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हम समन्दर के अन्दर चले

बंटी और बबली फिल्म में एक गाना है

छोटे छोटे शहरों से, खाली भोर दुपहरों से, हम तो झोला उठा के चले।
बारिश कम कम लगती है, नदिया मद्धम लगती है, हम समन्दर के अन्दर चले।

पिछले दिनों लगता है बड़ा शहर मुम्बई वास्तव में समन्दर के अन्दर चला गया। मुम्बई और आसपास के इलाकों में ४३० ५०० से अधिक लोग मर चुके हैं। २६ जुलाई की रात को सारा यातायात बन्द होने के कारण जो जहाँ जाना चाहता था, वह वहाँ न पहुँच सका। इन हालात में एक पत्रकार ने हीरो के साथ गुज़ारी बरसात की रात, और एक महिला पत्रकार रात भर चलती रहीं। बहुत ही रोचक संस्मरण हैं। पढें।

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ये वर्ल्ड है ना वर्ल्ड..

ये वर्ल्ड है ना वर्ल्ड, इस में दो तरह के लोग रहते हैं, एक वह जिन्होंने बंटी और बबली नहीं देखी, और दूसरे वह जिन्होंने देखी है। आज हम “दूसरे” लोगों में शामिल हुए। कई दिनों से पड़ौस की देसी वीडियो दुकान के चक्कर लग रहे थे, अब जा कर मिली है। फिल्म के गाने तो पहले ही सुन सुन कर याद हो गये थे। गुलज़ार के गीत असाधारण हैं। “ये ज़मीं पानियों में डुबकियाँ ले रही है, देखना उठ के पैरों पे चलने लगे ना कहीं…”। फिल्म का एक प्रोमो गीत, जो एक अँग्रेज़ी रैप गाने की शक्ल में है और अमिताभ बच्चन पर फिल्माया गया है, भी अच्छा है। यह फिल्म में तो नहीं है, पर यहाँ पर देखा-सुना जा सकता है।

समीक्षा तो नहीं लिखूँगा, क्योंकि पहले ही बहुत सारी लिखी गई हैं, पर यह कहूँगा हल्के फुल्के मनोरंजन के लिए ज़रूर देखो।

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वर्डप्रेस वाले चाट खा रहे हैं

हमारे चिट्ठाकार मिलनों के बाद बात हो रही है, ब्लॉग सॉफ्टवेयर रचयिताओं के मिलन की, और वह भी चाट के साथ। वर्डप्रेस के मुख्य रचयिता हैं मैट मुलेनवैग और रायन बोरेन। रायन रहते हैं डलस, टैक्सस में और मैट रहते हैं हज़ारों मील दूर सैन-फ्रैंसिस्को, कैलिफोर्निया में। दोनों ने सालों से वर्डप्रेस पर इकट्ठे काम किया, पर अभी तक मिले नहीं थे। पिछले हफ्ते, मैट ने लिखा

खबर है कि लाजवाब रायन इस हफ्ते उत्तरी कैलिफोर्निया आ रहे हैं और यह बढ़िया मौका है वर्डप्रेस की बैठक करने का। हालाँकि रायन वर्डप्रेस के दूसरे मुख्य डेवलपर हैं, और हम काफी समय से साथ काम कर रहे हैं, हम आमने सामने कभी नहीं मिले, और यह एक तरह से ऐतिहासिक मौका होगा। रात का खाना होगा चाट कैफे पर शनिवार ६ बजे, इस पते पर ….

रायन ने भी अपने ब्लॉग पर इस मिलन की घोषणा की, और बताया कि किस प्रकार वे भेलपूरी, आम की लस्सी और पुदीने की चटनी के साथ विश्व निर्माण करने जा रहे हैं।

बाद में इस मिलन के चित्र भी छपे हैं।

लगता है सॉफ्टवेयर की दुनिया पर अब देसी लोगों के इलावा देसी भोजन का भी हमला हो रहा है।

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इस प्रविष्टि को अँग्रेज़ी में पढें।

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आओ तो सही

लोग मेरे चिट्ठे पर इस को ढ़ूँढ़ते पहुँचेंगे, मुझे अन्दाज़ा न था। पर, ऐसा हुआ है, स्टैटकाउंटर ने बताया। और वह भी जीतू भाई के एक कमेंट की बदौलत। कोई बात नहीं, आओ तो सही, चाहे जिस बहाने आओ।

वैसे यह गनीमत है कि मेरा चिट्ठा इस अनूठी गूगल खोज के चौथे पन्ने पर है। मुझ से पहले अपनी बात, मेरा पन्ना (पुराना), नुक्ताचीनी, फुरसतिया, हाँ भाई, आदि हैं।

अंजन भूषण जी ने इस मुद्दे पर साल भर पहले यह लिखा है।

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रघुबीर “टालमटोल” गोयल

क्या आप ने इंडिया ग्लोब नामक अखबार का नाम सुना है? मैं ने भी नहीं। पर इंडिया ग्लोब नामक अखबार के पत्रकार श्री रघुबीर गोयल व्हाइट हाउस की हर प्रेस ब्रीफिंग में सामने की पंक्तियों में बैठते हैं और मौका मिलते ही सवाल दाग़ते हैं अमरीका की भारत नीति पर, या पाकिस्तान के बारे में, या फिर ऐसे किसी भी मुद्दे के बारे में जो आम भारतीयों के दिमाग़ को तो कचोटते हैं पर अमरीकियों के लिए कोई विशेष अर्थ नहीं रखते, खासकर जब कार्ल रोव या ईराक युद्ध जैसे मुद्दे चल रहे हों । कहने वाले कहते हैं कि इंडिया ग्लोब कोई चार पन्नों का अखबार है जिसे शायद गोयल साहब ही लिखते हैं, वही छापते हैं, और शायद वही पढ़ते हैं। उन्हें सही जवाब मिलते हैं या नहीं? यह पता नहीं। उन्हें गंभीरता से लिया जाता है या नहीं? शायद नहीं। पर पिछले कुछ दिनों से रघुवीर गोयल चिट्ठासंसार में मशहूर हो गए हैं

पिछले हफ्ते दफ्तर से घर जाते हुए मैं एक गैस स्टेशन पर रुक कर अपनी गाड़ी में गैस (पैट्रोल) ड़ाल रहा था, कि गाड़ी के अन्दर से रेड़ियो पर खालिस देसी अंग्रेज़ी सुनाई दी। जल्दी से निबट कर गाड़ी में बैठा और रिपोर्ट सुनी। रिपोर्ट थी रघुबीर गोयल, यानी “गोयल द फोयल” के बारे में। फोयल (foil) उन को इसलिए कहा जाता है कि उन का इस्तेमाल उन के सवालों का जवाब देने के बदले औरों के सवालों को foil करने (टालने) के लिए किया जाता है। होता यूँ है कि जब स्काट मैक-क्लेलन, जो व्हाइट हाउस के प्रेस सेक्रेटरी हैं प्रेस कान्फ्रेन्स दे रहे होते हैं और किसी पेचीदा मसले पर उन की धुनाई हो रही होती है, तो वे गोयल साहब को आमन्त्रित करते हैं सवाल पूछने के लिए, “Go ahead, Goyal.” गोयल साहब कुछ इस तरह का सवाल पूछते हैं, “ओसामा बिन लादेन पाकिस्तान में बैठा हुआ है। इस के बारे में सरकार क्या कर रही है?”, या फिर, “The question is that — what are we expecting on Monday Prime Minister of India Dr. Manmohan Singh comes here to the White House, guest of the President? Can you lay it down a little bit?” इस का मुझ से अनुवाद नहीं हो पाया, पर स्कॉट शायद समझ जाते हैं, और एक लम्बा सा जवाब देते हैं, कम से कम कार्ल रोव का मुद्दा तो टल गया।

ऐसी बात नहीं है कि प्रेस सेक्रेटरी को बचाने वाले केवल अपने गोयल साहब ही हैं, वाशिंगटन पोस्ट की जनवरी २००२ की रिपोर्ट के अनुसार, ऐसे कम से कम चार पाँच पत्रकार और हैं जिन का प्रयोग इस संवाददाता सम्मेलनों में टालमटोल के लिए होता है। और यह प्रथा चली आ रही है क्लिंटन के प्रेस सेक्रेटरी माइक मैक-करी के समय से। और गोयल साहब लगता है तब से लगे हुए हैं।

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निरन्तर का जुलाई अंक

निरन्तर का जुलाई अंक हस्बे-मामूल (as usual) भारतीय समय के अनुसार महीने के पहले दिन का सूर्य उगने से पहले उदित हुआ है। निरन्तर के पूरे दल ने लगन से पूरा महीना काम किया और अन्त में देबाशीष ने पूरे मसौदे का समन्वय किया। निरन्तर के दल का सदस्य होने के नाते जो कुछ सृजनात्मक कार्य करने का अवसर मिलता है, उस से तो मैं स्वयं को भाग्यशाली समझता ही हूँ, इस के अतिरिक्‍त मुझे एक और लाभ यह होता है कि मैं निरन्तर में छपने वाले हर लेख, हर कहानी, हर कविता को अक्षरशः पढ़ता हूँ। हर लेख से कुछ न कुछ नया जानता हूँ, कुछ न कुछ नया समझता हूँ। उदाहरणतः नियमित स्तंभ “कड़ी की झड़ी” को ही लीजिए। जाने कहाँ कहाँ से हुसैन कड़ियाँ ढूँढ लाते हैं, हर कड़ी रोचक और ज्ञानवर्धक होती है। इसी प्रकार फुरसतिया, आँखन देखी, समस्या पूर्त्ति, आदि हर स्तंभ में कुछ नया मिलता है।

जुलाई अंक में विशेष
– आमुख कथा में गोरेपन की क्रीमें और विज्ञापन कैसे बनते हैं
– निधि में सरकारी हिन्दी पैकेज की आलोचना, और वर्डप्रेस और फायरफॉक्स पर लेख
– वातायन में देबाशीष, उमेश शर्मा, प्रेम पीयूष की कविताएँ और रवि का व्यंग्य और पुस्तक समीक्षा

और भी बहुत कुछ है निरन्तर के जुलाई अंक में – नज़रिया, हास परिहास, चिट्ठा चर्चा, उन के श्रीमुख से, आबो-हवा, और इस बार तो नई महफिल जमी है निरन्तर पर, और वह है महफिल-ए-मिर्ज़ा। पढ़िए निरन्तर और दोस्तों को भी बताइए।