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उर्दू ब्लॉगजगत की एक बानगी

अभी तक हिन्दी ब्लॉगजगत में हम लोग कोशिश करते रहे हैं कि विवादास्पद विषयों से दूर रहें। पर जैसे जैसे ब्लॉगरों की संख्या बढ़ रही है, विषयों का क्षितिज भी बढ़ रहा है। ऐसे में शुऐब ने अपनी मज़हब से बेज़ारगी ज़ाहिर कर के काफ़ी साहस का परिचय दिया। उन्होंने यह भी बताया कि अपने उर्दू ब्लॉग पर उन्हें काफ़ी बुरा भला सुनना पड़ा है, इसलिए मैं उन का उर्दू ब्लॉग पढ़ने लगा और वहाँ की गई टिप्पणियाँ। कड़ी से कड़ी मिली और टिप्पणी-लेखकों के भी चिट्ठे देखे। वहाँ एक नई ही दुनिया देखी, जिस का एक छोटा सा नमूना यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ।

कार्टून विवाद के विषय पर शुऐब की एक प्रविष्टि जज़बात से छेड़छाड़ से नाराज़ हो कर परदेसी भाई ने एक प्रविष्टि लिखी है, शुऐब का ब्लॉग और उस के नज़रियात। इस तरह की प्रविष्टि के लिए उन्होंने एक अलग श्रेणी बनाई है, “कैसे मुसलमान”। परदेसी लिखते हैं

मोहतरम दोस्तो, अभी अभी अपने एडिटर पर मैं ने शुऐब की तरफ़ से की गई एक पुरानी ख़बर का हवाला, जो कि हुज़ूर सुल्ल अलहि वआलिहि वसल्लम की शान में इन्तहाई गुस्ताख़ी में शामिल है, को तहरीर होते देखा है, जो कि शुऐब ने जान बूझ कर तहरीर किया है। शुऐब के इस्लाम के मुतअलिक़ ख़यालात और इफ़कार इन्तहाई गुस्ताख़ाना हैं। उस के ब्लॉग पर जा-ब-जा इस का सबूत मौजूद है। मैं अपने तमाम मोहतरम दोस्तों से यह गुज़ारिश करता हूँ कि शुऐब को उर्दू की महफ़िल से निकाल दिया जाए और इस की उर्दू सयारा पर तहरीरों को आने से रोक दिया जाए।

शुऐब की उस प्रविष्टि और उस पर की गई टिप्पणियों से लगता है कि शायद उन्होंने उस प्रविष्टि में कार्टूनों की ख़बर देते हुए कार्टून भी छाप दिए थे और बाद में हटा दिए थे। ऐसे तनाव भरे माहौल में यह शायद अक्ल का काम न रहा हो। पर यह तब की बात है जब बाकी दुनिया शायद कार्टूनों के बारे में जानती भी नहीं थी। खैर, जबकि बाकी टिप्पणीकारों ने भी शुऐब के खिलाफ़ लिखा है, दानियाल ने उन का साथ दिया है। वे परदेसी के फतवे का जवाब यूँ देते हैं

मैं आप की तहरीर से बिल्कुल इत्तफ़ाक़ नहीं करता। पहली बात तो यह है कि शुऐब ने अपनी पोस्ट में कोई गुस्ताख़ी नहीं की, बल्कि एक ख़बर सुनाई है। दूसरी बात उर्दू प्लैनेट और उर्दू सयारा पर इस्लामी जम्हूरिया पाकिस्तान का कानून नाफ़िज़ नहीं होता। आप को ऐसी फ़रमाइश करते हुए मोहतात रहना चाहिए क्योंकि उर्दू वेब अभी नया है, और हम शुरू में ही ऐसे लोग नहीं देखना चाहेंगे जो आज़ादी-ए-इज़हार पर क़दग़न लगाने की बातें करते हों। अगर आप को अपने नेक ख़यालात के इज़हार करने की इजाज़त है तो शुऐब को भी अपने इफ़क़ारो-ख़यालात के इज़हार की पूरी आज़ादी है। मुझे अफ़सोस है कि मैंने आप की यह शर्मनाक पोस्ट पढ़ी और उस से भी ज़्यादा अफ़सोस इस बात पर है कि मुझे इस पोस्ट पर कमेंट भी करना पड़ा।

ग्रीन ब्रिगेड के एक और सदस्य हैं उर्दूदाँ, हाल में लिखी उन की एक प्रविष्टि है अहानते-रसूल। वे लिखते हैं

अहानत के पसपर्दा कारफ़र्मा ज़ेहनियत [अपमान के पीछे छिपी मानसिकता]
हज़रत इब्राहिम की दो औलादों में से हज़रत इसमाइल जिन की वालिदा बीबी हाजिरा थीं, इसी सिलसिले से हज़रत मुहम्मद सलअम [?] हैं। लेकिन हज़रात मूसा व ईसा का हज़रत इसाक़ के सिलसिले से था जिन की वालिदा सारा हैं। यही एक वजह नज़र आती है कि यहूद व नसरा [?] में इत्तफ़ाक़ (यहूदियों के हाथों हज़रत ईसा के क़त्ल के बावजूद) पाया जाता है। लिहाज़ा यह उन के भेदभाव की एक जीती जागती मिसाल है। अगला पैग़म्बर उन्हीं की “आला” (कमज़र्फ़) नस्ल से आना था, जो उन की सिर्फ़ ख़ाम ख़याली ही नहीं है, बल्कि यह उन की इजारादाराना [monopolistic] ज़ेहनियत की निशानदेही करता है।

ईसाइयों ने हमेशा अपनी गन्दी ज़ेहनियत का मुज़ाहिरा किया है
* जब रश्दी ने अपने हरामज़ादा होने का सबूत पेश किया तो वह उन की आँखों का तारा बन गया। चे मानी दारद? किस ग़लती का बदला लिया गया था? मुसलमानों ने क्या किया था उन के “ख़ुदाज़ाद ख़ुदा” की शान में? और किस मुसलमान को हम ने उन के इस ख़ुदा की ख़ुदाई पर उंगली उठाने पर दाद दी थी?
* रूस पर कभी जम्हूरियत की ख़ातिर चढ़ाई नहीं की गई। वाह क्या भाईचारगी है! जम्हूरियत ईसाइयत के सामने दुम दबा कर रह गई।

और दोग़लेपन ने तो लाजवाब कर दिया
सवाल यह उठ रहा है कि “निस्फ़ फ़ी हज़ार” एहतिजाजी मुज़ाहिरीन मुश्तअल क्यों हुए [0.05% प्रदर्शनकर्त्ता हिंसक क्यों हुए]?

हालाँकि सवाल यह होने चाहिएँ कि
कार्टून क्यों बने?
क्यों छापे गए? (गलती का इमकान नहीं , बुश के आगे ग़लती से सही लफ़्ज़ “दहशतगर्द” क्यों नहीं लग जाता!)
फ़ौरन माफ़ी क्यों नहीं माँगी गई? (मक़सद तमाशा बनाना था, और यह भी देखना था कि बेदाम ग़ुलामात कैसी हिमायत करते हैं)
अगर माफ़ी नहीं तो सज़ा क्यों नहीं दी गई? (सोची समझी साज़िश थी, ईसाई हरामज़ादों की जो बड़े चिकने बने फिरते हैं, अपने ग़ुलामों में।)
अगर सज़ा नहीं तो पश्तपनाही का मतलब साफ़ है।

और तो और
यह कहा गया कि “हम ने तो अपने पैग़म्बर के ऐसे कितने ही ख़ाके बरदाश्त किए हैं”
* बनाने और बरदाश्त करने वाले भी तुम। हम तो कभी ऐसी ओछी हरकत की न करवाई।
* तुम तो अपने गिरजाओं में बुतपरस्ती करते हो, हम नहीं करते।
* तुम अगर कुत्ते को अपना बाप बनाते हो तो उस का यह मतलब नहीं हो जाता कि तुम मेरे बाप को कुत्ता कहो।

सच है, जिस तरह मशरिक वाले सिर्फ़ जूते की ज़बान समझते हैं और जो अब्बा सलाम करते हैं, उसी तरह मग़रिब वाले सिर्फ़ पैसे की।

अन्त में शुऐब की एक प्रविष्टि दावते-इफ़्तार और समन्दर का छोटा सा अंश। इस पर भी काफ़ी नाराज़गी ज़ाहिर हुई है।

आज बरोज़ मंगल यहाँ रमज़ान का पहला दिन है, सुबह आफिस में दाखिल होते ही सब एक दूसरे को सवालिया नज़रों से देख रहे थे जैसे पूछ रहे हों, रोज़े में हो? अभी अपनी चेयर पर बैठे कंप्यूटर ऑन किया, एक हिन्दू साथी ने आकर मुबारकबाद दी, “Happy Ramadan”. इस के बाद सब एक दूसरे को रमज़ान की मुबारकबादियाँ देना शुरू कर दीं। तकरीबन आधा घंटा यूँ ही रमज़ान की टाइमिंग और अहकामात पर डिस्कस शुरू हो गया कि अचानक बॉस नमूदार हुआ तो सब ख़ामोशी से मामूल के कामोकाज में जुट गए। सुबह के ग्यारह बजते ही मेरे पेट में चूहे दौड़ना शुरू हो गए। ऑफिस में मौजूद दोनों किचन छान मारा, न चाय, न कोल्ड ड्रिंक्स। बाहर आया तो होटल रेस्टोरंट्स सब बन्द थे। पता नहीं आज क्यों इतनी भूख लग रही थी, जैसे दो दिन से कुछ खाया नहीं।

अब मैं टाइप करते करते थक गया हूँ। शुऐब की हिन्दी प्रविष्टि की टिप्पणियों में ज़िक्र हुआ था किसी ऐसे सॉफ्टवेयर की ज़रूरत का जो उर्दू से हिन्दी में लिप्यान्तरण कर सके। दरअसल ऐसे सॉफ्टवेयर का विकास चल रहा था, पर लगता है बीच रास्ते रुक गया। यह चर्चा देखें। रावत जी से संपर्क करने की कोशिश की पर सफल नहीं हुआ। किसी और को इस विषय में अधिक सूचना हो तो बताएँ।

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मेरा रेडियो पृष्ठ

बात मेरी इस प्रविष्टि के साथ शुरू हुई। मैं ने दो तीन इंटरनेट रेडियो स्टेशनों के लिंक दे कर यह प्रविष्टि लिखी, और टिप्पणियों में दो चार और लिंक मिले। इन से मेरी रेडियो पर हिन्दी गाने सुनने की ज़रूरत काफी हद तक पूरी हो गई। साथ ही इंटरनेट पर मैं और स्टेशन खोजता रहा। कड़ी से कड़ी मिली और मेरे पास १६ स्टेशनों की सूची तैयार हो गई — स्मैश-हिट्स जैसे नहीं, जहाँ विज्ञापनों की भरमार हो, पर ऐसे जो सीधे विंडोज़ मीडिया प्लेयर या रियल प्लेयर पर सुने जा सकते हैं। ऑंस्ट्रेलिया, न्यूज़ीलैंड, दुबई, हॉलैंड, इंगलैंड, जाने कहाँ कहाँ से यह स्टेशन प्रसारित होते हैं। इन सब स्टेशनों के जालपृष्ठों और ऑडियो फीडों को एकत्रित कर मैं ने एक अलग पृष्ठ बना लिया है। मेरे विचार में यह भारत से बाहर रहने वाले मुझ जैसे रेडियो के शौकीनों के लिए काफी लाभदायक होगा — विशेषकर जिन के पास ब्रॉडबैंड इंटरनेट कनेक्शन है। इस के अतिरिक्त कुछ ऐसे स्टेशन मिले जो भुगतान करने पर ही रेडियो सुनाते हैं, या बहुत अधिक पॉप-अप विज्ञापन देते हैं — ऐसे स्टेशन मैं ने इस सूची में नहीं डाले।

१६ संगीतमय मनोरंजक स्टेशनों के इलावा ७ खबरों के स्टेशन भी हैं, और कुछ ऐसे स्टेशन जहाँ २४ घंटे तो नहीं पर विभिन्न समयों पर हिन्दी संगीत के कार्यक्रम आते हैं। आशा है कि और सूचना प्राप्त होने पर मैं इस सूची को बढ़ाता रहूँगा। अपने रेडियो पृष्ठ को मैं ने ऊपर मुख्य मेन्यू में भी जोड़ दिया है। आप भी आनन्द उठाएँ।

अँग्रेज़ी प्रविष्टि

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परदेस का तोहफा

बेचारे शुऐब परेशान हैं। दुबई से भारत जा रहे हैं, और रिश्तेदारों की माँगें हैं — यह ले कर आओ वह ले कर आओ। शुऐब कहते हैं

चंद लोग दुबई को जन्नत समझते हैं कि यहां पैसों की बारिश होती है। यहां लोग मुम्बई कि तरह रात दिन पसीना बहाते हैं तब जाकर थोडे पैसे मिलते हैं। 

इस बात पर मुझे हाल में सुनी एक रेडियो रिपोर्ट याद आई, जो बुश की भारत यात्रा के अवसर पर यहाँ NPR पर आई थी। सन्दीप रॉय, जो सैन-फ्रैंसिस्को में पत्रकार हैं, को शायद पैसे की चिन्ता न हो — पर यह चिन्ता है कि भारत लेकर जाएँ तो क्या लेकर जाएँ। वहाँ सब कुछ तो मिलता है, और शायद यहाँ से बेहतर भी और सस्ता भी। सन्दीप की रिपोर्ट उन्हीं की ज़बानी सुनिए (सन्दीप रॉय की रिपोर्ट३:५८ मिनट), काफी रोचक है।

सन्दीप रॉय की रिपोर्ट NPR के ड्राइववे-मोमेंट्स में आई है। रेडियो सुनने का मौका आम तौर पर कार में ही मिलता है — दफ़्तर से घर या घर से दफ़्तर के सफ़र में। और जब आप कोई रोचक रिपोर्ट सुनते-सुनते घर (या दफ़्तर) पहुँच जाते हैं, ड्राइववे (या पार्किंग) में गाड़ी खड़ी करते हैं, और तब तक गाड़ी से निकलने का दिल नहीं करता जब तक रिपोर्ट ख़त्म न हो। इसे कहते हैं NPR की भाषा में ड्राइववे-मोमेंट।

अपने लिए तो दोनों समस्याएँ रहती हैं — शुऐब वाली भी और सन्दीप वाली भी। इस के इलावा, अब ऐसा लगता है कि भारत में हर किसी की नज़र बड़ी हो गई है। हज़ारों की चीज़ हो तो उस की कोई बिसात ही नहीं है। और जैसा सन्दीप रॉय ने अपनी रिपोर्ट में बताया, अब न परदेसी की पहले वाली कद्र है, न परदेस की चीज़ की। हम यहाँ एक डॉलर की जो कद्र करते हैं, वह मुझे नहीं लगता भारत में पचास के नोट की होती है। यहाँ न दुकानदार एक सेंट छोड़ता है न ग्राहक, जबकि भारत में सिक्कों की तो पूछ ही नही है।

क्या इस सब को भारत की (मध्यम वर्ग की) समृद्धि का ही सूचक माना जाए?

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मुंशी प्रेमचन्द की कहानियाँ

कड़ी : प्रेमचन्द की कहानियाँ

सी-डॅक की साइट पर अनेकों ई-पुस्तकें उपलब्ध हैं। इन में से मेरी मनपसन्द हैं मुंशी प्रेमचन्द की कहानियों वाली ई-पुस्तकें। यह ई-पुस्तकें वर्ड फाइलों के रूप में उपलब्ध हैं और हर फाइल में ३ से ६ कहानियाँ हैं। सीडॅक ने यह बहुत उत्कृष्ट काम किया है। पर इन्हें पढ़ने और खोजने में मुझे कुछ दिक्कत होती रही है — एक तो वर्ड में खोलने पर अक्षरों के बीच में बहुत ज़्यादा जगह दिखती है (हाँ वर्डपैड में बढ़िया पढ़ी जाती हैं)। दूसरे यह खोजना पड़ता है कि कौन सी कहानी किस फाइल में है और कहाँ पर है। इस समस्या का समाधान करने के लिए मैं काफी समय से सोच रहा था कि इन को ऍचटीऍमऍल में रूपान्तरित करूँ, पर शुरू करने पर भी यह काम अधूरा छूटा हुआ था। अब ब्लॉगस्पॉट ने काम और आसान कर दिया। पिछले हफ़्ते से लग कर मैं ने इन सौ से ऊपर कहानियों को ब्लॉगस्पॉट पर चढ़ा दिया, ताकि सब लोग हिन्दी के महान कहानीकार मुंशी प्रेमचन्द की कहानियों का आनन्द ले सकें। अभी कुछ काम बाकी है — कुछ कहानियाँ अपलोड करनी बाकी हैं, और कई जगह पर वर्तनी की त्रुटियाँ हैं, उन को ठीक करना है। उम्मीद है इस हफ्ते में यह काम भी पूरा हो जाएगा। तो आनन्द लीजिए प्रेमचन्द की कहानियों का।

अपनी राय इस प्रविष्टि पर टिप्पणी के रूप में दें।

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ऑडियो-ब्लॉगिंग का नया तरीका

आज रा॰ च॰ मिश्र के ब्लॉग पर लिखी ऑडियो-प्रविष्टि से ऑडियो-ब्लॉगिंग का नया तरीका पता चला। न माइक्रोफोन की ज़रूरत, न ऑडियो सॉफ्टवेयर की और न वेबस्पेस की। ब्लॉगर का नया प्रकल्प है ऑडियो ब्लागर — अपना खाता खोलिए, या अगर पहले से ब्लॉगर खाता है, तो उसे प्रयोग कीजिए, उन्हें एक टेलीफोन नम्बर दीजिए एक कोड चुनिए, बस। अब 415-856-0205 पर फोन कर के अपनी प्रविष्टि रिकार्ड कीजिए — हो गया। ऑडियो ब्लागर आप की आवाज़ की MP3 फाइल बना कर आप के चुने हुए ब्लॉगर ब्लॉग पर डाल देगा। समय सीमा है पाँच मिनट, पर अभी तक फोन नम्बर केवल यूऍसए में है। परन्तु ऑडियो-ब्लॉगर का कहना है कि वे हर ऐसी जगह नम्बर दे देंगे जहाँ से माँग आएगी। तो फिर किस बात की देर है? भारतवासियो, लिखो ब्लॉगर को। खैर मैं ने ब्लॉगर पर इस के लिए एक खाली चिट्ठा तो बना दिया, पर वहाँ से MP3 फाइल की लिंक उठा कर मैं यहाँ भी पोस्ट कर सकता हूँ। तो लीजिए सुनिए (अवधि 77 सेकंड)।

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पेश हैं दो और टाइपराइटर

जब हिन्दी इंटरनेट की दुनिया का कोई नया बाशिन्दा यह सवाल पूछता है कि हिन्दी कैसे लिखें, तो सब का अलग अलग जवाब होता है – कोई कहता है, बरह प्रयोग करो, कोई यूनिनागरी, कोई हग, कोई छहरी, तो कोई IME। मेरा यह सोचना रहा है कि इंटरनेट पर देवनागरी के टाइपराइटर ज़्यादा होने की बजाय कम होने चाहिएँ, बढ़िया होने चाहिएँ, और ज़्यादा लोग एक ही टाइपराइटर प्रयोग करने चाहिएँ। इस से मानकीकरण होगा,  लोगों के पूछने पर एक सा जवाब दिया जाएगा, और उसी एक टाइपराइटर का ज़्यादा विकास होगा। अब तक बहुत अलग अलग तरीके आज़माने के बाद मैं इस नतीजे पर पहुँचा हूँ कि ऍडिटर बेहतरीन है IME (विंडोज़ पर) और कीबोर्ड बेहतरीन है इन्स्क्रिप्ट।

पर फिर भी अपने ही उसूल को ताक पर रख कर मैं अपनी साइट पर दो और ऍडिटर रिलीज़ करने का ऐलान कर रहा हूँ।

पहला तो खैर हिन्दी का है ही नहीं, इसलिए कोई बात नहीं। यह है गुरमुखी का ऍडिटर – यूनिमुखी। नईं जी, मैंनू पंजाबी नईं आन्दी.. मतलब इन्नी ही आन्दी है। पर हाँ, श्रीनगर से दिल्ली के बीच पंजाब से गुज़रते हुए, गुरमुखी की कुछ कुछ पहचान हो गई है — और उतनी ही पहचान बाङ्ला और गुजराती लिपियों की भी है — वैसे भी देवनागरी से तो मिलती जुलती हैं ही यह लिपियाँ। रजनीश ने चिट्ठाकार समूह पर गुरमुखी ऍडिटर की बात छेड़ी तो मैं ने कहा मैं कोशिश करता हूँ। बस ऍलनवुड की साइट से गुरमुखी और देवनागरी के कोड ले कर एक तुलनात्मक सारणी बना ली और उस से यूनिनागरी से यूनिमुखी बना लिया।

दूसरा  ऍडिटर तो, क्षमा कीजिए, देवनागरी का ही है। और इस का कारण है मेरा इन्स्क्रिप्ट के प्रति जागा नया प्रेम — जिस के लिए ज़िम्मेवार हैं रवि रतलामी। तो पेश है यूनिस्क्रिप्ट। मेरे विचार से इस के दो लाभ हैं — एक तो जो लोग इन्स्क्रिप्ट के आदी हैं, वे साइबरकैफे आदि में इसे ऑनलाइन प्रयोग कर सकते हैं। दूसरे, यदि कोई इन्स्क्रिप्ट पर टच टाइपिंग सीखना चाहते हैं तो मैं ने इस में कीबोर्ड पर विभिन्न रंगों के द्वारा यह दिखाया है कि कौन सी उंगली कहाँ रखनी है, और उस से कौन से अक्षर टाइप होंगे।

आप लोगों की प्रतिक्रिया और सुझावों का इन्तज़ार रहेगा।

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देसी रेडियो

Update: see http://radio.kaulonline.com/
आज रवि रतलामी भारत में वर्ल्डस्पेस रेडियो की बात कर रहे थे। मैं परदेस में देसी रेडियो की बात कर रहा हूँ।

मुझे रेडियो पर गाने सुनने में जो मज़ा आता है, वह सीडी या टेप पर सुनने में नहीं आता। रेडियो पर उत्सुकता रहती है कि अगला गाना कौन सा आएगा, और जब कोई पुराना या मनपसन्द गाना आता है तो बहुत खुशी होती है। जब से भारत छोड़ा है, तब से देसी रेडियो की बड़ी याद आती है।

यहाँ जिन इलाकों में देसी लोगों की आबादी काफी होती है, वहाँ अक्सर कुछ घंटों के लिए ही सही, पर भारतीय रेडियो सुनने को मिलता है। इन रेडियो कार्यक्रमों का स्तर आम तौर पर बहुत घटिया होता है। टोरॉण्टो, कैनडा में कुछ देर रहने पर मेरा यही अनुभव रहा। एक चैनल तो एक माँ-बाप-बेटा-बेटी का परिवार चलाता है, और लगभग हर कार्यक्रम वही प्रस्तुत करते हैं। अक्सर कार्यक्रमों में स्थानीय देसी व्यापारियों को इंटरव्यू के नाम पर बुलाया जाता है, और उन के माल या सेवाओं का विज्ञापन होता है। बीच बीच में फिल्मी गीत सुनाए जाते हैं। खैर ये लोग भी क्या करें, इन्हें भी पैसा कमाना है, पर कभी कभी इन कार्यक्रमों की गुणवत्ता-हीनता पर खीझ होती है। टोरॉण्टो में भारतीय कार्यक्रमों में मुझे सब से अच्छे लगते थे वेस्ट इंडीज़ से आए भारतीय मूल के लोगों द्वारा चलाए गए कार्यक्रम।

यहाँ मेरीलैंड में जिस क्षेत्र में मैं रहता हूँ, वहाँ कोई देसी रेडियो उपलब्ध नहीं है। इस कारण मैं काफी समय से खोज में हूँ किसी इंटरनेट रेडियो की — ऐसा जहाँ पॉप-अप विज्ञापन न हों या कम हों, और नए पुराने गाने चलते रहें। इस खोज के दौरान मिली एक माइक भाई की साइट, जिन्होंने सूची बना रखी है दुनिया भर के ऐसे रेडियो स्टेशनों की जो इंटरनेट पर प्रसारण करते हैं। दक्षिण और पूर्व एशिया की सूची में भारत का कहीं नाम नहीं है। अब आकाशवाणी से तो उम्मीद कर नहीं सकते कि लगातार अपने कार्यक्रम वेबकास्ट करे। सिंगापोर का एक स्टेशन है, जो ठीक से चलता नहीं है। मध्य-पूर्व के स्टेशनों में संयुक्त अरब अमीरात का सिटी १०१.६ है, जो अच्छा है। इस के इलावा यूरोप, अमरीका और अफ्रीका की सूचियों में भी कई स्टेशन हैं जो भारतीय संगीत बजाते हैं। गूगल से खोजने पर एक और इंटरनेट रेडियो स्टेशन मिला जिस का नाम तो बकवास है, पर काम बढ़िया करता है। बस एक बार साइन-अप करना पड़ता है। वैसे आकाशवाणी का पुराना यूआरएल भी वहीं ले जाता है।

जब तक कोई और सुझाव मिले या भारत का कोई स्टेशन वेबकास्ट करने लगे, तब तक मैं रेडियो बकवास पर गाने सुन रहा हूँ।