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उर्दू

ग़ज़ल का सिर पैर और …पूँछ

लगभग सभी हिन्दी भाषी जो कविता में रुचि रखते हैं, हिन्दी संगीत में रुचि रखते हैं, किसी न किसी रूप में ग़ज़ल में भी रुचि रखते हैं। जो लोग उर्दू-दाँ नहीं भी हैं और महदी हसन, ग़ुलाम अली की गाई कुछ पेचीदा ग़ज़लें नहीं भी समझ पाते, उनके लिए पंकज उधास अवतार सरीखे आए। उन्होंने सरल ग़ज़लों को सरल धुनों में गाया और ग़ज़ल भारत में जन-जन की चहेती हो गई। फिर अपने जगजीत सिंह तो हैं ही ग़ज़लों के बादशाह — कौन होगा जिसके म्यूज़िक कलेक्शन में जगजीत सिंह के सीडी-कसेट नहीं होंगे।

ग़ज़ल क्या है

चलिए बात करते हैं कि ग़ज़ल क्या है। ग़ज़ल शे’रों का एक समूह है जिसके शुरू में मतला होता है, आख़िर में मक़ता होता है, मक़ते में अक़्सर शायर का तख़ल्लुस होता है। पूरी ग़ज़ल में एक सा बहर होता है। क़ाफ़िया ज़रूर होता है, रदीफ़ हो या न हो। यानी ग़ज़ल हमरदीफ़ भी हो सकती है और ग़ैरमुदर्रफ़ भी।

एक मिनट! एक मिनट! कुछ ज़्यादा उर्दू हो गई, है न? चलिए इसको ज़रा आसान बनाते हैं एक मिसाल की मदद से। नासिर क़ाज़मी की इस सीधी-सादी ग़ज़ल को लीजिए (ग़ज़ल यहाँ सुन सकते हैं)।

दिल धड़कने का सब याद आया
वो तेरी याद थी अ याद आया

आज मुश्किल था सम्भलना ऐ दोस्त
तू मुसीबत में अज याद आया

हाल-ए-दिल हम भी सुनाते लेकिन
जब वो रुख़सत हुए त याद आया

बैठ कर साया-ए-गुल में ‘नासिर’
हम बहुत रोये वो ज याद आया

Rhyming sequence पर ध्यान दें — AA-BA-CA-DA….

शे’र – ग़ज़ल का हर शे’र अपने आप में दो पंक्तियों की पूरी कविता होती है। यानी हर शे’र को अलग से प्रस्तुत किया जा सकता है। प्रायः ग़ज़ल में एक कहानी या कविता सा लगातार प्रवाह भी नहीं होता। यानी आप अश’आर (शे’रों) को ऊपर नीचे भी कर सकते हैं और उन की संख्या को घटा बढ़ा भी सकते हैं। हर शे’र की पहली पंक्ति को सुनाना, दोहराना, दूसरी लाइन का सस्पेन्स बिल्ड करना, फिर दूसरी लाइन पर वाहवाही लूटना एक अच्छे शायर का हुनर है, और कई चुटकुलों की पृष्ठभूमि भी।

मतला – ग़ज़ल के पहले शे’र को मतला कहते हैं। इसकी दोनों पंक्तियों का समान अन्त होता है (तुकबन्दी)। यही अन्त बाक़ी सभी शे’रों की दूसरी लाइन का होता है। ग़ज़ल के मतले से ही उस के बहर, रदीफ़ और क़ाफिए का पता चलता है।

बहर – हर पंक्ति की लंबाई एक सी होती है और इस लंबाई को बहर कहते हैं। ग़ज़ल ऊपर लिखी ग़ज़ल की तरह मध्यम बहर की हो सकती है, या फिर “अपनी धुन में रहता हूँ / मैं भी तेरे जैसा हूँ” की तरह छोटे बहर की, या “ऐ मेरे हमनशीं, चल कहीं और चल इस चमन में अब अपना गुज़ारा नहीं / बात होती गुलों की तो सह लेते हम अब तो काँटों पे भी हक़ हमारा नहीं” की तरह लम्बे बहर की।

रदीफ़ – हर शे’र के अन्त में आने वाले समान शब्द/शब्दों को रदीफ़ कहते हैं। ऊपर लिखी ग़ज़ल में रदीफ़ है “याद आया”। एक से रदीफ़ वाली ग़ज़लें हमरदीफ़ कहलाती हैं। कुछ ग़ज़लें बिना रदीफ़ की होती हैं, यानी ग़ैर-मुदर्रफ़, जैसे “दैरो हरम में बसने वालो / मैख़ानों में फूट न डालो।”।

क़ाफ़िया – रदीफ़ से पहले आने वाले मिलते जुलते शब्द को क़ाफ़िया कहते हैं। इस ग़ज़ल का क़ाफ़िया है अब, अजब, तब, आदि।

मक़ता – ग़ज़ल के आखिरी शे’र को मक़ता कहते हैं। इसमें अक़्सर शायर का तख़ल्लुस यानी उपनाम बताया जाता है। जैसे ऊपर की ग़ज़ल में “नासिर”, या अपने रवि भाई की ग़ज़लों में “रवि”। आजकल कई ग़ज़लें बिना मक़ते के भी लिखी जाती हैं।

ग़ज़ल और ग़ैर-ग़ज़ल की पहचान

ग़ज़ल  क्या है, यह समझने के साथ यह समझना भी ज़रूरी है कि ग़ज़ल क्या नहीं है। कई बार हम मशहूर ग़ज़ल गायकों की गाई हर नज़्म को ग़ज़ल समझते हैं। दरअसल जगजीत सिंह, महदी हसन, गुलाम अली का गाया हर गीत, नज़्म गाना, ग़ज़ल नहीं होता। यदि गीत में ऊपर दिया rhyming sequence (AA-BA-CA) और शे’रों का समूह न हो तो उसे ग़ज़ल नहीं कहा जा सकता। जैसे कि नीचे लिखे गए गीत ग़ज़लें नहीं है।

बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जाएगी
लोग ज़ालिम हैं हर इक बात का ताना देंगे
बातों बातों में तेरा ज़िक्र भी ले आएँगे

आज जाने की ज़िद ना करो
मेरे पहलू में बैठे रहो
तुम ही सोचो ज़रा क्यों न रोकें तुम्हें
जान जाती है जब उठके जाते हो तुम

चंद रोज़ और मेरी जान फ़क़त चंद ही रोज़
ज़ुल्म की छाँव में दम लेने पे मजबूर हैं हम
और कुछ और सितम सह ले तड़प लें रो लें

इसके विपरीत कई फिल्मी ग़ैर-फिल्मी गाने जिन्हें कुछ लोग शायद ग़ज़लें न समझते हों, वास्तव में ग़ज़लें हैं। जैसे…

सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्ताँ हमारा
हम बुलबुलें हैं इसकी ये गुलसिताँ हमारा

इन आँखों की मस्ती के मस्ताने हज़ारों हैं
इन आँखों से वाबस्ता अफ़साने हज़ारों हैं

निगाहें मिलाने को जी चाहता है
दिलो-जाँ लुटाने को जी चाहता है


यह तो हुई ग़ज़ल के सिर-पैर की बात, पर इस पोस्ट के शीर्षक में पूँछ का क्या ज़िक्र है? बताते हैं। अपने करीयर की शुरुआत में हम और हमारे मित्रगण जिस कंपनी में थे, काम कम करते थे और ग़ज़लें ज़्यादा बाँचते थे। अब शायरी तो आती नहीं थी, सो ग़ज़लों की पूँछ बना दिया करते थे। यानी बहर, रदीफ़ और क़ाफ़िया तो था ही, उसको लेकर थोड़ी तुकबन्दी की और बेकार से एक दो और शे’र जोड़ दिए।

जैसे “अब”, “अजब”, “तब” के साथ “रब” पर कुछ सोचा जाए –

कुफ़्र छूटा यूँ सितम ढ़ाए तूने
इस क़दर गुज़री कि रब याद आया।

या फिर “कब” पर

ता हयात भूलता रहा तू मुझे
याद आया भी तो कब याद आया।


ग़ज़ल इतनी लोकप्रिय हो गई है कि अब हर भाषा में ग़ज़लें लिखी जाने लगी हैं। हिन्दी में तो पहले ही लिखी जाती थी, मराठी, गुजराती, नेपाली, यहाँ तक कि अँग्रेज़ी में भी ग़ज़ल लिखी जाती है।

चलते चलते एक बात और — ग़ज़ल मूल रूप से अरबी भाषा का शब्द है और अरबी में इसका अर्थ है स्त्रियों से बतियाना।

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अनु-झोपड़पट्टी

साइबर स्क्वैटिंग को हिन्दी में क्या कहेंगे? अनु-झोपड़पट्टी? कुछ समय पहले तक साइबर स्क्वैटिंग बहुत ही आम बीमारी थी। लोग बड़ी-बड़ी कंपनियों के डोमेन-नेम रजिस्टर करा लेते थे और बाद में उनसे अच्छी ख़ासी रक़म वसूलते थे। अब कई कानून बन गए हैं जिनसे साइबर स्क्वैटिंग करने वालों के लिए मुश्किल हो गई है पर तब भी यह लोग कुछ न कुछ रास्ते निकाल ही लेते हैं। एक तरीक़ा है टाइपो-स्क्वैटिंग का, यानी आप ने URL ग़लत टाइप किया नहीं कि आप पहुँच गए किसी अश्लील साइट पर। कंपनियों के लिए परेशानी रहती है कि किस तरह अपने नाम के हर रूप के URL को रजिस्टर करा लें। क्या आप जानते हैं कि whitehouse.com एक अश्लील साइट है और whitehouse.org एक व्यंग्यात्मक साइट जिसका वाइट-हाउस से कोई लेना देना नहीं है? बेचारे वाइट-हाउस वालों को whitehouse.gov से गुज़ारा करना पड़ा।

इस बारे में एक दिलचस्प क़िस्सा है भारतीय मूल के कैनेडियन ग्राफिक आर्टिस्ट आनन्द रामनाथ मणि का जिन्होंने अपने नाम के आधार पर armani.com रजिस्टर करा लिया था। विश्व प्रसिद्ध स्विस फ़ैशन कंपनी अरमानी को जब पता चला तो उनकी सुलग गई। काफी समय तक कोर्ट कचहरी करने के बाद संयुक्त राष्ट्र की एजेंसी World Intellectual Property Organization (WIPO) ने फैसला दे कर मणि जी को armani.com का सही हक़दार क़रार दिया। लेकिन अब लगता है कि ज्योर्जियो अरमानी कंपनी ने इस नाम को ख़रीद लिया है।

यह बात कैसे छिड़ी? जैसा मेरा ब्लाग पढ़ने वालों में से कुछ लोग जानते हैं, मेरा ब्लाग हुआ करता था idharudharki.blogspot.com पर। अपनी साइट पर वर्डप्रेस वाला ब्लाग ड़ालने के बाद मैंने blogspot से idharudharki हटा दिया था। कुछ दिन पहले मैंने ग़लती से पुराना URL टाइप किया तो यह पृष्ठ खुला। किसी महानुभाव ने मेरे डिलीट किए URL को ले कर, मेरे पहले पोस्ट के साथ एक डमी पोस्ट डाल दिया है और एक डमी ब्लाग बना लिया है। किस लाभ की उम्मीद में हैं यह साहब (या साहिबा) यह समझ में नहीं आया। बस यही कहूँगा कि यदि ब्लागस्पाट पर आप की पहचान बनी हुई है तो ब्लागस्पाट को छोड़ते वक़्त नाम को मत छोड़िए।

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इट हैपन्ज़ ऑनली इन इंडिया

जब कार में अकेला सफ़र कर रहा होता हूँ, विशेषकर सुबह दफ़्तर जाते और शाम को वापस आते, तो मेरी पसन्द का रेडियो स्टेशन रहता है NPR (यानी नैश्‌नल पब्लिक रेडियो)। शायद यही एक स्टेशन है जिस पर विज्ञापन नहीं आते, और समाचार व अन्य चर्चा दिन भर चलती रहती है। देश भर में इससे जुड़े लोकल स्टेशन्ज़ हैं जो राष्ट्रीय और स्थानीय कार्यक्रमों का अच्छा मिश्रण प्रस्तुत करते हैं। पब्लिक रेडियो कहलाने पर भी यह सरकारी रेडियो नहीं है। विज्ञापन नहीं देता, सरकारी नहीं है, तो फिर चलता कैसे है? यह चलता है श्रोताओं के चन्दे से। साल में तीन चार बार, इनका चन्दे वाला हफ़्ता चलता है, जब ये लोग सामान्य कार्यक्रमों के बीच में चन्दा माँगते हैं लोगों से, और लोग देते भी हैं पैसा — कुछ कंपनियाँ भी ख़ासा पैसा देती हैं और चोर दरवाज़े से उनका विज्ञापन भी हो जाता है, या थोड़ा कार्यक्रमों पर असर रहता है। ख़ैर वे दिन बड़ी बोरियत के होते हैं। ख़ुशक़िस्मती से मेरा रेडियो इलाक़े में दो-तीन NPR स्टेशन पकड़ता है और सभी का चन्दा हफ़्ता एक साथ नहीं चलता, इसलिए स्टेशन बदल लेता हूँ।

कहना दरअसल कुछ और है। पीछे सं॰ रा॰ अमरीका में हुए चुनाओं के दौरान NPR पर हुई एक चर्चा के बारे में बात करना चाहता हूँ। बात चल रही थी, देश में लोगों पर, और विशेषकर मतदाताओं पर धर्म का कितना प्रभाव है, उस पर। चुनाव प्रचार के दौरान दोनों उम्मीदवार (बुश और केरी) इस बात की स्पर्धा में थे कि कौन अधिक धार्मिक है। बुश का गॉड पर विश्वास तो जग ज़ाहिर था ही, केरी भी इस परेशानी में थे कि कहीं उनके लिबरल विचारों के चलते लोग उनको नास्तिक न मान लें। इसलिए वे भी अपने चर्च के साथ रिश्ते को मतदाताओं को बार बार याद दिलाते रहते थे। उन्हीं दिनों कोई सर्वे हुआ था जिसका नतीजा यह था कि अधिकतर मतदाता यही चाहेंगे कि राष्ट्र का नेता कैथॅलिक हो, तब भी ऐसे लोगों की कमी नहीं थी जो प्रोटेस्टंट राष्ट्रपति को मान लें, यहूदी, यहाँ तक कि मुस्लिम राष्ट्रपति को भी कबूल करने को तैयार थे। पर सर्वे किए गए लोगों में कोई ऐसा नहीं था जो ऐसे राष्ट्रपति को स्वीकार करता, जिसका भगवान में विश्वास न हो। इस सब के बारे में कुछ चर्चा यहाँ पर है। NPR का विशेषज्ञ कह रहा था कि इस मामले में हम अमरीकी, यूरोप के देशों से कितना पीछे हैं, शायद इस मामले में हमारी तुलना यूरोपीय देशों से कम और भारत से ज़्यादा की जा सकती है।

इस तुलना के बारे में मैंने जितना सोचा उतना मुझे अजीब लगा। अमरीका में उसके बाद क्या हुआ वह तो अब हिस्ट्री है। बुश की चुनावी सफलता के कारणों में अच्छा खासा असर था ऐसे अभियानों का जिसमें लोगों को डराया गया कि डैमोक्रैट तुम्हारी बाइबलें छीन लेंगे, वग़ैरा वग़ैरा। इसके अतिरिक्त अभी तक अमरीकन लोग अपने ढ़ाई सौ वर्ष के इतिहास में यह नहीं कर पाए हैं कि किसी स्त्री, श्यामवर्णी या अन्य किसी अल्पसंख्यक को राष्ट्र की बागड़ोर सौंपें। और भारत से अपनी तुलना करते हैं। कहाँ राजा भोज और कहाँ गंगू तेली।

अब देखिए विश्व की लार्जेस्ट डेमोक्रेसी भारत में क्या होता है। वाराणसी के घाटों पर भीड़ और अहमदाबाद के दंगों को देख कर पश्चिम के लोग भारत को एक धर्म-प्रधान देश भले ही समझें पर राष्ट्रीय नेताओं के चुनाव के मामले में भारत ने जो वेराइटी और धार्मिक उदासीनता दिखाई है, वह शायद ही कोई अन्य देश दिखा सकता है, और उसके लिए मुझे गर्व की ही अनुभूति होती है। भारत के पहले प्रधान मन्त्री नेहरूजी जन्म से भले ही ब्राह्मण रहे हों पर विचारों से स्वघोषित नास्तिक थे। उनकी धर्म के प्रति विचारधारा उनके बार बार चुने जाने में कभी आड़े नहीं आई। इन्दिरा जी पारसी (या मुस्लिम?) से विवाह के कारण पारसी हुईं, या जो हो, हिन्दू तो नहीं कहलाई जा सकतीं। बीच में प्रधान-मन्त्री आते जाते रहे, फिर राजीव जी भी पारसी ही हुए, जिनका विवाह एक ईसाई स्त्री से हुआ था (छोटे भाई संजय की पत्नी सिख थी)। यानी परिवार एक, पर धर्म इतने सारे। और अबके लोगों ने एक ईसाई स्त्री को सर्वाधिक समर्थन दिया, जिसने एक सिख-धर्मावलंबी को प्रधान-मन्त्री बनाया। यानी हिन्दू कहलाए जाने वाले भारत में “धर्मपरायण” हिन्दू प्रधान-मन्त्री कुछ गिने चुने सालों के लिए ही रहे हैं। बीच बीच में आने वाले प्रधान मन्त्री हिन्दू होते हुए भी अपनी आस्तिकता का ढ़ोल तो नहीं पीटते थे (तान्त्रिकों के चक्कर भले ही काटते हों :-))। किस मुंह से अमरीकी अपनी तुलना भारत से कर सकते हैं, इस मामले में (बाक़ी मामलों की मैं बात नहीं कर रहा, भाई)। राष्ट्रपति भी पिछले अर्ध-शतक में कम से कम चार ऐसे रहें हैं जो अल्पसंख्क समुदाय से थे। कहीं ऐसा होता है क्या भइया? अमरीका में तो नहीं।

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दिल धड़कने का सबब याद आया

दिल धड़कने का सबब याद आया
वो तेरी याद थी अब याद आया

आज मुश्किल था सम्भलना ऐ दोस्त
तू मुसीबत में अजब याद आया

दिन गुज़ारा था बड़ी मुश्किल से
फिर तेरा वादा-ए-शब याद आया

तेरा भूला हुआ पैमान-ए-वफ़ा
मर रहेंगे अगर अब याद आया

फिर कई लोग नज़र से गुज़रे
फिर कोई शहर-ए-तरब याद आया

हाल-ए-दिल हम भी सुनाते लेकिन
जब वो रुख़सत हुए तब याद आया

बैठ कर साया-ए-गुल में नासिर
हम बहुत रोये वो जब याद आया

– नासिर काज़मी

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बाज़ीचा-ए-अत्फ़ाल है दुनिया मेरे आगे

बाज़ीचा-ए-अत्फ़ाल है दुनिया मेरे आगे
होता है शबो-रोज़ तमाशा मेरे आगे।

इक खेल है औरंगे-सुलेमाँ मेरे नज़दीक
इक बात है ऐजाज़े-मसीहा मेरे आगे।

जुज़ नाम नहीं सूरते-आलम मुझे मंज़ूर
जुज़ वहम नहीं हस्तिए-अशिया मेरे आगे।

होता है निहाँ गर्द में सहरा मेरे होते
घिसता है जबीं ख़ाक पे दरिया मेरे आगे।

मत पूछ कि क्या हाल है मेरा तेरे पीछे
तू देख कि क्या रंग है तेरा मेरे आगे।

सच कहते हो ख़ुदबीनो-ख़ुद-आरा न क्यों हों
बैठा है बुते-आईना-सीमा मेरे आगे।

फिर देखिये अन्दाज़े-गुल-अफ़्शानीए-गुफ़्तार
रख दे कोई पैमाना-ओ-सहबा मेरे आगे।

नफ़रत का गुमाँ गुज़रे है, मैं रश्क से गुज़रा
क्योंकर कहूँ लो नाम न उसका मेरे आगे।

ईमाँ मुझे रोके है जो खींचे है मुझे कुफ़्र
कआबा मेरे पीछे है कलीसा मेरे आगे।

आशिक़ हूँ, पे माशूक़-फ़रेबी है मेरा काम
मजनूं को बुरा कहती है लैला मेरा आगे।

ख़ुश होते हैं पर वस्ल में यूँ मर नहीं जाते
आई शबे-हिजराँ की तमन्ना मेरे आगे।

है मौज-ज़न इक क़ुलज़ुमे-ख़ूँ, काश यही हो
आता है अभी देखिये क्या-क्या मेरे आगे।

गो हाथ में जुंबिश नहीं आँखों में तो दम है
रहने दो अभी साग़रो-मीना मेरे आगे।

हम-पेशा ओ’ हम-मशरब ओ’ हम-राज़ है मेरा
‘ग़ालिब’ को बुरा क्यों कहो, अच्छा मेरे आगे।

– मिर्ज़ा असद्दुल्ला खाँ ‘ग़ालिब’

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शब्दार्थ :
बाज़ीचा-ए-अतफ़ाल = बच्चों का खिलौना
शबो-रोज़ = रात दिन
औरंगे-सुलेमाँ = सुलेमान का सिंहासन
ऐजाज़े-मसीहा = मसीहा का चमत्कार
जुज़ नाम = नाम के सिवाय
हस्तिए-अशिया = चीज़ों का अस्तित्व
निहाँ = छुपना
सहरा = रेगिस्तान
जबीं = मस्तक
ख़ुदबीनो-ख़ुद-आरा = अहं से भरा हुआ
बुते-आईना-सीमा = दर्पण जैसी मूर्ति
अन्दाज़े-गुल-अफ़्शानीए-गुफ़्तार = पुष्पवर्षा सा बातचीत का ढ़ंग
पैमाना-ओ-सहबा = मदिरा का प्याला
कलीसा = गिरजाघर
वस्ल = मिलन
शबे-हिजराँ = विरह की रात
मौज-ज़न = लहराता हुआ
क़ुलज़ुमे-ख़ूँ = रक्त का समुद्र
जुंबिश = हरक़त
साग़रो-मीना = मदिरा की सुराही
हम-मशरब = मेरी जैसी आदतों वाला