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अगर तुम आ जाते एक बार

अगर तुम आ जाते एक बार

काँटे फिर न पीड़ा देते
आँसू भी मोती बन जाते
तेरी बाहें जो बन जाती मेरे गले का हार
अगर तुम आ जाते एक बार

जीवन का सच अतिसय सुन्दर
पा जाते हम दोनों मिलकर
उजड़े दिलों में छा जाती मदमाती नई बहार
अगर तुम आ जाते एक बार

आँखों के सतरंगी सपने
सच हो जाते जो तुम होते
राहें फिर न तन्हा रहतीं
तय हो जातीं हंसते गाते
इन्द्रधनुष के रंगों से फिर हो जाता शृंगार
अगर तुम आ जाते एक बार

आभास अधूरेपन का मिटता
एकाकीपन फिर क्यों डसता
तेरी आँखों में मिल जाता मन को मन का उपहार
अगर तुम आ जाते एक बार

– कैलाश चन्द्र गुप्ता (चन्द्रगुप्त)

कैलाश को चेतावनी दी गई थी, कि यदि नहीं लिखोगे, तो हम तुम्हारा लिखा छापना शुरू कर देंगे। यह पहली बानगी है।

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अनुगूंज ६ : मेरा चमत्कारी अनुभव

Akshargram Anugunj“मेरा चमत्कारी अनुभव” – मैंने अनुगूंज का यह विषय चुन कर स्वयं अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारी है। स्वयं का कोई ढ़ंग का अनुभव है नहीं, लिखूँ तो क्या लिखूँ? यही होता है जब नौसिखियों को कोई ज़िम्मेवारी का काम दिया जाता है। समस्या यह है कि जब तक मैं स्वयं न लिखूँ तब तक न तो जीतेन्द्र और आशीष को “राजा बेटा वाली शाबासी” दे सकता हूँ, न औरों को अनुगूँज के एक नए आयोजक की लाज रखने की गुहार कर सकता हूँ। इसलिए, चलिए कोशिश करता हूँ थोड़ा कुछ कहने की। पते की बात कुछ छोटी है इसलिए घुमा फिरा कर कहूँगा।

चमत्कारी अनुभव तो इसे नहीं कह सकता पर मौत को सामने देखने का एक अनुभव हुआ है, वह सुनाता हूँ। छठी कक्षा में था। वह समय कश्मीर में शान्ति का था, हालाँकि अशान्ति का बीज तो भीतर ही भीतर हमेशा से ही पनप रहा था। मुझे याद है हम लोग तख्ती लिखा करते थे और एक मुस्लिम छात्र तख्ती पर बड़ी सुन्दर लिखाई में उर्दू में लिख कर लाया था, “सारे जहाँ से अच्छा पाकिस्तान हमारा”। ख़ैर यह किस्सा उस बारे में नहीं है, बस माहौल को वर्णित कर रहा था। हमारे घर के सामने एक नदी बहती थी — गंगा, जमुना, वितस्ता जैसी बड़ी नदी नहीं, यही कोई पन्द्रह-बीस फुट चौड़ी, छोटी नदी जो पत्थरों पर कल-कल करती बहती थी। हमारे घर के आसपास उस की गहराई थी कोई डेढ़-दो फुट, पर बहाव वहुत तेज़ था। नदी हरमुख की पहाड़ियों में उत्पन्न होती थी और हमारे गाँव से गुज़र कर कोई १५ किलोमीटर बाद वुलर झील में मिलती थी, जो एशिया की सब से बड़ी मीठे पानी की झील मानी जाती है। खैर हमारी यह नदी जो “द्वद क्वल” (दूध की नदी) कहलाती थी, हमारी ज़िन्दगी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा थी। पानी एकदम पारदर्शी, साफ; उसी में हम नहाते थे, उसी का पानी पीते थे, और उसी में घर के बर्तन, कपड़े आदि धुलते थे।

रोज़ का नहाना तो उसी डेढ़-दो फुट के पानी में होता था, घड़े की सहायता से, पर जब छुट्टी होती थी, मस्ती होती थी, तो एक-आधा किलोमीटर दूर जा कर ऐसी जगह नहाना होता था जहाँ नदी की गहराई और चौड़ाई थोड़ी ज़्यादा होती थी और बहाव धीमा। वहाँ छोटा सा घाट सा बना होता था और हम तैरने और गोते खाने का शौक पूरा करते थे। ख़ैर इस वातावरण के लिए कोई विशेष तैराकी निपुणता की आवश्यकता नहीं होती थी, सो हम भी उतने ही निपुण थे, जितनी ज़रूरत थी।

हुआ यूँ कि गर्मियों की दो हफ्ते की छुट्टी में हमें मौसी के घर भेजा गया, ३० किलोमीटर दूर सोपोर में। सोपोर वुलर झील के दूसरे सिरे पर स्थित एक कस्बा है जहाँ सेब का कारोबार खूब चलता है, और पिछले १५ साल से बन्दूक का भी खूब चला है। झेलम (वितस्ता) नदी दक्षिण कश्मीर से उत्पन्न हो कर वुलर झील में आ मिलती है और फिर निकल कर सोपोर, बारामुल्ला होते हुए पाकिस्तान जाती है। ख़ैर हमारी मौसी का घर वितस्ता के एकदम किनारे था। वहाँ मेरे मौसेरे भाई बहन सभी तैराक थे, और न सिर्फ वितस्ता में तैरते थे, बल्कि उस आधा किलोमीटर चौड़ी नदी के आर पार कई चक्कर लगाते थे। मैं भी रोज़ उन के साथ जाता, पर अपनी औकात में रहता। घाट की कौन सी सीढ़ी तक मैं जा सकता था, यह मैंने रट रखा था। पानी गर्दन तक आता था, और वहीं तक मैं “तैरता” था।

Jhelumउस दिन मुझे याद नहीं बाकी लोग कहाँ गए थे, पर मैं अकेला तैरने गया। अगले दिन वापस घर जाना था, इसलिए बड़ी नदी में नहाने का इस मौसम का आखिरी मज़ा लेना चाहता था। बारिश हुई थी, पानी का स्तर भी अधिक था और बहाव भी। मैं अपनी अकलमन्दी में अपनी रटी हुई सीढ़ी तक ही गया। और मिनट भर में पानी मुझे और नीचे धकेल रहा था। मैं अपनी पतली सी सींकिया काया को रोक नहीं पाया और बह निकला। मैं बहता चला गया, मदद के लिए चिल्ला भी नहीं पाया, केवल हाथ पाँव चला रहा था कि किसी तरह से डूबूँ नहीं। ऐसा ही पता नहीं कितनी देर तक चलता रहा, मुझे मौत सामने दिख रही थी और बचाए जाने की कोई उम्मीद नहीं दिख रही थी। तीन दशक बीत गए हैं, पर वह दृश्य अभी भी मेरी आँखों के सामने है। चारों तरफ उफनती नदी का शोर था, और बारिश से मटमैले हुए पानी के सिवा कुछ भी नज़र नहीं आ रहा था। मेरी हिम्मत जवाब दे रही थी, बाहें थक गई थीं, और मैं हैरान था कि मैं तैर कैसे रहा हूँ। तैर तो क्या रहा था, हाथ पाँव मार रहा था। शायद मैं आधा बेहोश था, जब मुझे लगा कि मुझे किसी बला ने पकड़ लिया है। पहले लगा कि कोई बड़ी मछली है, धीरे धीरे आभास हुआ कि मैं बचाया जा रहा हूँ। किनारे पर पहुँचाया गया तो भीड़ जमा हो चुकी थी। सब ने मुझे घेर लिया। मेरी मौसी आ चुकी थीं, सिर पीट रही थीं कि भगवान ने लाज रख ली वरना मैं अपनी दीदी को क्या मुँह दिखाती।

मेरे पेट को मटके पर रख कर मुझे उल्टा लिटाया गया, ताकि अन्दर गया पानी मैं उगल दूँ। काफी पानी बाहर आया। ख़ैर जान बची लाखों पाए।

बाद में पता चला कि किनारे बैठी एक लड़की ने मुझे डूबते देख कर शोर मचाया था, और मेरे मौसा जी के भाई ने मुझे डूबने से बचाया था। मैं नदी के बीचों बीच पहुँच चुका था, और बहाव की दिशा में भी काफी नीचे चला गया था।

घर में हवन आदि हुआ। उस दिन के बाद घर पहुँच कर मैं अपनी “द्वद क्वल” तक ही सीमित रहा, और झेलम से दूर रहने की ठान ली। अब ज़रूर स्विमिंग पूल के सुरक्षित वातावरण में तैरता हूँ, पर ट्रेनिंग उसी दिन की काम आ रही है।

रही चमत्कार की बात और नमक मिर्च की बात, वह अब आने जा रही है। पर यकीन मानिए, नमक मिर्च इस में ज़रा भी नहीं है। वह लड़की जिसने मुझे बचाने के लिए शोर मचाया, अब रोज़ मुझ से झगड़ती है, कि ग्रोसरी कब जाओगे, ब्लाग पर ही बैठे रहोगे या बच्चों को भी पढ़ाओगे। हालात वहाँ से यहाँ तक कैसे पहुँचे, यह तो शायद पिछली अनुगूँज में कहना चाहिए था पर..

दिल के लुटने का सबब पूछो न सब के सामने
नाम आएगा तुम्हारा यह कहानी फिर सही।

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मनोरंजन

कृष्ण और कृष्ण

आज हम भी “ब्लैक” देख कर आए, और सोचा पहले आशीष जी को धन्यवाद दें — फिल्म को सुझाने के लिए, और इस सुझाव के लिए कि फिल्म को सिनेमा हॉल में ही देखें। हमारा भी यही सुझाव है कि फिल्म को बिलकुल मिस न किया जाए। नाम को देख कर तो लग रहा था कि एक और मुंबई के अंडरवर्ल्ड से संबन्धित फिल्म है, जिस में काला बाज़ारी वग़ैरा का ज़िक्र होगा, पर फिल्म का विषय इस से कोसों, मीलों दूर है। यह फिल्म भारत में इस साल के फिल्म पुरस्कारों पर तो क्लीन स्वीप मारेगी ही, बाहर भी सराहे जाने की उम्मीद की जा सकती है। अमिताभ बच्चन का अभिनय शायद ही किसी फिल्म में इस से बेहतर हुआ हो, और यही बात रानी मुखर्जी के लिए भी कही जा सकती है। हमारा मन तो उस छोटी सी लड़की के अभिनय ने ही मोह लिया, जिस ने रानी मुखर्जी के बचपन की भूमिका निभाई है। फिल्म का चित्रांकण अत्यधिक सराहनीय है। वास्तविक जीवन को दर्शाती इस फिल्म में कुछ दृश्य ज़रूरत से ज़्यादा नाटकीय लगते हैं, पर कुल मिला कर बहुत ही कलात्मक फिल्म है।

अंग्रेज़ी राज के ज़माने का भारत है और स्थान है शिमला, पर फिल्म में दिखाई इमारतों, शिक्षा संस्थानों को देख कर लगता नहीं कि फिल्म भारत में फिल्माई गई है। आधे नहीं तो एक चौथाई संवाद अंग्रेज़ी में हैं। यहाँ के सिनेमा में सभी हिन्दी संवाद अंग्रेज़ी में सबटाइट्ल के साथ थे। पर क्या भारत में रिलीज़ होने वाले प्रिंट में अंग्रेज़ी संवादों के सबटाइट्ल हिन्दी में हैं? मुझे तो नहीं लगता ऐसा किया गया होगा। क्या यह माना जाता है कि भारत का हर सिने-दर्शक इतनी अंग्रेज़ी समझता ही है? इसे भारतीय सिने दर्शक की तारीफ समझा जाए या उसकी ज़रूरतों की अवहेलना?

अंग्रेज़ी राज का भारत ही है “किसना” में भी। इसी वीकेंड पर घर में “किसना” की डीवीडी देखने की कोशिश की गई पर एक बार फिर आशीष जी की सलाह सच साबित हुई। एक बैठक में आधा घँटा देखी, दूसरी बार एक और घँटा, उस के बाद नहीं झेली गई। उसे देखने का रिस्क न ही लिया जाए तो बेहतर है। फिर मत कहना बताया नहीं।

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विविध

जादू का खेल

इस खेल की कड़ी मेरे पास मेरे मित्र राज कौशिक ने सिडनी से भेजी। यदि आप ने यह खेल पहले नहीं देखा हो तो थोड़ी देर के लिए सिर चकरा देता है। यदि आप ने ईमानदारी से इसका रहस्य स्वयं पता किया हो तो आप को बधाई। लेकिन राज़ को राज़ ही रहने दो, वरना राज ना-राज़ हो जाएगा।

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भारत

बिना मताधिकार के मोहरे

[१९९० के आरंभ तक उत्तर कश्मीर के कलूसा गाँव के जिस घर में मेरा परिवार दशकों से रहा, उस में तब से या तो हिज़्बुल-मुजाहिदीन का डेरा रहा है या राष्ट्रीय राइफ्ल्ज़ का, जिस का जिस समय वर्चस्व रहा। वह क्षेत्र “शान्त” क्षेत्रों में से है, क्योंकि वहाँ अभी भी गिनती के दो-चार हिन्दू बचे हुए हैं। ३० किलोमीटर दूर सोपोर में जहाँ मेरे कई रिश्तेदार रहते थे, अब हिन्दू मोहल्ला खंडहर बन चुका है, जहाँ कोई नहीं रहता और घर जल कर शब्दशः मिट्टी में मिले हुए हैं। अगली पीढ़ियों के लिए कश्मीर का कुछ अर्थ हो या न हो, हमारी पीढ़ी तो इसे अपने दिलो-दिमाग़ से नहीं निकाल सकती। इसी पीढ़ी के हैं रेडिफ स्तंभकार ललित कौल। उन के पिछले सप्ताह के लेख का मैं ने हिन्दी अनुवाद किया है जो नीचे प्रस्तुत है।]

कश्मीरी हिन्दू समुदाय ने १९-२० जनवरी को कश्मीरी हिन्दू हालोकास्ट दिवस के रूप में मनाया। १५ वर्ष पहले इसी दिन इस्लामी आतंकियों ने कश्मीर घाटी से कश्मीरी हिन्दुओं के सामूहिक निष्कासन का अभियन्त्रण किया।

१९ जनवरी १९९० की रात कश्मीरी हिन्दुओं के इतिहास में सबसे काली रात थी। उस रात, घाटी की सभी मस्जिदों के लाउडस्पीकर चीख चीख कर इस अल्पसंख्यक समुदाय के विरुद्ध ज़हरीली धमकियाँ उगल रहे थे। रात भर, इस शान्तिप्रिय समुदाय को धमकी दी जा रही थी कि या तो धर्म परिवर्तन कर लें या घाटी को छोड़ दें। या फिर, मरने के लिए तैयार हो जाएँ।

१९४७ में, जब पाकिस्तानी कबाइली आक्रामक, पाकिस्तानी सेना की मदद से श्रीनगर की ओर बढ़ रहे थे तब कश्मीरी हिन्दुओं को ऐसी ही स्थिति का सामना था। उन दिनों हर परिवार की स्त्रियों को विष की पुड़ियाँ बाँटी गई थीं ताकि आक्रामकों के घर में घुसने की स्थिति में वे उसे खा लें। नार्कीय बल के विरुद्ध यह ज़हर की पुड़िया ही उन का इकलौता बचाव थी। अस्मिता हरण से पहले मौत।

जनवरी की उस रात भी कुछ ऐसी ही स्थिति थी। स्त्रियों को घरों के अन्धेरे कोनों में छिपाया जा रहा था, ताकि भाड़े के आतंकी उन्हें ढ़ूँढ़ न पाएँ। जैसे जैसे रात गहरा रही थी, भय के बादल घने होते जा रहे थे। अन्ततः सुबह होने पर कश्मीरी हिन्दू और न सह पाए और जान बचाने के लिए सब कुछ छोड़ छाड़ कर भागे — वे मन्दिर जो उन्हें सुकून और शान्ति देते थे, वे विद्यालय जहाँ से उन्होंने ज्ञान और बुद्धिमत्ता पाई थी, वे घर और चौखटें जिनसे उनकी जीवन भर की यादें जुड़ी हुई थीं, वे पुल जिन पर उन्होंने वितस्ता (जेहलम) नदी को सराहते हुए अपनी शामें गुज़ारी थीं, चिनार के वे शानदार वृक्ष जिनकी छाया भर से उनके घाव भर जाते थे, कश्मीरी में ‘डब’ कहलाई जाने वाली वह बाल्कनियाँ जिन पर वे अपने घरों की टीन की छतों पर गिरती बारिश की छन छन सुनते थे। हर चीज़ जिनसे उन्हें प्यार और लगाव था।

पन्द्रह वर्ष हुए हैं तब से, और उनके लिए बहुत कुछ नहीं बदला है। तब कोई उनकी मदद के लिए नहीं आया। आज भी किसी को उनकी परवा नहीं है। तब कश्मीरी हिन्दू कश्मीर की शतरंज में मोहरे थे। आज भी वे मोहरे ही हैं।

आजकल जम्मू कश्मीर राज्य में २७ वर्ष बाद स्थानीय चुनाव हो रहे हैं। ज़रा अन्दाज़ा लगाएँगे? घाटी के ४००,००० कश्मीरी हिन्दुओं में से एक का नाम भी मतदाता सूची में नहीं है। एक ही झटके में सभी ४००,००० कश्मीरी हिन्दुओं का मतदान करने का मूल अधिकार उनसे छीन लिया गया है। क्यों? क्योंकि वे अब घाटी में नहीं रहते। और क्यों नहीं रहते घाटी में वे? फिर समझाना पड़ेगा क्या?

इधर इन कश्मीरी हिन्दुओं के मूलभूत अधिकारों का हनन हो रहा है, उधर सभी राजनीतिक दल अपने अपने स्वार्थ के लिए स्थिति का भरपूर लाभ उठा रहे हैं। जम्मू-कश्मीर के मुख्य मन्त्री मुफ्ती मुहम्मद सईद और उनके पीडेपा वाले चमचे कह रहे हैं कि चूँकि ये कश्मीरी हिन्दू घाटी में नहीं रहते, उन्हें मतदाता सूची में नहीं रखा जा सकता। उन की बहस का मुद्दा यह है कि इन खाना-बदोश लोगों को वहाँ की मतदाता सूची में होना चाहिए जहाँ वे रहते हैं, जैसे जम्मू, उधमपुर, आदि।

मुफ्ती साहब के उप मुख्य मन्त्री मंगत राम शर्मा जो उन की साझेदार पार्टी काँग्रेस-इ से हैं (और जम्मू से हैं), राज्य के राज्यपाल से अधिसूचना की माँग कर रहे हैं कि इन कश्मीरी हिन्दुओं को घाटी की मतदाता सूचियों में वापस ड़ाल दिया जाए। (जम्मू के) भाजपा वाले भी इन शरणार्थियों को घाटी की मतदाता सूचियों में ही रखना चाहते हैं। यानी कुछ लोग उन्हें कश्मीर से निकालने के चक्कर में हैं और कुछ लोग जम्मू से। कुछ लोग अपने यहाँ की मतदाता सूचियों से उन्हें बाहर देखना चाहते हैं तो कुछ लोग दूसरी जगह की मतदाता सूचियों में ड़ालना चाहते हैं।

राजनीतिक दलों की इस उठापटक के चलते प्रभावित लोगों की कोई नहीं सुन रहा। कश्मीरी हिन्दू क्या चाहते हैं इस की किसी को परवाह नहीं।

भारत जैसे जनतान्त्रिक देश में कोई मतदान का संवैधानिक अधिकार कितनी आसानी से खो सकता है, यह देख कर घिन्न होती है। एम्नेस्टी इंटरनेश्नल और ह्यूमन राइट्स वाच अब कहाँ हैं? शायद मैनहटन न्यूयार्क के किसी पैंटहाउस में स्काच की चुस्कियाँ लेने में व्यस्त होंगे।

अपने यहाँ के राजनीतिज्ञ किस तरह गिरगिट की तरह रंग बदलते हैं, यह देख कर ग्लानि होती है। जब सत्ता में होते हैं तब अपनी ही ऐंठ में होते हैं और जिन लोगों को हानि पहुंची है उन की वाजिब माँगों को भी नकार देते हैं। और जब हार कर विपक्ष में बैठते हैं, फिर मसीहा बने फिरते हैं।

अभी कुछ ही दिन पहले भूतपूर्व उप प्रधान मन्त्री लाल कृष्ण आड़वानी कश्मीरी हिन्दू हालोकास्ट दिवस के उपलक्ष्य में कश्मीरी हिन्दुओं से मिले। प्रतिनिधिमण्डल को सम्बोधित करते हुए बोले, “मैं स्वीकार करता हूँ कि राजग सरकार कश्मीरी हिन्दुओं की समस्या को हल करने के लिए बहुत कुछ नहीं कर पाई। गठबन्धन की कई अड़चनें थीं। फिर भी भाजपा सरकार में रहते हुए इस समस्या के बारे में अब के मुकाबले अधिक हासिल कर सकती थी।

“इस के बावजूद”, वे बोले “मैं समुदाय को विश्वास दिलाना चाहता हूँ कि विपक्ष, विशेषकर भाजपा, इस मुद्दे को संसद के भीतर और बाहर उठाएगा। मैं यूपीए सरकार पर इस मुद्दे की महत्ता को व्यक्त करता रहूँगा और इस समुदाय को न्याय दिलाने में कोई कसर नहीं छोड़ूँगा। अपनी ही मातृभूमि में इस समुदाय का सफाया कर देना दुर्भाग्यपूर्ण है और दुनिया को इस मुद्दे की ख़बर होनी चाहिए।”

यह वक्तव्य बहुत अच्छा समझें तो परिहासपूर्ण है, बुरा समझें तो धूर्तता-पूर्ण।

अब हम आड़वानी जी पर कैसे भरोसा कर लें? यदि उन्होंने सत्ता में रहते कुछ नहीं किया तो कैसे मान लें कि अब कुछ कर पाएँगे। किस को शेख़ चिल्ली की कहानियाँ सुना रहे हैं वे? विश्वास नहीं होता कि किस तरह ये राजनीतिज्ञ हर मुद्दे को वोटों की जमा-तफ़रीक में बदल देते हैं। मानववादी शर्तें भी इन स्वार्थी राजनीतिज्ञों के लिए कोई अर्थ नहीं रखतीं।

यूपीए सरकार के लिए यह एक मौका है त्रुटिनिवारण का, और दुनिया को दिखाने का कि उसका सभी समुदायों के साथ न्याय में पक्का विश्वास है। मैं चुनौती देता हूँ उन को, कि कश्मीरी हिन्दुओं के घाटी से सफाया किए जाने के कारणों का निरीक्षण करने के लिए एक जाँच आयोग बिठाएँ, इस घिनौनी कृति के लिए ज़िम्मेदार लोगों को खोज निकालें और उन्हें देश के विधान के अनुसार दंडित करें।

यदि लालू प्रसाद यादव गोधरा काँड की पुनः जाँच करने के लिए जस्टिस बैनर्जी की अध्यक्षता में जाँच समिति नियुक्त कर सकते हैं, तो गृह मन्त्री शिवराज पाटिल कश्मीरी हिन्दुओं के सफाए की जाँच के लिए आयोग क्यों नहीं नियुक्त कर सकते?

क्या यूपीए सरकार यह चुनौती स्वीकार करने को तैयार है? कोई सुन रहा है यूपीए सरकार सरकार में? कोई सुन रहा है? कोई है?


ललित कौल “कश्मीर हेराल्ड” के सम्पादक हैं। उनके अन्य लेख पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।

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पेज थ्री

आज “पेज थ्री” देखी। फिल्म देखने के लिए बैठ रहा था तो ज़्यादा उम्मीदें नहीं थीं, सोचा शायद कुछ देर बाद उठ जाऊँगा और परिवार के बाकी लोग देख लेंगे, जैसा घर में आई अक्सर फिल्मों के साथ होता है। शुरू में कुछ धीमी भी लगी पर जैसे जैसे फिल्म आगे बढ़ती गई, उसका आकर्षण बढ़ता गया, और अब मैं यही कहना चाहूँगा, कि फिल्म को देखे बिना छोड़िए मत।

Konkana Sensharmaफिल्म की थीम लीक से हट कर है, एक तरह से आर्ट फिल्म की श्रेणी में ही आती है। पर फिर भी बाक्स ऑफिस पर अच्छी चल रही है, यह जान कर सुखद आश्चर्य ही हुआ। कोंकणा सेनशर्मा की एक पत्रकार की मुख्य भूमिका बहुत ही शक्तिशाली है। गर्ल-नेक्सट-डोर वाले व्यक्तितव की इस अभिनेत्री की यह पहली फिल्म देखी है मैंने, पर अब पता चला पहले ही “मिस्टर एण्ड मिसेज़ अइयर” में धाक छोड़ चुकी है, और कई पुरस्कार भी पा चुकी है। अब तो वह फिल्म भी देखनी पड़ेगी। देब भाई कौन सी चक्की का पिसा खाते हो आप बंगाली लोग जो इतना टेलेंट पाए हो।

बस एक बात का ख्याल रखें। यहाँ देसी डीवीडी लेते समय हम रेटिंग पर इतना ध्यान नहीं देते, और कई बार देखते देखते पता चलता है कि अगर यह अँग्रेज़ी फिल्म होती तो “आर” रेटिड होती। थोड़ा थोड़ा ही सही, इस फिल्म ने बॉलीवुड़ की कुछ शालीनता सीमाओं को कई जगह पार किया है, हालाँकि भौंडा लगे बिना। समलैंगिक यौन, द “ग” वर्ड़, हॉलीवुड़ स्टाइल चुम्बन, यहाँ तक कि बच्चों को भी वासना का शिकार होते हुए दिखाया गया है। मैं यह नहीं कहूँगा कि बच्चों को इस फिल्म से वंचित किया जाए, पर पहली बार खुद देखें, फिर निश्चय करें।

चलते चलते अतुल को बधाई, उन के शहर की ईगल्ज़ ७-० से आगे हैं। भई मैं तो हाफ टाइम का इन्तज़ार कर रहा हूँ, पर क्या फायदा इस बार जेनेट जैकसन तो है नहीं। सॉरी अतुल भाई, इस बार महा कटोरी (सुपर बोउल) कोई और ले गया।