बड़ी प्रेरणा के स्रोत होते हैं, जो कठिनाइयों के बावजूद अपने लिए जगह बनाते हैं, न कि वे जो शिकायतों में ही सारी ज़िन्दगी निकाल देते हैं। टी.वी.रमण रामन को मेरा शत् शत् नमन।

जिन लोगों को दक्षिण भारतीय नामों की पहचान हो क्या वे बता सकेंगे कि क्या सही उच्चारण रमण है, या रामन्?

Categories
तकनीकी

गूगल डेस्कटॉप अब हिन्दी में

गूगल डेस्कटॉप का नवीनतम संस्करण (ver. 5) अब 29 भाषाओं में है, और इस में पहली बार हिन्दी को भी जोड़ा गया है। समाचार यहाँ पर पढ़े


Categories
विविध

जापानी में भारत-आधारित चिट्ठे

कुछ दिन पहले मुझे अपने चिट्ठे के हिट-काउंटर पर दिखा कि मेरी परिणीता फिल्म पर लिखी प्रविष्टि पर कोई पाठक जापानी साइट से आया है। वहाँ देख कर अच्छा लगा कि कई चिट्ठे जापानी भाषा में ऐसे लिखे जा रहे हैं जो भारत पर आधारित हैं। यह चिट्ठे भारतीयों के हैं या जापानियों के यह स्पष्ट नहीं हो पाया। पर यह है बानगी जापानी में लिखे जा रहे भारतीय चिट्ठों की।

Mishty days

Arukakat Kahkashan

Nakajima Miyabi

Exblog