यदि आप ने कल की पहेली नहीं पढ़ी तो पहले उसे पढ़ें। नीरज रोहिल्ला जी ने सही पकड़ा, वही हल था।
तो हुआ यूँ कि कंप्यूटर जिस के हाथ में था, उसी के पास इस ज्योतिष विद्या की कुंजी थी। यानी, हमारी बड़ी बिटिया हमें बुद्धू बना रही थी। पर विद्या काम की है, इस लिए आप भी सीखिए और अपने दोस्तों को अचंभे में डालिए। यह लीजिए यह रहा साइट का पता - http://peteranswers.com/। ऊपर के खाने में आप को Peter, please answer: दिखेगा, और नीचे वाले खाने में अपना प्रश्न। पर यदि आप ने वैसे ही लिखा जैसा नीचे दिख रहा है, तो जवाब कुछ उल्टा सीधा मिलेगा। दरअसल सारा खेल ऊपर वाले खाने का है, जिस में उत्तर छिपा हुआ है। पहले अपने मित्र से प्रश्न पूछिए। यदि आप को उस का उत्तर नहीं मालूम है, तो उसी से पूछिए कि उसे किस जवाब की उम्मीद है। कहिए पीटर इस कमरे की हवा को भांप लेता है, या कुछ ऐसा ही। फिर पहले खाने में डॉट (.) डालिए, लेकिन दिखेगा “P”। फिर अपना जवाब लिखिए, पर स्क्रीन की तरफ देखने वाले को “Peter, please..” दिखेगा। उत्तर के अन्त में फिर डॉट (.) डालिए, उस के बाद जो लिखेंगे वही दिखेगा। अन्त में कोलन (:) डालना मत भूलिए। फिर निचले खाने में प्रश्न लिखिए, अन्त में प्रश्न चिह्न डालिए। कमाल देखिए - पीटर उत्तर दे देगा।

यहाँ मैं ने ऊपर वाले खाने में “Peter, please answer:” नहीं लिखा है, बल्कि “.chittha.ease answer:” और फिर निचले खाने में प्रश्न लिखा है। प्रश्न चिह्न (?) डालते ही उत्तर नीचे दिख जाता है।
पिछले रविवार मैं छुट्टी के मूड में सुस्ता रहा था कि मेरी छोटी बिटिया मेरे पास आई। बोली, “पापा कमाल हो गया, आप ऊपर आ कर देखिए कंप्यूटर पर क्या हो रहा है।” मैं उस की रोज़ की घिसी-पिटी अमरीकी कार्टूनों की यूट्यूब वीडियो देख देख कर तंग आ गया हूँ, इसलिए मैं ने टाल दिया, “बेटे मुझे आराम करने दो, इस समय मैं तुम्हारे कंप्यूटर के कमाल देखने के मूड में नहीं हूँ।”
बिटिया ज़बरदस्ती पकड़ कर उठाने लगी, “नहीं पापा, ऐसा लगता है किसी ने ऊपर दीदी के कमरे में कैमरा और माइक्रोफोन फिट किया है। ऐसी साइट है, उस पर जो सवाल पूछो उस का सही सही जवाब मिल जाता है।”
मैं ने तंग आ कर कहा, “अच्छा कंप्यूटर पर देखना है न? चलो यहाँ कंप्यूटर पर दिखाओ।”
“नहीं ऊपर दीदी के लैपटॉप पर, वहाँ साइट खुली हुई है।”
मैं कंप्यूटर के पास बैठ गया, “नहीं यहीं बताओ। बताओ, किस साइट पर जाना है?”
उसने साइट बताई। उस पर लिखा था ‘प्रश्न पूछिए’ और आगे एक खाली टेक्स्ट बॉक्स था। बिटिया बोली, “पूछिए ‘मैं ने किस रंग की शर्ट पहनी है?’।”
जवाब आया “मैं इस समय थका हुआ हूँ, इस समय नहीं बता सकता।”
“अरे, यह क्या? अच्छा, यह पूछिए इस कमरे में कितने लोग हैं।”
जवाब आया, “तुम मुझ पर विश्वास नहीं कर रहे, पहले मुझ पर विश्वास करो तब मैं तुम्हारे प्रश्नों के उत्तर दूँगा।”
मैं ने कहा, “देख लिया तुम्हारा कंप्यूटर का कमाल। अब छोड़ो मेरा पीछा।”
“नहीं, पापा प्लीज़, एक मिनट के लिए ऊपर आइए।”
मजबूर हो कर मैं उस के साथ ऊपर गया, साथ में श्रीमती जी भी आईं। ऊपर पहुँच कर, “दीदी, दिखाओ पापा को।”
मैं ने कहा, “अच्छा पूछो पापा ने किस रंग की शर्ट पहन रखी है।”
जवाब आया, “लाल”।
“अँय। शायद इत्तेफाक़ होगा। अच्छा पूछो, इस कमरे में कितने लोग हैं?” जवाब आया “चार”।
“देखा पापा, मैं कह नहीं रही थी? मुझे तो डर लग रहा है। लगता है यहाँ कैमरा लगा है।”
“चुप रहो ऐसा कुछ नहीं है। अच्छा पूछो, आस्था की आयु कितनी है।” जवाब आया, “तेरह साल”।
“मेरी स्कूल बस का क्या नंबर है?” बिल्कुल सही जवाब आया।
इसी तरह, और भी कई सवाल पूछे और सभी के सही जवाब। मैं चकरा गया। नीचे आकर मैं ने फिर कंप्यूटर पर चैक किया, पर वही उल्टे सीधे जवाब मिले। शाम तक मैं इसी परेशानी में रहा कि यह हो क्या रहा है। पर रात होते होते मालूम हो गया कि क्या हो रहा है। क्या आप अनुमान लगा सकते हैं, कि इस पहेली का क्या रहस्य था। टिप्प्णी के रूप में बताएँ। नहीं भी लगा सकते तो भी टिप्पणी करें। पुराना चिट्ठाकार हूँ, पर अभी गुमनामी के अन्धेरे में हूँ। आप की टिप्पणियों के उजाले की आवश्यकता है। कल इसी ब्लॉग पर इसी समय, आप को पहेली का उत्तर भी मिलेगा, और इस चमत्कारी साइट का पता भी।
[बहुत समय बाद लिख रहा हूँ। पुराने साथियों तथा पाठकों से क्षमा याचना सहित।]
अगले मंगल को नॉर्थ कैरोलाइना में डेमोक्रेटिक प्राइमरी चुनाव होने वाले हैं, यानी अमरीकी चुनाव के लंबे खिंचते सेमी-फाइनल का एक और मुकाबला। मालूम नहीं इस बार भी इस बात का फैसला हो पाएगा या नहीं कि हिलरी क्लिंटन और बराक ओबामा में से कौन यह सेमीफाइनल जीतेगा, जो फाइनल चुनाव में रिपब्लिकन पार्टी के जॉन मकेन से लड़ेगा।
यदि अमरीकी चुनाव प्रक्रिया के यह शब्द - सुपर-ट्यूज़डे, आयोवा कॉकस, न्यू-हैंपशर प्राइमेरी, रिपब्लिकन, डेमोक्रेट जैसे शब्द आप को परेशान करते हैं तो आप अकेले नहीं हैं। यदि आप की समझ में यह नहीं आ रहा कि पिछले कई महीनों से हो रहा यह चुनाव समाप्त क्यों नहीं हो रहा तो आप अकेले नहीं हैं। अमरीकी चुनाव प्रणाली है ही बड़ी पेचीदा। यदि आप को संक्षेप में समझना है कि हो क्या रहा है, तो पढ़िए यह लेख। इस में मैं अमरीकी चुनाव प्रणाली के विषय में संक्षेप में बताने का प्रयास करूँगा।
द्विदलीय प्रणाली
सब से पहली बात, यहाँ कई पश्चिमी देशों की तरह द्वि-दलीय राजनीतिक प्रणाली है। अर्थात् भारत की तरह सैंकड़ों राजनीतिक दल न हो कर यहाँ केवल दो ही राजनीतिक दल हैं - रिपब्लिकन पार्टी और डेमोक्रेटिक पार्टी। तीसरा छोटा सा दल है, ग्रीन पार्टी, पर न होने के बराबर। रिपब्लिकन पार्टी मूलतः कन्ज़र्वेटिव (परंपरावादी) है, कुछ कुछ दक्षिण-पंथी (राइट ऑफ सेंटर), हमारी बीजेपी की तरह। डेमोक्रेटिक पार्टी मूलतः लिबरल (मुक्त) है, थोड़ा सा वाम विचारों वाली, लेफ्ट ऑफ सेंटर, हमारी कांग्रेस की तरह। यूं समझिए कि केवल कांग्रेस और बीजेपी में मुकाबला है, बाकी कोई दल हैं ही नहीं। यदि आप एक रजिस्टर्ड वोटर हैं तो आप स्वयं को एक रिपब्लिकन वोटर के रूप में रजिस्टर करा सकते हैं, या डेमोक्रैटिक वोटर के रूप में, या फिर आज़ाद वोटर के रूप में। तीनों मामलों में आप फाइनल चुनाव में किसी को भी वोट दे सकते हैं। पर आप किसी एक पार्टी के रजिस्टर्ड वोटर हैं या नहीं, इस से आप की प्राइमेरी चुनाव में भागीदारी पर असर पड़ सकता है।
प्राइमरी चुनाव क्या है
प्राइमरी चुनाव, जो आजकल चल रहा है, दरअसल पार्टियों का आन्तरिक चुनाव है — पर इस की महत्ता आम चुनाव से कुछ कम नहीं, क्योंकि इस में आम जनता भाग लेती है। रिपब्लिकन पार्टी का अपना प्राइमरी चुनाव होता है, डेमोक्रेटिक पार्टी का अपना। और इन आन्तरिक या प्राइमरी चुनावों के बाद चुना जाता है उस पार्टी का राष्ट्रपति पद के लिए दावेदार। फिर नवंबर के पहले मंगलवार (1 नवंबर को छोड़ कर) को मुख्य चुनाव में इन दोनों उम्मीदवारों में से एक को चुना जाता है। प्राइमरी और मुख्य चुनावों में एक और बड़ा अन्तर यह है कि प्राइमरी चुनाव हर स्टेट के लिए अलग अलग होते हैं, अलग अलग तरीके से और अलग अलग समय पर। इसी कारण प्राइमरी चुनावों की प्रक्रिया इतनी लंबी खिच जाती है। हर राज्य का अपना कानून है, और इस कारण हर राज्य की चुनावों में महत्ता भी कम-ज़्यादा होती है। शुरू शुरू में चुनाव कराने वाले राज्य छोटे होते हुए भी किसी उम्मीदवार को अकारण ही चढ़ा सकते हैं। जब तक आधे राज्य चुनाव करा लेते हैं, आम तौर पर एक स्पष्ट उम्मीदवार उभर कर आ जाता है, और ऐसा होने पर बाद के राज्यों को प्राइमरी चुनाव कराने का आवश्यकता ही नहीं पड़ती।
रिपब्लिकन पार्टी का उम्मीदवार तो महीनों पहले तै हो गया है, पर डैमोक्रैटों की रस्साकसी अभी चल रही है। उदाहरण के तौर पर पिछले हफ्ते हुए पेन्सिलवेनिया डेमोक्रेटिक प्राइमरी चुनावों के बारे में कहा जा रहा था कि वहाँ 32 साल बाद प्राइमरी चुनाव कराने की ज़रूरत पड़ी है। पिछली बार 1976 में तब यहाँ प्राइमरी चुनाव महत्वपूर्ण थे, जब जिमी कार्टर को चुना गया था। अन्यथा पेन्सिलवेनिया और बाद के राज्यों का नंबर आने से पहले ही उम्मीदवार का निर्णय हो जाता है।
हर राज्य का अलग अलग कानून है, इस कारण किसी राज्य में ओपन प्राइमरी होते हैं, तो किसी में क्लोज़ड। ओपन प्राइमरी में यह होता है कि एक पार्टी का पंजीकृत वोटर दूसरी पार्टी के चुनाव में भी भाग ले सकता है। कुछ राज्यों में आज़ाद वोटर दोनों तरफ वोट डाल सकते हैं। कुछ राज्यों में आप केवल उस पार्टी के प्राइमरी चुनाव में भाग ले सकते हैं, जिस के आप पंजीकृत वोटर हैं।
तो क्या लोग सीधे उम्मीदवार को वोट देते हैं?
हाँ भी और नहीं भी। हर वोटर अपने वोट द्वारा अपने क्षेत्र के डेलीगेट (संसद सदस्य) को अधिकृत करता है, किसी एक उम्मीदवार को चुनने के लिए। यानी, उस डेलिगेट के क्षेत्र से जिस उम्मीदवार को अधिक वोट मिलते हैं, वह डेलिगेट बाद में होने वाले एक पार्टी कन्वेन्शन में उसी उम्मीदवार को वोट देता है। इस कारण हर स्टेट के प्राइमरी के बाद यह निश्चित होता है कि किस उम्मीदवार को कितने डेलिगेट मिले हैं। कुछ राज्यों में यह चुनाव सीधे वोट डाल कर होता है, और कुछ अन्य राज्यों में वोटरों की बैठक या पंचायत बुला कर, जिसे कॉकस (caucus) कहा जाता है। इस में एक और पेचीदगी यह है कि कुछ राज्यों में विनर-टेक्स-आल (winner takes all) का नियम है, यानी उस राज्य में जो जीतेगा, राज्य के सारे डेलीगेट उसी को चुनेंगे। वोटरों पर निर्भर इन वचनबद्ध (pledged) डेलिगेटों के अतिरिक्त डैमोक्रैटिक पार्टी में सुपर-डिलिगेट्स की भी प्रथा है। ये कुछ विशिष्ट शक्ति वाले पार्टी के मुख्य सदस्य हैं, जो अपनी मर्ज़ी से वोट दे सकते हैं। रिपब्लिकन पार्टी में सुपर डेलीगेट्स का नियम नहीं है।
अभी क्या हो रहा है?
रिपब्लिकन पार्टी से जॉन मकेन ने अपने निकटतम प्रतिद्वन्द्वी माइक हक्कबी को इतना पीछे छोड़ दिया कि उन की उम्मीदवारी तय है। डेमोक्रैटिक पार्टी में दोनों उम्मीदवार एक दूसरे के इतना पास चल रहे हैं कि फैसला ही नहीं हो पा रहा। अमरीका के इतिहास में पहली बार एक महिला और एक अश्वेत व्यक्ति चुनावों के इस दौर तक पहुँचे हैं। पेन्सिलवेनिया में 32 साल बाद चुनाव हुए हैं, पर वहाँ भी फैसला नहीं हो पाया। हालाँकि हिलरी क्लिंटन ने राज्य को जीत लिया, पर कुल मिला कर बराक ओबामा से आगे नहीं निकल पाई। अब अगले सप्ताह मंगल को इंडियाना और नॉर्थ कैरोलाइना की बारी है। देखिए क्या होता है।
चुनावों की समयावली
- मुख्य चुनाव दिवस 1 नवंबर के बाद के पहले मगंल को होता है, हर साल। हाँ राष्ट्रपति चुनाव हर चार साल बाद होते हैं, और इस साल भी होने हैं। बुश के दो कार्यकाल पूरे हो जाएगें, और परंपरानुसार वे तीसरी बार चुनाव में भाग नहीं ले रहे हैं। उन के दल के उम्मीदवार जॉन मकेन हैं।
- चुनावों की सरगर्मी लगभग सवा-डेढ़ साल पहले शुरू हो जाती है, जब सभी उम्मीदवार अपनी उम्मीदवारी की घोषणा करते हैं। इस के साथ शुरू हो जाता है पैसा और समर्थन जुटाने का काम। जो जिनते अधिक मिलियन बटोरेगा, उस की सफलता और चयनीयता उसी हिसाब से आँकी जाएगी।
- जनवरी में पहला प्राइमरी होता है आयोवा में, यानी आयोवा कॉकस। आयोवा यूँ तो छोटा सा राज्य है, जिस के चुनाव का राष्ट्रीय स्तर पर अधिक महत्व नहीं है, पर यह महत्व इसलिए बढ़ जाता है कि यहाँ से पहला विजेता नामांकित होता है। शायद अपना यही महत्व बनाए रखने के लिए इस राज्य ने यह कानून पास किया है कि हमारा चुनाव सब से पहले होगा।
- कुछ दिन बाद ही होता है न्यू हैंपशर का प्राइमरी। यह और भी छोटा राज्य है, पर फिर जनवरी मे तीन चार राज्यों का चुनाव और होता है। अपना महत्व बढ़ाने के लिए दो और राज्यों - मिशिगन और फ्लोरिडा ने इस बार अपने प्राइमरी चुनाव आगे खिसका लिए। पर डेमोक्रेटिक पार्टी की केन्द्रीय कमान ने इस फैसले को नहीं माना, और हालाँकि चुनाव जनवरी में हो चुके हैं, इन दो राज्यों के डेलिगेटों को अभी भी नहीं गिना जा रहा है। इन की गिनती का क्या करना है, शायद अन्त में ही तय होगा।
- फिर फरवरी में आता है महामंगलवार (Super Tuesday) जिस दिन 24 राज्यों में एक साथ चुनाव होते हैं। आम तौर पर इस दिन उम्मीदवार का पता चल जाता है। पर इस बार डेमोक्रैटिक पार्टी में रेस काँटे की है।
- अप्रैल समाप्त होते होते 15-16 और राज्य हो जाते हैं। बाकी के 4-5 राज्य मई और जून में। जुलाई में आधिकारिक रूप से उम्मीदवारों की घोषणा हो जाती है, और फिर शुरू होती है असली रस्साकशी जो नवंबर में समाप्त होती है। मुख्य चुनावों के लिए भी वही डेलीगेटों की लड़ाई, और वही अलग राज्यों के अलग नियम — पर हाँ चुनाव एक ही दिन होते हैं। इस बार चुनावी मंगल 4 नवंबर को पड़ता है। देखते रहिए क्या होता है। पहली महिला राष्ट्रपति बनेगी, पहला अश्वेत बनेगा, या इन दोनों की आपसी रस्साकशी का फायदा जॉन मकेन को मिलेगा।
दो बातें संक्षेप में -
वर्डप्रेस का नया संस्करण पिछले सप्ताह जारी हो गया है। यदि आप अपने सर्वर पर वर्डप्रेस इस्तेमाल करते हैं, तो क्या आप ने अपग्रेड किया। यदि नहीं तो कर लीजिए। मैं ने कल ही अपग्रेड किया। अक्षरग्राम जैसे सामूहिक चिट्ठों की भी जिन के पास कुंजी है, वे भी ध्यान दें। इस में कहने को तो कई फीचर्स जोड़े गए हैं, पर अभी तक जो बात मुझे मुख्य लगी वह यह है, कि आप श्रेणियों के अतिरिक्त टैग भी जोड़ सकते हैं।
एक समस्या जो मुझे उम्मीद थी नया संस्करण अपलोड करने से हल हो जाएगी, नहीं हुई। कुछ महीनों से नई टिप्पणियाँ आने पर मुझे मेल नहीं आती, और न ही तब जब कोई टिप्पणी मॉडरेशन के लिए रोकी जाती है। इस कारण टिप्पणियों की मंज़ूरी या उन पर प्रतिक्रिया विलंबित हो जाती है। वर्डप्रेस के नियन्त्रण पटल पर इस के लिए जो सेटिंग्स ज़रूरी थी, वह सब करने के बाद भी ऐसा हो रहा है। वर्डप्रेस के सपोर्ट फोरम में खोजने पर भी कोई हल नहीं मिला। वहाँ इतनी समस्याएँ अहलित हैं कि लगता है वहाँ लोग सो रहे हैं। आप में से किसी को ऐसी समस्या का सामना हुआ हो और उस का हल पता हो तो बताया जाए।
सोच रहा हूँ, जब कहने को लंबा चौड़ा कुछ न हो तो मुख़्तसर ही सही, कुछ न कुछ लिखा जाए। इस से चिट्ठाकारी और चिट्ठाकारों से संबन्ध बना रहेगा।
जी हाँ, यही है इस महंगे होटल में इस नए डेसर्ट की कीमत - और यह होटल लंदन, न्यूयॉर्क या टोकियो में नहीं, श्रीलंका के दक्षिणी तट के शहर गालि (காலி) में है।
छः लाख की चॉकलेट आइसक्रीम? इस में हीरे मोती जड़े हैं क्या?
वैसे भी यह होटल (द फोर्ट्रेस) एशिया के सब से महंगे होटलों में है, और वहाँ के कमरे का किराया 1700 डॉलर (68,000 रुपए) तक हो सकता है।
प्रशान्त तामांग बुरे गायक नहीं हैं, पर अमित पॉल से जीतने की शक्ति उन में गाने के आधार पर तो नहीं थी। प्रशान्त की इंडियन आइडल के फाइनल में जीत ने यह साबित कर दिया कि उन के समर्थकों ने एस.एम.एस. द्वारा अमित को ही नहीं, बल्कि और कई अच्छे गायकों को धूल चटा दी। फाइनल तक सब ठीक था - इमॉन, दीपाली, चारू, पूजा, अंकिता जैसे अच्छे गायकों का बाहर हो जाना तब तक नहीं खला, जब तक अमिल पॉल बचा हुआ था और उस के जीतने की उम्मीद मौजूद थी। मैं मानता था कि इस खेल में एसएमएस पर काफी दारोमदार है, पर सारा खेल उसी का है, यह अन्त में प्रशान्त की जीत ने साबित कर दिया।
इंटरनेट पर नेपाल और दार्जीलिंग के कई फोरम चल रहे थे, जहाँ से प्रशान्त के लिए वोटिंग जुटाई जा रही थी। कुछ फ्री एसएमएस का भी जुगाड़ था।
इंडियन आइडल पर मेरे पिछले पोस्ट पर संजय बेंगाणी ने जो भविष्यवाणी की थी, वह सौ फीसदी सच साबित हुई। फिर भी यदि जजों की बातों में, खासकर जावेद अख़्तर की बातों में, कुछ ईमानदारी थी, तो अमित पॉल को पार्श्वगायन का काम मिलना चाहिए।
कल 11 सितंबर थी, और ऐतिहासिक 11 सितंबर की छठी बरसी। कल जितना समय रेडियो सुना, अधिकांश कार्यक्रम इसी घटना से संबन्धित थे। कई कार्यक्रम रोचक लगे - जैसे कि वर्जीनिया की दारुल-नूर मस्जिद के युवा इमाम की कहानी, जिस के लिए अमरीकी मुसलमानों को शान्ति का पाठ पढ़ाना एक चुनोती है, या एक पाकिस्तानी मूल की युवती की आपबीती जिसे ट्रेन में आतंकवादी की नज़र से देखा गया (नीचे पढ़ें)। या फिर न्यू यॉर्क शहर की एक टैक्सी चालिका की कहानी….
मलिस्सा प्लाउट पिछले तीन साल से न्यूयॉर्क में टैक्सी चलाती हैं। यही नहीं, उन का ब्लॉग भी है, और उन्होंने अपने टैक्सी चालन के अनुभवों पर एक किताब भी लिखी है - Hack: How I Stopped Worrying About What to Do with My Life and Started Driving a Yellow Cab.
मलिस्सा का 11 सितंबर वाला लेख आप यहाँ सुन सकते हैं, यहाँ अंग्रेज़ी में पढ़ सकते हैं, और यह रहा उस का हिन्दी अनुवाद..
–
2004 में वह एक शनिवार का दिन था जब मैं ने पहली बार न्यूयॉर्क में टैक्सी चलाई। जब मैं उस सुबह मैनहैटन की ओर जाने वाले 59थ स्ट्रीट के पुल की ओर बढ़ी तो बाहर अभी धुंधलका था। यूँ तो उस जॉब के पहले दिन की याद मेरे मस्तिष्क में धुंधली हैं, पर कुछ यात्रियों की तस्वीर एकदम साफ है - जैसे कि वह जोड़ा जिसे में ने ग्रैमर्सी पार्क में टैक्सी में बिठाया था। कोई 30-35 साल के थे, बढ़िया कपड़े पहने, एक दूसरे का हाथ थामे।
“बॉयफ्रेंड-गर्लफ्रेंड होंगे”, में ने सोचा। “ब्रंच करने जा रहे होंगे।”
मैं लोगों को “पढ़ने” की कोशिश कर रही थी, यानी जो कला टैक्सी चालकों को अपने रोज़मर्रा के काम में आते आते आती है, मुझे वहम हुआ कि मुझे पहले ही दिन आ जाएगी। जब यह जोड़ा बैठा तो उन के गन्तव्य स्थान ने कुछ और ही कहानी कही।
“ग्राउंड ज़ीरो प्लीज़।”
“अरे हाँ, बिल्कुल। आज 11 सितंबर है।”
यह तारीख मेरे दिमाग़ के पार्श्व में सुबह से थी, पर इस से यह अगली सीट पर आ गई। उन के टैक्सी में बैठते ही मुझे 11 सितंबर 2001 की वह सुबह याद आ गई, जब मैं डाउनटाउन एक टफ़्तर में काम पर जा रही थी। मैं सबवे की ट्रेन में बैठ गई थी पर कुछ ही मिनट बाद वह टनल में रुक गई थी और लगभग दो घंटे तक हम उस के चलने का इंतज़ार करते रहे।
ट्रेन पर किसी को भनक नहीं थी कि ऊपर क्या हो रहा है। यह पता था कि वर्ल्ड ट्रेड सेंटर से एक जहाज़ टकराया है, पर सब यह कह रहे थे कि यह कोई अजीबोग़रीब दुर्घटना है। हम लोग ट्रेन के लेट होने पर कुढ़ते रहे, पर घबराहट किसी को नहीं हुई।
आख़िरकार जब 11 बजे के क़रीब हम लोगों को टनल से निकाला गया तो सड़कों पर हो रहे पागलपन ने मुझे चौंका दिया। पुलिसवाले चिल्ला रहे थे, साइरन बज रहे थे, पे-फोन पर लोगों की कतारें थीं। सब से ज़्यादा मेरा इस बात से माथा ठनका कि लोग खड़ी कारों के गिर्द जमा थे, और रेडियो पर समाचार सुन रहे थे। कुछ बड़ी मुसीबत सी आई दिख रही थी। और जब मैं ने फिफ्थ एवेन्यू की ओर नज़र डाली तो दृष्य अवास्तविक था। पच्चीस ब्लॉक परे, जहाँ टॉवर दिखने चाहिएँ थे, वहाँ केवल धुआँ दिख रहा था।
तीन साल बाद शनिवार की उस शान्त सुबह को टैक्सी में बैठे हुए भी मुझे वह कुछ अवास्तविक सा ही लग रहा था। पर फिर मुझे अहसास हुआ कि मैं इस जोड़े को उस समृति सभा में ले जा रही थी, जो इस शहर के इतिहास के बदतरीन दिन की याद में आयोजित हो रही थी, और वे मृत अपनों का मातम मनाने जा रहे थे।
मैं ट्रैफिक में घुसी तो मुझे लगा मैं किसी ऐसे चालक की तरह हूँ जिसो कोई महत्वपूर्ण कार्य सौंपा गया हो। पूरा रास्ता वे चुपचाप बैठे रहे, और आईने में मैं ने देखा कि वे खिड़कियों से इस शहर को देख रहे थे। मैं ने रेडियो धीमा किया, और उन का सफ़र कुछ आरामदेह करने की कोशिश की।
मैं स्मृति-स्थल के जितना क़रीब जा सकती थी, उतना क़रीब जा कर मैं ने उन को उतारा - रास्ते में उन सब सुरक्षा नाकों और सीमेंट की रुकावटों को पार करते हुए, जो पिछले तीन सालों में खड़ी की गई थीं। किसी भी टैक्सी वाले को इन सब के बारे में पहले ही पता होगा, पर मैं एकदम नई थी, और मुझे डर था कि मेरी सवारियों को इस से झुंझलाहट न हो।
उन्हें परवा नहीं थी। बल्कि वे टैक्सी से उतरे तो उन्होंने मुझे सहृदय धन्यवाद दिया। यह यात्रा कुल दस मिनट की थी, और मैनहैटन के दो मील भर का रास्ता था, पर जब मैं ने उन्हें जाते देखा, मुझे लगा कि उस दिन टैक्सी चला कर मैं इस शहर को कुछ लौटा रही थी।
और अब, उन हमलों की छठी बरसी पर, और टैक्सी चालक के रूप में उस पहले दिन के तीन साल बाद, मुझे ग्राउंड ज़ीरो का रास्ता बख़ूबी मालूम है।
—
और अब, उस पाकिस्तानी (शायद) मूल की युवती की कहानी, जो मैं ने NPR पर सुनी पर उसे इंटरनेट पर नहीं खोज पाया। उस युवती का लहजा अमरीकी था, पर नाम देसी।
“9-11 के बाद के अमरीका में मुसलमान हो कर लोगों की अजीब नज़रों से बचना काफी मुश्किल काम है। एक घटना खास तौर पर याद आती है। मैं एमट्रैक (अमरीका की “शताब्दी एक्सप्रेस”) की ट्रेन में बैठी, तो मेरे पास वाली सीट खाली थी। गाड़ी चलने से पहले एक महिला जल्दी में आईं और बिना देखे मेरे पास बैठ गईं। कुछ देर बाद उन्होंने मुझे देखा तो हड़बड़ाहट में एकदम उठकर दो कतार पीछे एक सीट पर बैठ गईं। मुझे अजीब लगा, मैं ने मुड़ कर पूछा, क्या हुआ, क्या आप को लगा मैं इस गाड़ी को बम से उड़ा दूँगी? ऐसे में ईमानदारी की उम्मीद करना मुश्किल है, पर उस महिला ने चुपचाप हाँ में सिर हिला दिया। मैं ने कहा, फिर तो दो कतार पीछे भी आप बच नहीं पाएँगी।”

भाई, एस.एम.एस. द्वारा संगीत के सितारों की चयन प्रक्रिया से अन्य चिट्ठाकार बन्धुओं के साथ मैं भी परेशान हूँ। पर फिर भी देसी टीवी पर संगीत प्रतिस्पर्धाओं पर आधारित कार्यक्रम हमेशा मेरी कमज़ोरी रहे हैं, इस के बावजूद कि संगीत को कर्णप्रियता के आधार पर सुनता हूँ, बारीकी की कोई समझ नहीं है। इस कारण हर शुक्रवार को रात नौ बजे इंडियन आइडल का गायन एपिसोड और हर शनि को परिणाम एपिसोड मैं मिस नहीं कर सकता।
अब इंडियन आइडल के अन्तिम मरहलों में कुछ ही गायक रह गए हैं और हर हफ्ते हमारा कोई पसन्दीदा गायक ही बाहर होता है। इस वर्ष की शृंखला में दो रोचक गायक हैं/थे, जो आम उत्तर-भारतीय-हिन्दी-भाषी के ढ़र्रे से बाहर भी हैं, गाते भी अच्छा हैं, और लोकप्रिय भी हैं - मयंग चैंग, जो चीनी मूल के हैं, और प्रशान्त तमांग, जो पश्चिम बंगाल के एक पुलिस कर्मी हैं। वैसे देखा जाए तो अग्रणी समझे जाने वाले प्रतियोगी अमित पॉल भी उत्तर पूर्व से हैं।

पिछले सप्ताह मयंग चैंग बाहर हो गए। मयंग को अपनी पर्सनैलिटी के आधार पर अधिक वोट मिलते रहे, और बेहतरीन गायक न होते हुए भी वे टॉप पाँच में पहुँच गए — इस कारण मुझे उन के बाहर होने से ज़्यादा शिकायत नहीं है। वहीं मुझे यह बात कुछ अटपटी लगी कि मयंग के चीनी मूल पर इस कार्यक्रम में कुछ ज़्यादा ही ज़ोर दिया गया — यहाँ तक कि शो की प्रस्तुति में मुझे बहुत हद तक नस्लवाद की बू आई। मयंग का जन्म भारत में हुआ है, पिछली कई पुश्तों से उन का परिवार भारत में बसा हुआ है। वे ठेठ हिन्दी बोलते हैं, 100 प्रतिशत भारतीय हैं, चीन कभी गए नहीं। चीनी उन्हें आती नहीं। फिर उन्हें चीनी कहना कहाँ तक सही है। चीनी मूल का कहना एक बात थी। यही नहीं, उन्हें प्यार से चिंगू-मिंगू कहा जाता रहा, और उन की पतली आँखों पर भी प्यार से ही सही, पर मज़ाक किए गए। मयंग अकेले प्रतियोगी हैं, जिन्हें उन के फर्स्ट-नेम मयंग के बदले उन के लास्ट-नेम चैंग से पुकारा गया, और वोटिंग के लिए उसी नाम का प्रयोग किया गया। इंडियन आइडल की आधिकारिक साइट पर भी उन्हें a Chinese guy with an Indian heart कहा गया है।
अमेरिकन आइडल में इसी प्रकार एक भारतीय लड़का संजय मलकर बहुत आगे जाता रहा। उसे भी गायन के इलावा अन्य चीज़ों के कारण वोट मिलते रहे। पर उसे कभी भी ग़ैर अमरीकी या भारतीय कह कर नहीं पुकारा गया। अमरीका स्वयं को विश्व का मिक्सिंग बोउल मानता है, भारत भी एक प्रकार से दक्षिण एशिया का मिक्सिंग बोउल है, जहाँ विभिन्न प्रकार की संस्कृतियों का मिश्रण पाया जाता है। पर जहाँ कोई व्हाइट, ब्लैक, या पूर्वी एशियाई नैन-नक्श वाला दिखता है, वह बाहर का ही लगता है चाहे वह भारत के अतिरिक्त किसी देश को न जानता हो।
खैर इंडियन आइडल की बात की जाए। कल कौन बाहर होगा? अंकिता, ईमॉन, प्रशान्त या अमित? आप की क्या राय है?
आजकल के बॉलीवुड अभिनेताओं में से आमिर ख़ान मेरे सब से पसन्दीदा कलाकार हैं। पर जिस मुद्दे की मैं यहाँ बात कर रहा हूँ वह उन के कलाक्षेत्र से बाहर का है।
पिछले वर्ष के आरंभ में आमिर ख़ान नर्मदा परियोजना पर अपने वक्तव्यों के चलते विवादों में थे। उन की फ़िल्म फ़ना पर गुजरात में रोक लगाई जा रही थी। तब कुछ पत्रकारों के यह पूछे जाने पर कि वे नर्मदा के विस्थापितों की तो बात कर रहे हैं, पर कश्मीर के विस्थापितों की बात क्यों नहीं करते, उन्होंने कहा था
बिल्कुल, मैं (विस्थापित) कश्मीरी पंडितों को सपोर्ट करता हूँ। मैं जम्मू कश्मीर में आतंकवाद के विरुद्ध अपनी आवाज़ उठाऊँगा। कश्मीरी पंडितों को केवल इस लिए निशाना बनाया जाना कि वे हिन्दू हैं, अन्यायपूर्ण है। मैं आतंकवादियों के द्वारा किए गए बम धमाकों के भी ख़िलाफ़ हूँ, क्योंकि उस में केवल बेगुनाह ही मरते हैं। (सौजन्य रेडिफ डॉट कॉम)
बॉलीवुड से संबन्धित इस साइट पर भी आमिर के इस वक्तव्य का स्वागत हुआ था -
आमिर अपनी फ़िल्म फ़ना पूरी करने के बाद अपने परिवार के साथ छुट्टी मना रहे हैं। वापस आ कर वे शरणार्थी शिविरों में जाएँगे, विस्थापित पंडितों से बात करेंगे, और फिर राज्य और केन्द्रीय सरकार से उन के पुनर्वसन के बारे में बात करेंगे। आमिर ख़ान का इरादा अनुपम खेर, महेश भट्ट और अशोक पंडित जैसी मशहूर हस्तियों के साथ कश्मीर घाटी जाने का है। अनुपम खेर और महेश भट्ट ने आमिर के इस कदम की काफी प्रशंसा की है।
पर लगता है आमिर यह सब कह कर भूल भाल गए। पब्लिक की याददाश्त भी कमज़ोर होती है, वह भी भूल गई। और फिर जब मामला एक छोटे से अल्पसंख्यक समूह का हो तो भूलना सब के लिए आसान है। पर कश्मीर हेराल्ड के संपादक और रेडिफ के सतंभकार ललित कौल नहीं भूले। वे अपनी साइट पर दिनों, घंटों, मिनटों, सेकंडों का हिसाब रख रहे हैं। जब मैं यह प्रविष्टि लिख रहा हूँ, तब तक 453 दिन, 20 घंटे, 20 मिनट और 34 सेकंड हो गए हैं, और आमिर अभी तक न बोले हैं, न कहीं गए हैं कश्मीरियों से मिलने।
स्वाधीनता की 60वीं वर्षगांठ पर लिखा ललित का रेडिफ पर लिखा यह लेख भी पढ़ें। और ढ़ाई वर्ष पहले उन के एक और लेख (The pawns without a vote) का मेरा अनुवाद भी पढ़ें।
[आज जुलाई का अन्तिम दिन है। यदि आज मैं यह प्रविष्टि नहीं लिखता तो इस चिट्ठे की पौने तीन वर्ष की आयु में पहला महीना ऐसा चला जाता जिस में कुछ भी न लिखा गया हो। अपने चिट्ठे को सुप्तावस्था से बाहर लाने की कोशिश है यह प्रविष्टि, जो मैं ने कुछ समय पहले आरंभ की थी और इसे अभी भी पूरा नहीं कर पाया हूँ।]
USA and Britain are called two nations divided by the same language. I think Hindi and Urdu remain the same language divided by a script.
अभय अग्रवाल के चिट्ठे से लिया यह उद्धरण मुझे बहुत सटीक लगा। उर्दू इतनी हसीन ज़बान है और इतनी अपनी लगती है, पर इस की लिपि ने इसे पराई कर दिया है। यह बात नहीं है कि उर्दू में प्रयुक्त नस्तालीक़ लिपि सीखी नहीं जा सकती, पर उसी ज़बान को लिखने के लिए जब हम देवनागरी जैसी लिपि का प्रयोग जानते हैं, तो उसी के लिए एक और लिपि सीखना मेहनत का काम तो है ही। हिन्दी वालों ने संस्कृत के शब्दों से और उर्दू वालों ने अरबी-फ़ारसी शब्दों से इस एक ही भाषा में जो दरार डाली है, उसे आम तौर पर हिन्दुस्तानी बोलने वालों ने सीधी-सादी भाषा बोल कर पाट दिया है। पर लिपियों की भिन्नता ने जो दरार डाली है, उसे पाटने के लिए बहुत मेहनत चाहिए।
जितना हिन्दी चिट्ठाजगत का कारवाँ बढ़ रहा है, उतनी तेज़ी से नस्तालीक़ में लिखे उर्दू चिट्ठे तो सामने नहीं आ रहे हैं, पर उर्दू में जितना भी लिखा जा रहा है, उसे पढ़ने की ललक हिन्दी चिट्ठाकारों और पाठकों में बढ़ती जा रही है। पिछले वर्ष मैं ने उर्दू में लिखे चिट्ठों पर एक नज़र डाली थी, और उम्मीद की थी कि इसे नियमित रूप से लिख पाऊँगा। पर जैसा इस चिट्ठे पर होता आया है, वही हुआ। महीने में कुल जमा दो-तीन पोस्ट लिखे जाते हैं, और वह भी बिना किसी प्लानिंग के। इस के इलावा भारत से उर्दू के कोई खास चिट्ठे भी सामने नहीं आए। शुऐब का उर्दू चिट्ठा نئی باتیں / نئی سوچ (नई बातें नई सोच) नियमित पढ़ता हूँ। इंडस्क्राइब का बेस्ट ग़ज़ल्स भी बढ़िया है पर वे यूनिकोड उर्दू न लिख कर ग़ज़लों को स्कैन कर के छापते हैं। हिन्दी चिट्ठाजगत में उर्दूदानों की संख्या बढ़ गई है, पर उर्दू चिट्ठाकारों की संख्या ज्यों की त्यों है।
इस बीच एक अच्छे इरादे से कोशिश हो रही है उर्दू-हिन्दी लिप्यन्तरण (ट्रान्सलिट्रेशन) सॉफ्टवेयर बनाने की। भोमियो के पीयूष, जो कि भारतीय लिपियों को आपस में परिवर्तित करने में बहुत सफल रहे हैं, अब प्रयत्न कर रहे हैं उर्दू से हिन्दी ट्रान्सलिट्रेशन की। जो अभी तक हासिल हुआ है, उस के बारे में यही कहा जा सकता है कि कुछ न होने से तो बेहतर है। कई लोग इस से उत्साहित हैं, पर इस मामले में मैने शुरू से जो टिप्पणियाँ दी हैं, वे बहुत अधिक उत्साहवर्धक नहीं रही हैं इस काम में लगे लोगों के लिए, या इस सॉफ्टवेयर का इन्तज़ार कर रहे लोगों के लिए। इसका कारण यह है कि मैं दोनों लिपियों को समझता हूँ और यह मानता हूँ कि उर्दू से हिन्दी (या उर्दू से रोमन) का सही लिप्यन्तरण लगभग असंभव है। जो लोग उत्साहित हैं वे उर्दू नहीं जानते। जो जानते हैं, उन्हें मालूम है कि मंजिल दूर है। अपनी इस राय के कारण को विस्तार से समझाने की कोशिश करूँगा इस पोस्ट में।
भारतीय लिपियों के बीच ट्रान्सलिट्रेशन बहुत सरल है। देवनागरी, गुरमुखी, गुजराती, बंगाली, तमिल आदि लिपियों की संरचना समान है, बस अक्षरों के आकार भिन्न हैं। इन सब लिपियों से रोमन में ट्रान्सलिट्रेशन भी सरल है, क्योंकि जो रोमन आप को हासिल होती है, वह अग्रेज़ी हिज्जों या नियमों की मोहताज नहीं है। इस सरलता ने हमारी उम्मीदें बढ़ा दी हैं, और अब हम बिना उर्दू सीखे ही उसे भी पढ़ना चाहते हैं। पर कल्पना कीजिए कि आप को अंग्रेज़ी से देवनागरी का ट्रान्सलिट्रेशन बनाने को कहा जाए। एक सीधे से वाक्य “George Bush is the President of United States of America” का लिप्यान्तरण बनेगा “गेओर्गे बुश इस थे प्रेसिदेन्त ओफ उनितेद स्ततेस ओफ अमेरिका”। यदि आप को इस तरह का लिप्यन्तरण चलता है तो फिर ठीक है। पर सही लिप्यन्तरण के लिए इस में ऐसे टूल डालने पड़ेंगे जो हर शब्द का ध्वन्यात्मक रूप खोजे और उसे फिर देवनागरी में लिपिबद्ध करे - यानी एक अंग्रेज़ी का टेक्स्ट-टू-वॉइस कन्वर्टर और हिन्दी का वॉइस-टू-टेक्सट कन्वर्टर। यूँ समझिए कि उर्दू की हालत इस से कई गुणा जटिल है। उर्दू में हर शब्द का क्या उच्चारण है यह इस बात पर निर्भर करता है कि सन्दर्भ क्या है। उदाहरण के लिए “क्या” और “किया” एक ही तरह से लिखा जाता है। “अस”, “इस” और “उस” एक ही तरीके से लिखा जाता है। पढ़ने वाला मज़मून के मुताबिक उसे सही पढ़ता है। यह उम्मीद कंप्यूटर से तो नहीं की जा सकती न?
आइए उर्दू लिपि की संरचना पर एक नज़र डालें (हिन्दुस्तानी भाषा की दृष्टि से - फारसी या अरबी की दृष्टि से नहीं), जो इस को आम कंप्यूटर की समझ से बाहर कर देते हैं।
1. उर्दू अक्षरमाला
उर्दू लिपि में 37 अक्षर हैं और कुछ चिह्न हैं, पर हिन्दुस्तानी की दृष्टि से कई ध्वनियाँ डुप्लिकेट हैं, और कई अक्षर हैं ही नहीं। दो “अ” हैं (अलिफ़ और ऐन), चार-पाँच “ज़” हैं (ज़े, ज़ाल, ज़ुआद, ज़ोए, और तीन बिन्दियों वाला रे), दो “त” हैं (ते और तोए), दो “स” हैं (से और सुआद)। इन सब में आपस में उच्चारण का कोई अन्तर नहीं है; शायद अरबी फ़ारसी में होता हो, उर्दू में नहीं है। पर नियमानुसार यह भी आवश्यक है कि अरबी फ़ारसी से आए शब्दों के लिए सही अक्षर का ही प्रयोग हो। मसलन यदि “मसलन” के लिए “से” का प्रयोग होता है तो “सुआद” या “सीन” का प्रयोग नहीं हो सकता (या इस का उल्टा)। “मसलन” के आखिर में जो न की ध्वनि है उस के लिए “नून” नहीं लिखा जाता पर “अलिफ़” के ऊपर दो लकीरें डाली जाती हैं, पता नहीं क्यों। ख, घ, छ, झ, आदि के लिए उर्दू में अक्षर नहीं है पर इन्हें क, ग, च, ज, आदि के साथ ह (दोचश्मी-हे) जोड़ कर लिखा जाता है। कीफ़-क़ाफ़, गाफ़-ग़ैन, आदि में कुछ उच्चारण का अन्तर है, जो हिन्दुस्तानी बोलने वाले आम तौर पर जानते हैं, पर हमेशा नहीं। देवनागरी में नुक़्ते वाले अक्षर क़, ग़ आदि इसी के लिए प्रयोग होते हैं।
2. स्वर/मात्राएँ
उर्दू लिपि में कुछ स्वरों के लिए अक्षरों का प्रयोग होता है (अलिफ़, ऐन, ये, वाव) और कुछ स्वरों के लिए ऊपर या नीचे लगाए जाने वाले चिह्न (ज़ेर, ज़बर, पेश)। पर जो चिह्न हैं, उन का प्रयोग बिल्कुल ऐच्छिक (optional) है, यानी लगाया तो लगाया, नहीं लगाया तो नहीं लगाया। आम तौर पर इन चिह्नों को नहीं ही लगाया जाता है। यही कारण है कि क+स लिखने पर यह पढ़ने वाले को स्वयं अन्दाज़ा लगाना है कि यह किस है, कस है या कुस। शब्द में जितने अधिक अक्षर होंगे उतनी संभावनाएँ बढ़ जाएँगी। क+स+न = कसन / किसन / कसिन / कुसन / कसुन / किसिन / कुसुन / कस्न / कुस्न / किस्न / क्सन। अब हमें तो मालूम है “किसन” होगा, पर कंप्यूटर बेचारे को क्या पता कहाँ पर कौन सी मात्रा लगानी है, या किस अक्षर को आधा कर के पढ़ना है।
व के लिए जो अक्षर प्रयोग होता है (वाव) वही ऊ, ओ और औ के लिए भी प्रयोग होता है। यानी कौल लिखेंगे तो उसे कौल, कोल, कवल, कूल कुछ भी पढ़ा जा सकता है।
य के लिए जो अक्षर प्रयोग होता है (नीचे दो बिन्दियाँ) वही ई, ए, ऐ के लिए भी प्रयोग होता है। यानी सेठ को सैठ, सेठ, सयठ, सीठ, कुछ भी पढ़ा जा सकता है।
3. ह का प्रयोग
जैसा मैं ने बताया ख, घ, छ, झ, आदि के लिए अक्षर नहीं है पर इन्हें क, ग, च, ज, आदि के साथ ह (दोचश्मी-हे) जोड़ कर लिखा जाता है। दो चश्मी हे को कई बार ह के लिए भी प्रयोग किया जाता है (शब्द के आरंभ में)। हे को अन्त में कई बार आ की ध्वनि के लिए प्रयोग किया जाता है - जैसे वग़ैरा/वग़ैरह, मुज़ाहिरा/मुज़ाहिरह, हमला/हमलह, इन सब के अन्त में अलिफ़ (आ) के स्थान पर हे (ह) आता है।
4. शब्दों के बीच स्थान
शब्दों के बीच अलग से स्थान छोड़ने का नियम नहीं है। पर अक्षरों को जोड़ने के जो नियम हैं, उन से एक शब्द के बीच ऐसे स्थान आ जाता है, कि वे दो शब्द लगते हैं। जैसे, क्या आप बता सकते हैं कि इस शेर की एक लाइन में कितने अल्फ़ाज़ (शब्द) हैं? 
कंप्यूटर के लिए भी यह समझना कठिन होगा कि कौन सा शब्द कहाँ आरंभ होता है और कहाँ समाप्त होता है। दोनों पंक्तियों के बीच जो बिन्दियाँ हैं, वे ऊपर के अक्षरों के साथ हैं, या नीचे के अक्षरों के साथ, यह समझना भी एक मशीन के लिए मुश्किल है। यानी, ओ.सी.आर. भी दिक्कत का काम है।
इस सब को देखते हुए मेरा यह मानना है कि उर्दू पढ़नी हो तो सब से सही तरीका है, उर्दू सीखो। अच्छी खबर यह है कि उर्दू सीखना मुश्किल नहीं है। फ़ुर्सत रही तो उर्दू को आसानी से सिखाने के लिए कुछ लेख भी लिखूँगा। दिल यह कहता है कि उर्दू को भी देवनागरी में लिखा जाए तो कितना ही अच्छा हो। पर उर्दू के ठेकेदारों को यह बात नागवार गुज़रनी है।
पीयूष ने अपने लिप्यन्तरण सॉफ्टवेयर पर उर्दूदानों की राय जानने के लिए उर्दू के यूज़नेट वाले ग्रुप में मदद मांगी थी, पर वहाँ बहस ऐसी छिड़ी और ऐसी मुड़ी कि नतीजा कुछ नहीं निकला।