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वर्डप्रेस का नया संस्करण

वर्डप्रेस का नया संस्करण १.५.१.३ उपलब्ध हो गया है। सामान्यतः मैं नए संस्करण को स्थापित करने में जल्दी नहीं करता जब तक उस में उपस्थित किसी विशेष गुण की सूचना न हो। पर इस बार वर्डप्रेस वाले कह रहे हैं कि उन के पुराने संस्करण में कोई सुरक्षा सम्बन्धी नुक्स है जिस के कारण प्रयोक्ताओं को नया संस्करण शीघ्र स्थापित कर लेना चाहिए, या फिर कम से कम xmlrpc.php नाम की फाइल को अपनी वर्डप्रेस डाइरेक्ट्री से हटा देना चाहिए। मैं ने अपने हिन्दी और अँग्रेज़ी दोनों चिट्ठों को अपग्रेड कर दिया है। यदि आप का चिट्ठा वर्डप्रेस पर है तो आप भी कर लें। करना बस यूँ है

  • वर्डप्रेस का नया संस्करण यहाँ से डाउनलोड करें।
  • डाउनलोड की हुई फाइलों को अनज़िप कर के अपने सर्वर पर चढ़ा दें। पुरानी फाइलों को ओवरराइट कर दें, सिवाय उन के जो आप ने स्वयं बदली हैं।
  • अब अपने सर्वर की /wp-admin/upgrade.php फाइल को अपने ब्राउज़र में चला दें। बस हो गया।

यदि आप वर्डप्रेस प्रयोग नहीं कर रहे हैं, और इस के बारे में और जानना चाहते हैं, तो निरन्तर का जून अँक पढ़ें जो कि वर्डप्रेस विशेषाँक है।

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ज़बरदस्त सर्च ज़बासर्च

यदि आप अमरीका में रहते हैं और ज़बासर्च जैसी साइट पर कभी गए हैं तो आप अपना नाम बदल कर ईस्वामी रख लेंगे, या फिर कालीचरण गायतोन्दे। समस्या यह है कि आप की लगभग हर सूचना पब्लिक प्रापर्टी है, और कभी कभी डर लगता है यह देख कर।

कई साल पहले मेरी भारत से बाहर पहली यात्रा थी और वह थी जर्मनी में। वहाँ मेरे जर्मन सहकर्मी को मुझ से यह सुन कर अजीब लगा कि हमारे देश में कोई राष्ठ्रीय परिचय क्रमांक या नेश्नल आइडेंटिफिकेशन नम्बर नहीं है। उस ने कहा कि यदि आप राह चलते कोई जुर्म करते हैं तो आप की खोजबीन कैसे हो पाएगी। मैं ने सोचा नम्बर से खोजबीन का क्या काम? उसके बाद के सालों में भारत में वोटर आइ-कार्ड जैसे मुद्दे उठे, गैर कानूनी बंगलादेशियों पर बहसे हुईं। लगा कि शायद किसी तरह का पहचान नम्बर होना सही है।

यह नम्बर आप का कैसे हिसाब रख सकता है, यह तब जाना जब यहाँ आकर सोशल सिक्योरिटी नम्बर लिया। यूँ तो सोशल सिक्योरिटी नम्बर का उद्देश्य है आप से कुछ कर इकट्ठे करना और बुढ़ापे में कुछ सुरक्षा प्रदान करना। परन्तु यह नम्बर हर जगह चाहिए होता है। इस के बग़ैर आप ड्राइविंग लाइसैंस नहीं ले सकते, नौकरी नहीं कर सकते, क्रेडिट कार्ड नहीं ले सकते, इलाज नहीं करा सकते, घर नहीं खरीद सकते, धन्धा नहीं कर सकते, लोन नहीं ले सकते। और इसी नम्बर के बल पर आप का सारा कच्चा चिट्ठा हासिल किया जा सकता है। मान लीजिए आप एक दुकान में जा रहे हैं और एक सेल्ज़मैन आप से क्रेडिट कार्ड लेने को कह रहा है। आप मान जाते हैं और एक फॉर्म भरते हैं, जहाँ X लिखा है वहाँ दस्तखत करते हैं, जिस के ऊपर छोटे अक्षरों में लिखा है कि आप उसे इजाज़त देते हैं आप का क्रेडिट चैक करने की। पलक झपकते वह पता कर लेगा आप अपना बिजली का बिल सही समय पर देते हैं या नहीं, आप कभी दिवालिया तो नहीं हुए हैं। इसी तरह, यदि आप को सड़क पर गाड़ी थोड़ी सी तेज़ चलाने के चक्कर में रोका जाता है, तो पुलिस वाला आप को शायद हल्की सी चेतावनी देकर पाँच मिनट में जाने दे पर उन पाँच मिनटों में उस ने पता कर लिया होगा कि आप देश में अनधिकृत रूप से तो नहीं हैं, पहले आप का कभी जुर्माना तो नहीं हुआ है, आदि।

सूचना स्वतन्त्रता के चलते आप बहुत सारी सूचना जो सार्वजनिक है, आसानी से पाने के हकदार हो जाते हैं। पहले यह सूचना पाने के लिए आप या तो किसी लाइब्रेरी में जाते, या फिर सम्बन्धित विभाग को लिखते, या फिर डाइरेक्ट्री वग़ैरा देखते। अब इंटरनेट के चलते यह सब पलक झपकते हो जाता है। आप को अलग अलग सूचना प्राप्त करने के लिए अलग अलग साइटों पर जाना पड़ता था, पर ज़बासर्च जैसी साइटें सारी सूचना एक जगह पर दे देती हैं और उस से भी अधिक सूचना दे देती हैं पैसा देने पर। इस साइट पर आप किसी का भी नाम डाल दीजिए, यह उस का पता, फोन नम्बर, उसके घर के आसपास का सेटेलाइट फोटो, आदि ढूँढ निकालेगा। और यदि आप पैसा देते हैं तो उस का बैकग्राउंड चैक। यानी २० डालर में २० साल बन्दा कहाँ कहाँ रहा है, आज के और पुराने फोन नम्बर, कोई कोर्ट कचहरी हुई है तो वह, करीबी रिश्तेदारों, रूम-मेटों, पडौसियों के नाम। क्या इस सूचना ओवरडोज़ की कोई सीमा है?

आज देखा कि कुछ बाहरी साइटों ने ज़बासर्च का साथ देना बन्द कर दिया है। टेरासर्वर जिन का ये लोग सेटेलाइट मैप दिखाते थे, अब यह पृष्ठ दिखाता है। कहता है कि हम ज़बासर्च से खुश नहीं हैं। देखते हैं कितने दिन में वे नया साथी खोजेंगे।

यह साइट भी देखिए।

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आधिकारिक चिट्ठाकार मिलन

आर्च के पासकहानी शुरू हुई कई महीने पहले जब हमारे अतुल भाई अपने चिट्ठों की प्रसिद्धि के लिए मिठाई खिला रहे थे। “लाइफ इन..” के चर्चे अभिव्यक्‍ति पर थे। इंडीब्लॉग पुरस्कार रास्ते में थे, मालूम ही था अपनी ही झोली में गिरने हैं। खैर मिठाई का डिब्बा दिखा कर लिखते हैं, “अब सवाल यह है कि आप सब लोग फिलडेल्फिया कब आयेंगे मिठाई खाने”| हम ने कमेंट मारा कि तैयार रखो डिब्बा। खैर उस के बाद फोन पर बातचीत कई बार हुई। कई बार मिलने का कार्यक्रम बना, बिगड़ा। अन्ततः पिछले शनिवार, हम जा धमके। सपरिवार। फिलडेल्फिया बाल्टिमोर से १२० मील है, यानी १९२ किलोमीटर, यानी इंटरस्टेट-९५ पर लगभग दो घंटे। घर का सही रास्ता तो गूगल भैया ने दिखा ही दिया था, यहाँ तक कि अतुल जी की गलियों की सेटेलाइट फोटो भी हम छाप कर ले गए थे, पर पहुँचने पर ज़रा सा भटक ही गए। खैर सैलफोन के ज़रिए हमें नैविगेट किया गया। वह रास्ते का आखिरी टर्न समझा रहे थे कि हमारी नज़र पड़ी सामने जीता जागता रोजनामचा खड़ा है।

शैतानीदोनों परिवार आपस में मिले। बहुत अच्छा लगा। छोटी-बड़ी महिलाओं की तो फटाफट निभ गई। बाँके बिहारी के भी दर्शन हुए। जैसे सब लड़के होते हैं, वे भी अपनी धौंस में थे, बातों से ज़्यादा लातों से काम ले रहे थे। एकदम ऍक्शन हीरो वाले स्टंट।

भरपूर, स्वादिष्ट भोजन जीमने के बाद रुख किया गया वैली फोर्ज नैश्‍नल पार्क का, जो अतुल के घर से बहुत पास है। बहुत ही सुरम्य स्थान है। हरियाली के बीच छोटी छोटी सड़कें, कुलाँचे भरते हिरन। यह पार्क एक ऐतिहासिक युद्धस्थल को सुरक्षित रखने के लिए बनाया गया है। १८वीं शताब्दी में अमरीका के स्वाधीनता संग्राम की कई महत्वपूर्ण लड़ाइयाँ यहाँ लड़ी गई थीं। उस समय की कई चीज़ें यहाँ रखी गई हैं।

हिरणखैर इसी सब में दिन समाप्त हो गया, और हम चले वापस घर की ओर। वार्तालाप चिट्ठों पर कम केन्द्रित रहा और एक दूसरे के बारे में जानने पर ज़्यादा।

तो यह था पहले चिट्ठाकार मिलन का लेखा जोखा। अगला कौन लिख रहा है। सुना है ठाकुर साहब भी भारत में हैं, इन्द्र अवस्थी भी। कब हो रहा है अगला सम्मेलन?

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तूफान के बच्चे

आज सुबह टीवी पर एक रिपोर्ट देखी जिस का शीर्षक था हरीकेन बेबीज़, यानी तूफान के बच्चे। ठीक नौ महीने पहले फ्लोरिडा में भीषण समुद्री तूफान आया था, और आजकल क्षेत्र के अस्पतालों में नवजात शिशुओं की संख्या में १५-२० प्रतिशत बढ़ोतरी दिख रही है। एबीसी टीवी की साइट पर तो इस खबर का लिंक नहीं मिला, पर एक और साइट पर ऐसी ही रिपोर्ट मिली। इस में यह भी बताया गया है कि बढ़ते बच्चों की आमद की अपेक्षा में अस्पताल में सुविधाओं का विस्तार किया जा रहा है।

हुआ यूँ कि समुद्री तूफान के चलते क्षेत्र के लोगों को घरों से निकाल कर सामुदायिक भवनों में रखा गया। कई लोग जो घरों में भी थे, उन के घरों में बिजली गुल थी। करने को कुछ था नहीं, तो अब क्या करते — इसलिए प्रजनन क्रिया में लग गए। कई ऐसे परिवारों के इंटरव्यू लिए गए और सभी बता रहे थे कि किन हालात में उन्होंने गर्भ धारण किए। कइयों के लिए तो कैंडल लाइट से और रोमान्स पैदा हुआ।

किसी गाँव की बढ़ती आबादी के बारे में एक पुराना लतीफा याद आता है, जिस में खोज करने पर कारण पता चला कि गाँव से देर रात एक रेलगाड़ी गुज़रती थी, जो सोते जोड़ों को जगा देती थी।

अब आप ही सोचिए, भारत की बढ़ती जनसंख्या का किसे दोष दें? जहाँ लाखों घरों में रोज़ तूफानी हालात होते हैं। बिजली होती नहीं, दनदनाती रेलें पास से गुज़रती हैं। लोग करें तो क्या करें।

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चिट्ठे का नया घर, और एक नया चिट्ठा

मेरे चिट्ठे में एक और परिवर्तन हो गया है। मेरा चिट्ठा अब पुराने स्थान से नए स्थान पर चला गया है। आशा है यह स्थान स्थाई रहेगा। ब्लॉगडिगर के देबाशीष, नारद के पंकज और बलॉगफीडर के जीतू से प्रार्थना है कि वे अपनी अपनी “डाइरियों” में मेरा पता बदल दें। ब्लॉगर सूची वाली जावास्क्रिपट तो मैं स्वयं बदल दूँगा।

इस के अतिरिक्त मैं ने अपना अंग्रेज़ी चिट्ठा भी शुरू कर दिया है। समय मिले तो उसे भी देखें।

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नेशनल स्पेलिंग बी २००५ चैंपियन।

जब भारतीय, या भारतीय मूल के, लोग किसी विश्व स्तरीय प्रतियोगिता में जीतते हैं तो खुशी तो होती ही है। सौन्दर्य प्रतियोगिताओं का ९० के दशक का भारत से मोह अब भंग होता दीख रहा है। इस बार मिस यूनिवर्स प्रतियोगिता में तो मिस इंडिया फाइनल १५ में भी नहीं पहुँची।

स्पेलिंग प्रतियोगिताओं में भारतीय मूल के बच्चों का खासा वर्चस्व रहा है। कल दफ्तर से घर लौटते समय रेडियो पर स्क्रिप्स स्पेलिंग बी के नतीजों के बारे में एक रिपोर्ट सुनी। विजेता बना सैन डिएगो का १३ वर्षीय बालक अनुराग कश्यप। अन्तिम शब्द के रूप में उस से पूछे गये “अपाजिटोरा” के हिज्जे।

अनुराग ने दोहराया, “अपाजिटोरा, परिभाषा दें।
“an embellishing note”
“अपाजिटोरा, मूल भाषा बताएँ।”
“लेटिन से इटालियन”
“अपाजिटोरा, …अपाजिटोरा, a, p, p, o, g, g, i, a, t, u, r, a”

और इस के साथ ही बना अनुराग नेशनल स्पेलिंग बी का २००५ का चैंपियन

आज सुबह अनुराग को एबीसी टीवी के “गुड मॉर्निंग अमेरिका” शो में देखा जिस में डायैन सॉयर और रॉबिन रॉबर्ट्स ने उस से बात की। “कंप्यूटर पर कुछ लिखते समय क्या तुम भी कभी स्पेलचैक का प्रयोग करते हो?” “बिल्कुल करता हूँ। स्पेलिंग बेशक पता हो, पर टाइपिंग करते हुए गलती तो हो ही सकती है।”

बधाई हो अनुराग।

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किश्ती में छेद

बीबीसी की रिपोर्ट के अनुसार :

भारत के प्रधानमंत्री ने कहा है कि कश्मीर में सीमा को ‘अर्थहीन और अप्रासंगिक’ बनाने और भारत प्रशासित कश्मीर को अधिक स्वायत्ता देने से पाकिस्तान के साथ चल रहे विवाद को सुलझाने में सहायता मिल सकती है।

मेरी प्रतिक्रिया, जो बीबीसी के पन्ने पर भी छपी है, यूँ है :

कश्मीर की सीमा को अर्थहीन बनाने का सुझाव अर्थहीन है। यह ऐसा कहने के बराबर है कि “हम अपनी कश्ती डुबो नहीं रहे हैं, केवल इस में छोटा सा छेद कर रहे हैं”। या तो दोनों देशों के बीच सारी सीमाएँ समाप्‍त करने की बात हो, जिस से पहले सारे वैमनस्य समाप्‍त होने चाहिए अन्यथा पाकिस्तान में चल रहे आतंकी कारखानों के उत्पाद को भारत को निर्यात करने का एक आसान रास्ता खुल जाएगा। फिर उसे रोकने के लिए कश्मीर और शेष भारत के बीच सीमा बांधनी पड़ेगी। यह भी सोचने की बात है कि कश्मीर के हिन्दू निवासियों के लिए कश्मीर का रास्ता बन्द है पर पाकिस्तान के निवासियों के लिए आप रास्ता खोलना चाहते हैं।