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नुक़्ते की बात

नुक़्ताचीं है ग़मे दिल उस को सुनाए न बने
क्या बने बात जहाँ बात बनाए न बने।

जो लोग उर्दू शायरी के शौकीन नहीं हैं, उन के लिए ग़ालिब के इस शेर की थोड़ी सी व्याख्या (मेरी समझ से) –

नुक़्ताचीं = नुक़्ताचीनी या आलोचना करने वाला। वह नुक्ताचीं है (हर बात पर आलोचना करता है), इस कारण उसे दिल का ग़म सुनाते नहीं बनता। अब जहाँ बात बनाते (करते) नहीं बनती वहाँ अपनी बात कैसे बन सकती है? शाब्दिक अर्थ तो मैं ने बता दिया। अब इस से गहरी विवेचना आप स्वयं सोच सकते हैं। वह कौन है? बात क्या है?

हरेक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है
तुम्हीं कहो कि ये अन्दाज़े गुफ़्तगू क्या है।

न, यह लेख शेरो-शायरी के बारे में नहीं है। मेरा यह लेख काफी समय से ओवरड्यू है, सही हिन्दी शृंख्ला शृंखला के अन्तर्गत। पिछली बार चन्द्रबिन्दु और अनुस्वार के नियम बताए गए थे, और वादा हुआ था कि अगली बार नुक़्ते के सही प्रयोग की बात होगी। तो लीजिए पेश है नुक़्ते की बात।

पहली बात यह समझने की है कि मूल हिन्दी भाषा में नुक़्ते का (या नुक्ते का?) कोई काम नहीं है। मूल भारतीय हिन्दी भाषा में ऐसे शब्द हैं ही नहीं जिन के लिए नुक़्ते का प्रयोग ज़रूरी हो, क्षमा करें, जरूरी हो। देवनागरी लिपि नुक़्ते के बिना ही हिन्दी के हर अक्षर, हर ध्वनि को लिखने में सक्षम है। हाँ इस में जब अरबी-फारसी (उर्दू के द्वारे) या अंग्रेज़ी के शब्द जोड़े गए, और उन का सही उच्चारण करने की ज़रूरत महसूस हुई तो उन के लिए नुक़्ता प्रयोग में लाया गया।

यह कैसे पता चले कि कहाँ पर नुक़्ता प्रयोग करना है और कहाँ पर नहीं। दुर्भाग्यवश, इस का जवाब चन्द्रबिन्दु और अनुस्वार जैसा आसान नहीं है – क्योंकि इस पर देवनागरी के सरल नियम लागू नहीं होते। इस के लिए या तो अंग्रेज़ी या उर्दू लिपि में मूल वर्तनी देखनी पड़ती है, या शब्द का मूल भाषा में एकदम सही उच्चारण मालूम होना चाहिए। अंग्रेज़ी की रोमन लिपि तो आम तौर पर सभी को आती है, पर उर्दू की नस्तालीक़ लिपि के बारे में ऐसा नहीं कहा जा सकता। पर सौभाग्यवश, ग़लती न हो इस का एक सरल उपाय है – वह यह कि हिन्दी लिखते हुए जहाँ संदेह हो, वहाँ नुक़्ते का प्रयोग न करें – क्योंकि हिन्दी में तो नुक़्ता होता ही नहीं। भई हम गजल, जरूरत, जिन्दगी बोलते हैं तो वही तो लिखेंगे न? हाँ कई जगह नुक़्ते का प्रयोग जरूरी, क्षमा करें ज़रूरी, हो जाता है, यदि हम मूल भाषा का वाक्य उद्धृत कर रहे हों, किसी का नाम लिख रहे हों, आदि। जैसे – अज़हर ने कहा, “ही इज़ ए गुड बैट्समैन।” इस में ज़ की जगह ज नहीं चलेगा। यह भी ध्यान दें कि यदि हम नुक़्ते का प्रयोग कर रहे हैं तो हम यह बता रहे हैं कि हमें मालूम है कि यहाँ पर नुक़्ता प्रयोग होगा – इसलिए बेहतर है कि हमें वाक़ई यह मालूम हो।

नुक़्ता जिन अक्षरों में प्रयोग होता है, वे हैं – क़, ख़, ग़, फ़, और ज़। यह सब उर्दू से आए हैं, केवल ज़ ऐसी ध्वनि है जो अंग्रेज़ी में भी पाई जाती है। ड और ढ के नीचे आने वाले बिन्दु (ड़, ढ़) अलग हैं, वे विदेशी शब्दों को इंगित नहीं करते और उन से उच्चारण में आने वाला अन्तर हिन्दी भाषियों को भली भान्ति मालूम है। आइए देखें क़, ख़, ग़, फ़, और ज़ के उदाहरण।

क़ – उर्दू वर्णमाला में काफ़ (ک) और क़ाफ़ (ق) दो अलग वर्ण हैं, और दोनों के उच्चारण में अन्तर है। क़ की ध्वनि को फोनेटिक्स की भाषा में voiceless uvular stop कहा जाता है। रोमन लिपि में उर्दू लिखते हुए इस के लिए q का प्रयोग होता है, जबकि क के लिए k का। पर यह केवल सुविधा के लिए किया गया है – अंग्रेज़ी में q और k के बीच ऐसा कोई अन्तर नहीं है, और जहाँ तक मेरी जानकारी है, अंग्रेज़ी में क़ाफ वाली कोई ध्वनि नहीं है। पर फिर भी यदि आप किसी उर्दू शब्द के अंग्रेज़ी हिज्जों में q का प्रयोग देखते हैं तो आप उसे हिन्दी में लिखते हुए क़ का प्रयोग कर सकते हैं। उदाहरण – नुक़्ता, क़रीब, क़ायदा, क़ैफ़ियत जैसे शब्दों में नुक़्ता प्रयोग होगा, जबकि किनारा, किताब, मुल्क, इनकार जैसे शब्दों में नहीं होगा (सुनें)।

ख़ – उर्दू वर्णमाला में ख की ध्वनि के लिए काफ़ के साथ दो-चश्मी-हे (ھ) को जोड़ा जाता है (ک + ھ = کھ) , यानी क के साथ ह को जोड़ कर ख बनता है – शायद इसलिए कि अरबी फारसी में ख की ध्वनि नहीं होती, पर ख़ (voiceless uvular fricative) के लिए अलग वर्ण है जिसे ख़े कहते हैं। रोमन लिपि में मैं ने इस के लिए कोई विशेष वर्ण मानक रूप में प्रयोग होते नहीं देखा। उदाहरण – ख़रीद, ख़ारिज, ख़ैबर, अख़बार (ख़बर, मुख़बिर), ख़ास, कुतुबख़ाना (पुस्तकालय) आदि में नुक़्ता प्रयोग होगा। बिना नुक़्ते के ख वाले शब्द अरबी-फारसी से नहीं हैं, इस कारण देसी शब्दों के लिए ख और अरबी-फारसी शब्दों के लिए ख़ का प्रयोग करें, जैसे खाना-ख़ज़ाना (सुनें)।

ग़ – यहाँ अन्तर है गाफ़ (گ) और ग़ैन (غ) का। यहाँ भी अंग्रेज़ी स्पेलिंग से कोई मदद नहीं मिल पाएगी, हाँ कई बार ग़ैन के लिए gh का प्रयोग होता है जैसे ghazal (ग़ज़ल)। पर इस का घ से भी कन्फ्यूजन हो सकता है, इस कारण उच्चारण का अन्तर, या फिर उर्दू के हिज्जे पता होने चाहिएँ। उदाहरण – ग़रीब, ग़ायब, मग़रिब (पश्चिम), ग़ुस्सा, आदि में ग़ प्रयोग होगा, और अलग, अगर, गिरह, गिरेबान में ग (सुनें)।

फ़ – अरबी-फ़ारसी लिपि में फ की कमी प+ह=फ (پ +ھ = پھ) के द्वारा पूरी की जाती है, और फ़ के लिए फ़े (ف) का प्रयोग होता है। अंग्रेज़ी में उर्दू शब्द लिखते हुए फ के लिए ph और फ़ के लिए f का प्रयोग होता है। पर मुझे नहीं लगता अंग्रेज़ी भाषा में ph और f के बीच कोई अन्तर है। इस कारण मुझे नहीं लगता कि f वाले अंग्रेज़ी शब्दों (file, format, foot) के लिए नुक़्ते के प्रयोग की आवश्यकता है। हाँ, उर्दू के शब्दों के उदाहरण हैं – फ़रमाइश, फ़रिश्ता, काफ़िर, आदि। फ वाले शब्द देसी हैं, इस कारण हिन्दी शब्दों (फिर, फल, फागुन) के लिए फ, और उर्दू शब्द यदि अरबी-फ़ारसी से आया है, तो उस के लिए फ़ का प्रयोग करें (सुनें)।

ज़ – मेरे विचार में हिन्दी भाषियों के लिए ज़ की ध्वनि पहचानना सब से आसान है, क्योंकि इस की ध्वनि ज से काफी भिन्न है। यहाँ पर नुक़्ते का ग़लत प्रयोग बहुत खटकता है। अन्तर है j और z का। उर्दू में चार ऐसे वर्ण हैं जिन से ज़ की आवाज़ आती है – ज़ाल (ذ), ज़े (ز), ज़ुआद (ض), ज़ोए (ظ), और एक वर्ण जिस से ज की आवाज़ आती है, जीम (ج)। कई हिन्दी भाषी उत्साह में (लिखने या बोलने में) वहाँ भी ज़ की आवाज़ निकालते हैं जहाँ ज की आवाज़ आनी चाहिए – जैसे जलील की जगह ज़लील, मजाल की जगह मज़ाल, जाहिल की जगह ज़ाहिल, आदि। ऐसी ग़लती से बचना चाहिए, क्योंकि इस से शब्द का अर्थ ही बदल सकता है – जैसे, मैं दुल्हन को सज़ा (सजा) दूँगी। ऐसे में फिर वही नुस्ख़ा दोहराऊँगा – जब सन्देह हो तो नुक़्ते से बचें। नुक़्ता न लगाने का बहाना है, पर ग़लत जगह लगाने का नहीं है। ज और ज़ के कुछ और उदाहरण – ज़रूर, ज़ुल्म, जुर्म, राज़ (रहस्य), सज़ा, ज़बरदस्त, जमील, जलाल, वजूद, ज़ंजीर, मिज़ाज, ज़्यादा, जज़ीरा (द्वीप) आदि (सुनें)।

उर्दू की लिपि की इन विसंगतियों को देखते हुए आप को यह नहीं लगता कि उर्दू वालों को भी देवनागरी अपनानी चाहिए? मैं तो ऐसा ही मानता हूँ, पर चलिए उस के बारे में फिर कभी बात करते हैं। इस लेख, यानी नुक़्ते की बात, पर आप के ख़्यालात मुख़्तलिफ़ हों, या आप कोई नुक़्ताचीनी करना चाहते हों तो टिप्पणियों के डिब्बे का प्रयोग करें।

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मनोरंजन

बिग बॉस

यह प्रविष्टि मैं बुद्धवार की शाम को शुरू कर रहा हूँ और अभी कुछ देर में सोनी टीवी पर बिग बॉस शुरू हो रहा है। तब तक मैं यह प्रविष्टि लिख लेता हूँ। जी हाँ, मैं यह रियलिटी शो नियमित रूप से देखता हूँ। कहने में थोड़ी शर्म आ रही है, क्योंकि यह अक्लमन्दों की कसौटी पर खरा नहीं उतरता। कई बार यह शो वाहियात और बोरिंग ज़रूर हो जाता है, पर आम तौर पर भारतीय टेलीविजन के लिए यह प्रयोग अपने आप मे अनूठा है, बेशक यह अमरीका के बिग ब्रदर की नकल हो।



यह शो शुरू हुआ तेरह नीम-मशहूर हस्तियों से, जिन्हें एक घर में इकट्ठे कैद रहना है। हर हफ्ते एक प्रतियोगी ने बाहर जाना है – और जीतने वाला व्यक्ति वहाँ तेरह सप्ताह तक रहेगा/गी। नीम-मशहूर इसलिए कि मशहूर हस्तियाँ तो तेरह हफ्ते का समय नहीं निकाल पाएँगी, न ही बिना क्रीम पाउडर वाला चेहरा-मोहरा दुनिया को दिखाने की हिम्मत कर पाएँगी। इन सब के पास खोने को बहुत कुछ नहीं है, हाँ इस शो से मिली मशहूरी से कुछ पा ज़रूर लें। शुरू में जो सितारे बिग बॉस के घर में आए, उन में से कुछ ही नाम थे जो पहचाने हुए थे वे भी कुछ पुराने से – अनुपमा वर्मा, राहुल रॉय, दीपक पाराशर, सलिल अंकोला, कश्मीरा शाह। बॉबी डार्लिंग का चेहरा देखा था, नाम अब सुना। राखी सावन्त का नाम सुना था, चेहरा अब देखा। कैरल ग्रेसियास, रूपाली गांगुली, रवि किशन, अमित साध, आर्यन वैद, रागिनी शेट्टी के नाम पहली बार सुने, चेहरे पहली बार देखे। पहले हफ्ते के बाद ही सलिल अंकोला को एकता कपूर के मुकदमे के कारण शो से बाहर जाना पड़ा, और उस का स्थान दीपक तिजोरी ने ले लिया। उस के इलावा आज तक चार लोग बाहर जा चुके हैं। बाकी लोगों की हालत खराब है, और सभी किस तरह से एक दूसरे को काटने में लगे हुए हैं, और किस तरह बाहर की दुनिया के रिश्तों की परवाह न कर के नए रिश्ते जोड़ने में भी लगे हुए हैं, वह देखने योग्य है। शो के विषय में कुछ बातें

  • इंटरनेट पर खोज करने पर पता चला कि दर्जनों साइटें इस शो के ऊपर बनी हैं, दो आधिकारिक साइटें तो हैं ही, उस के अतिरिक्त biggboss.in, biggboss.org, आदि साइटें इस शो की रोज़ाना खबर देती रहती हैं। यहाँ तक कि लोकतेज वालों ने इस पर हिन्दी में एक विशेष चिट्ठा शुरू किया है। नारद जी, सुन रहे हैं न? वैसे अपने हिन्दी ब्ल़ॉगजगत में इस के विषय में जो इकलौती प्रविष्टि लिखी गई थी उस में इस शो से दूर ही रहने की सलाह दी गई थी।
  • शो के कुछ नियम हैं। हर प्रतियोगी को हर समय माइक पहन कर रहना है, जो चालू रहना चाहिए – सोने के समय को छोड़ कर। घर में लगे तीस कैमरे इन की हर हरकत को देखते रहेंगे (बाथरूम को छोड़ कर), और इन तीस कैमरों की 24×7 फीड को संपादित कर के हफ्ते में पाँच घंटे टीवी पर दिखाया जाएगा।

  • इस घर में कोई बाहरी मनोरंजन नहीं है। टीवी, अखबार, फोन, रेडियो, संगीत, कुछ भी नहीं। इस घर को छोड़ कर कोई तब तक बाहर नहीं आ सकता जब तक जनता उसे मतदान द्वारा बाहर न कर दे।

  • हर प्रतियोगी को केवल हिन्दी में ही बात करनी पड़ेगी, जो कि कुछ लड़कियों के लिए बहुत मुश्किल काम है – जैसे कैरल, रागिनी, अनुपमा। हालाँकि सब कोशिश करते हैं हिन्दी बोलने की, पर फिर भी “मातृभाषा” अंग्रेज़ी सब के मुँह से फूट ही जाती है — और उन को इस के लिए चेतावनियाँ भी मिल चुकी हैं बिग बॉस से। सब से मज़ेदार हिन्दी कैरल और रागिनी बोलती हैं, जो दोनों दक्षिण भारत से हैं।

  • कई चीज़ें देख कर शक होता है कि यह रियलिटी शो कितना रियल है। हर सप्ताह प्रतियोगियों के नामांकनों के आधार पर बाहर होने वाले दो या अधिक प्रतियोगियों की शॉर्ट लिस्ट बनाई जाती है। फिर जनता के एस.एम.एस. के आधार पर उन में से एक को बाहर किया जाता है। अब प्रतियोगियों के जेंडर पर नज़र डाली जाए। शुरू में तेरह में से छः पुरुष थे, छः महिलाएँ, और एक बॉबी डार्लिंग, जो स्वयं को पुरुष के शरीर में नारी समझता है। यानी साढ़े छः – साढ़े छः का बटवारा। मतदान के द्वारा सब से पहले बाहर जाने वाले बॉबी डार्लिंग ही थे, और अब तक दो महिलाएँ और दो पुरुष और जा चुके हैं। क्या यह सन्तुलन एक संयोग है, या आयोजकों द्वारा रखा गया है ताकि स्कैंडल पनपने की पूरी संभावना रहे — आखिरकार तभी तो लोगों की शो में रुचि रहेगी। बिग ब्रदर में तो अब तक बहुत कांड हो गए होते। इस समय एक पुरुष (आर्यन) और एक महिला (कैरल) नामांकित हैं, जिन में से जनता एक को बाहर जाने के लिए चुनेगी।

  • कहा गया है कि जीतने वाले को पचास लाख रुपये मिलेंगे। पर कहा यह भी जा रहा है कि भोजपुरी स्टार रवि किशन को केवल साइऩ करने के ही चालीस लाख मिले हैं, और हर हफ्ते शो पर रहने के चार लाख मिल रहे हैं। शो पर ऐसे काम तो उन्होंने काफी किए हैं कि बीवी को जवाब देना पड़े, पर शायद यह कहने से काम चलाएँगे – डार्लिंग, वह तो सब एक्टिंग थी।

    इन नीम हस्तियों को झाड़ू लगाते हुए, रोटियाँ बेलते हुए, लड़ते झगड़ते हुए, रोते हुए, धोते हुए, छल कपट करते हुए देखना है तो यह शो अवश्य देखें।